Home उत्तराखंड देहरादून अनशन खत्म, अब वादे की परीक्षा

अनशन खत्म, अब वादे की परीक्षा

0
63

लोकतंत्र में किसी आंदोलन की सबसे बड़ी सफलता केवल यह नहीं होती कि वह सुर्खियां बटोर ले, बल्कि यह होती है कि वह सत्ता को संवाद की मेज तक आने के लिए विवश कर दे। जंतर-मंतर से शुरू होकर अस्पताल तक पहुंचे सोनम वांगचुक के अनशन का समाप्त होना इसी अर्थ में राहत की खबर है। यह केवल एक व्यक्ति की भूख-हड़ताल का अंत नहीं, बल्कि एक ऐसे टकराव को विराम है जो लंबा खिंचता तो लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए भी असहज स्थिति पैदा कर सकता था। लेकिन असली प्रश्न अब शुरू होता है। अनशन टूट गया है, क्या सरकार अपने आश्वासनों पर खरी उतरेगी? लोकतंत्र में आंदोलनों का सम्मान केवल उनकी समाप्ति से नहीं, बल्कि उनसे निकले निष्कर्षों के ईमानदार क्रियान्वयन से होता है। यदि आश्वासन केवल तत्काल संकट टालने का माध्यम बन जाएं, तो जनता का विश्वास केवल सरकार से नहीं, लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं से भी कमजोर पड़ता है। इसी समय देश का दूसरा बड़ा प्रश्न भी सामने है पेपर लीक। पिछले कुछ वर्षों में भर्ती परीक्षाओं और प्रतियोगी परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर लगातार प्रश्न उठे हैं। लाखों युवाओं ने वर्षों की मेहनत की, लेकिन कुछ संगठित गिरोहों ने परीक्षा प्रणाली को कारोबार बना दिया। यह केवल अपराध नहीं, युवाओं के भविष्य पर हमला है। इसलिए यदि संसद पेपर लीक रोकने के लिए कठोर कानून बनाने की दिशा में आगे बढ़ती है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन कानून की कठोरता तभी सार्थक होगी, जब जांच एजेंसियां निष्पक्ष हों, मुकदमे समयबद्ध हों और दोषियों को शीघ्र दंड मिले। केवल नए कानून बना देने से समस्या समाप्त नहीं होती उनका निष्पक्ष और प्रभावी क्रियान्वयन ही व्यवस्था में भरोसा लौटाता है। इसके साथ ही एक और बुनियादी सिद्धांत को नहीं भूलना चाहिए। लोकतांत्रिक समाज में छात्र आंदोलन कोई अपराध नहीं हैं। असहमति लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, उसकी शक्ति है। यदि छात्र अपने भविष्य, शिक्षा व्यवस्था या रोजगार के सवाल पर शांतिपूर्ण ढंग से विरोध दर्ज कराते हैं, तो राज्य का दायित्व उन्हें सुनना है, न कि उन्हें अपराधी की तरह देखना। पुलिस कार्रवाई अंतिम विकल्प हो सकती है, पहला नहीं। किसी भी लोकतंत्र का आत्मविश्वास इस बात से मापा जाता है कि वह आलोचना को कितनी सहजता से स्वीकार करता है। हालांकि इस सिद्धांत का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। आंदोलन की आड़ में यदि सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचाया जाता है, हिंसा की जाती है, पुलिस पर हमला होता है या अराजकता फैलाने की कोशिश की जाती है, तो उसे लोकतांत्रिक अधिकार नहीं कहा जा सकता। शांतिपूर्ण प्रदर्शन और सुनियोजित उपद्रव के बीच स्पष्ट अंतर करना होगा। जो लोग वास्तविक जनआंदोलनों की आड़ लेकर हिंसा, तोड़फोड़ या राजनीतिक लाभ के लिए अराजकता फैलाते हैं, वह किसी भी जनसंघर्ष की नैतिक शक्ति को कमजोर करते हैं। ऐसे तत्वों के विरुद्ध कानून के अनुसार कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। दरअसल, लोकतंत्र दो समानांतर जिम्मेदारियों पर चलता है। पहली, सरकार की जिम्मेदारी कि वह नागरिकों की बात सुने, संवाद करे और वादों को निभाए। दूसरी, आंदोलनकारियों की जिम्मेदारी कि उनका विरोध संविधान और कानून की सीमाओं के भीतर रहे। जब इनमें से कोई एक पक्ष अपनी सीमा लांघता है, तब लोकतंत्र में अविश्वास बढ़ता है। सोनम वांगचुक के अनशन की समाप्ति इसीलिए केवल राहत का क्षण नहीं, बल्कि एक अवसर भी है। यह अवसर सरकार के लिए है कि वह यह साबित करे कि संवाद केवल संकट प्रबंधन का औजार नहीं, शासन की स्थायी संस्कृति है। यह अवसर संसद के लिए भी है कि वह परीक्षा प्रणाली को सुरक्षित बनाने वाले कानूनों पर गंभीरता से विचार करे। और यह अवसर समाज के लिए भी है कि वह शांतिपूर्ण आंदोलनों और हिंसक भीड़तंत्र के बीच फर्क करना सीखे। लोकतंत्र में सरकार की ताकत विरोध को दबाने से नहीं, बल्कि उसे सुनकर समाधान निकालने से बढ़ती है। उसी तरह किसी आंदोलन की नैतिक शक्ति नारे या भीड़ से नहीं, बल्कि उसके अनुशासन और उद्देश्य की स्पष्टता से बनती है। अब जब अनशन समाप्त हो चुका है, तो देश की निगाहें सरकार पर हैं। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा व्रत भूख का नहीं, विश्वास निभाने का होता है। वही विश्वास इस समय सरकार की सबसे कठिन, लेकिन सबसे आवश्यक अग्नि परीक्षा है।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here