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संसद के दरवाजे तक जेन-जेड

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सालों बाद देश ने एक ऐसा दृश्य देखा, जिसने सत्ता के गलियारों को यह एहसास करा दिया कि युवा केवल चुनावी रैली की भीड़ नहीं होता, वह लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत भी बन सकता है। संसद के बाहर उमड़ा जेन-जेड का आक्रोश इस बात का संकेत है कि देश की नई पीढ़ी अब केवल लाइक, शेयर और हैशटैग तक सीमित नहीं रहना चाहती। जब उसे अपने भविष्य पर संकट दिखाई देता है, तो वह संसद की चौखट तक पहुंचने का साहस भी रखती है। यह केवल एक प्रदर्शन नहीं था। यह उन लाखों युवाओं की हताशा, बेचौनी और टूटते भरोसे की आवाज थी, जो वर्षों से रोजगार, भर्ती परीक्षाओं, पारदर्शिता और अवसरों के नाम पर केवल आश्वासन सुनते आए हैं। देश की राजनीति ने लंबे समय तक युवाओं को केवल वोट बैंक समझा। चुनाव आते ही रोजगार के वादे, स्टार्टअप के सपने, कौशल विकास के विज्ञापन और डिजिटल इंडिया के नारे गूंजते हैं। लेकिन चुनाव खत्म होते ही वही युवा फाइलों, अदालतों, भर्ती घोटालों और लंबी प्रतीक्षा सूचियों में उलझ जाता है। जब उम्मीद बार-बार टूटती है, तो गुस्सा सड़कों पर उतरता है और जब वह गुस्सा संसद के बाहर पहुंच जाए, तो समझ लेना चाहिए कि समस्या अब राजनीतिक नहीं, सामाजिक विस्फोट का रूप लेने लगी है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी नौबत आई ही क्यों? क्या सरकारें युवाओं की आवाज समय रहते सुनने में विफल रहीं? क्या विपक्ष केवल ट्वीट और प्रेस कान्फ्रेंस तक सीमित रहा? यदि लोकतांत्रिक संस्थाएं जनता की बेचौनी को समय रहते नहीं सुनतीं, तो सड़कें ही संवाद का मंच बन जाती हैं। यह विडंबना ही है कि जिस जेन-जेड को अक्सर रील्स वाली पीढ़ी, संवेदनहीन पीढ़ी या राजनीति से दूर पीढ़ी कहकर खारिज किया जाता था, वही आज सबसे मुखर होकर सवाल पूछ रही है। यह पीढ़ी नेताओं के भाषणों से नहीं, उनके प्रदर्शन से फैसले करती है। इसे आंकड़े चाहिए, जवाब चाहिए और परिणाम चाहिए। सत्ता के लिए सबसे बड़ा खतरा विपक्ष नहीं होता, बल्कि निराश युवा होता है। क्योंकि विपक्ष चुनाव में हराया जा सकता है, लेकिन उम्मीद खो चुका युवा किसी भी सरकार के लिए सबसे कठिन चुनौती बन जाता है। इतिहास गवाह है कि जब-जब युवाओं का असंतोष चरम पर पहुंचा है, तब-तब राजनीति की दिशा बदल गई है। यह भी सच है कि विरोध लोकतंत्र का अधिकार है, लेकिन विरोध का लोकतांत्रिक स्वरूप बना रहना भी उतना ही आवश्यक है। हिंसा, टकराव और अराजकता किसी भी आंदोलन की नैतिक शक्ति को कमजोर करते हैं। दूसरी ओर, यदि शांतिपूर्ण विरोध का जवाब केवल बैरिकेड, लाठी या हिरासत से दिया जाता है, तो सत्ता अपनी नैतिक बढ़त स्वयं खो देती है। आज सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को आईना देखने की जरूरत है। सत्ता को यह समझना होगा कि रोजगार केवल चुनावी घोषणा नहीं, युवाओं का संवैधानिक विश्वास है। विपक्ष को भी यह तय करना होगा कि वह युवाओं की पीड़ा को केवल राजनीतिक अवसर नहीं बनाए, बल्कि ठोस विकल्प भी दे। संसद के बाहर पहुंचे जेन-जेड ने दरअसल संसद के भीतर बैठे हर दल से एक ही सवाल पूछा है हमारे भविष्य का जवाब कौन देगा? इस सवाल का उत्तर यदि केवल भाषणों, आरोप-प्रत्यारोप और राजनीतिक शोर में दब गया, तो आने वाले समय में यह दस्तक और तेज होगी। लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना यह नहीं कि युवा सड़क पर उतर आया। सबसे बड़ी विडंबना यह होगी कि संसद उसकी आवाज सुनकर भी अनसुनी कर दे। क्योंकि जब उम्मीदें बैरिकेड से टकराने लगती हैं, तब केवल आंदोलन नहीं जन्म लेते इतिहास भी करवट लेता है।

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