लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत जनता की आवाज होती है। लेकिन जब उस आवाज का जवाब लाठियों से दिया जाए और लाठी चलाने वालों में वर्दीधारी पुलिस के साथ-साथ सादे कपड़ों में मौजूद लोग भी दिखाई दें, तो सवाल सिर्फ पुलिस कार्रवाई का नहीं रह जाता सवाल लोकतंत्र की विश्वसनीयता का बन जाता है। जंतर-मंतर पर प्रदर्शन के दौरान सामने आए कई वीडियो और तस्वीरों ने देशभर में बहस छेड़ दी है। सोशल मीडिया पर लोग दावा कर रहे हैं कि कुछ सादे कपड़ों में मौजूद लोग प्रदर्शनकारियों पर डंडे चलाते और पुलिस के साथ कार्रवाई करते दिखाई दे रहे हैं। इन दृश्यों को लेकर तरह-तरह के आरोप लगाए जा रहे हैं। यदि ऐसे दावे सही हैं, तो यह बेहद गंभीर विषय है और यदि दावे गलत हैं, तो उन्हें तथ्यों के साथ खारिज करना भी उतना ही जरूरी है। खामोशी किसी भी स्थिति में समाधान नहीं है। लोकतंत्र में पुलिस के हाथ में लाठी इसलिए दी जाती है कि वह कानून का पालन कराए, न कि कानून और भीड़ के बीच की रेखा ही मिट जाए। अगर भीड़ को नियंत्रित करना था, तो वर्दीधारी पुलिस पर्याप्त थी। फिर सवाल उठना स्वाभाविक है कि सादे कपड़ों में सक्रिय दिख रहे लोग कौन थे? क्या वे अधिकृत पुलिसकर्मी थे? क्या वे किसी विशेष ड्यूटी पर थे? यदि हां, तो उनकी पहचान और भूमिका स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही? और यदि नहीं, तो किसी नागरिक को कानून हाथ में लेने की अनुमति किसने दी? दुर्भाग्य यह है कि हाल के वर्षों में हर बड़े आंदोलन के बाद मूल मुद्दा पीछे छूट जाता है और बहस पुलिस बनाम प्रदर्शनकारी तक सिमट जाती है। लेकिन जंतर-मंतर की घटना ने एक नया प्रश्न खड़ा कर दिया है क्या अब लोकतांत्रिक आंदोलनों में भीड़ को नियंत्रित करने के लिए ऐसे चेहरे इस्तेमाल किए जाएंगे जिनकी कोई आधिकारिक पहचान ही न हो? अगर ऐसा है तो यह केवल कानून व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादाओं की परीक्षा है। सरकारें बदलती रहती हैं, लेकिन संस्थाओं पर जनता का भरोसा बना रहना चाहिए। यही लोकतंत्र की असली पूंजी है। यदि किसी कार्रवाई पर संदेह पैदा हो जाए और सरकार या पुलिस समय रहते तथ्यों के साथ स्थिति स्पष्ट न करे, तो अफवाहें ही सच का स्थान लेने लगती हैं। लोकतंत्र में पारदर्शिता विकल्प नहीं, अनिवार्यता है। इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ी जिम्मेदारी सरकार और पुलिस प्रशासन की है। यदि सादे कपड़ों में दिख रहे लोग पुलिस बल का हिस्सा थे, तो यह स्पष्ट किया जाए कि वह किस इकाई से थे और किस आदेश के तहत तैनात थे। यदि वह पुलिसकर्मी नहीं थे, तो उनकी पहचान सार्वजनिक की जाए और यह बताया जाए कि वह हिंसक गतिविधियों में कैसे शामिल हुए। किसी भी निष्पक्ष जांच में वीडियो फुटेज, सीसीटीवी रिकार्डिंग, बाडी कैमरा और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान शामिल किए जाने चाहिए। लोकतंत्र में संदेह का उत्तर दमन नहीं, बल्कि सत्य होता है। जंतर-मंतर केवल दिल्ली का एक चौराहा नहीं है। यह वह जगह है जहां देश के किसान, जवान, छात्र, कर्मचारी, महिलाएं और आम नागरिक वर्षों से अपनी मांगें लेकर आते रहे हैं। यदि वही स्थान लोगों में भय का प्रतीक बनने लगे, तो यह किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं है। आज देश का नागरिक एक सीधा सवाल पूछ रहा है जंतर-मंतर पर लाठी किसने चलाई? इस सवाल का जवाब किसी राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि तथ्यों और पारदर्शी जांच से मिलना चाहिए। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे बड़ा संकट तब पैदा होता है जब जनता को यह भरोसा ही न रहे कि कानून केवल वर्दी पहनकर चलता है। यदि सच्चाई साफ है, तो उसे सामने आने दीजिए। यदि कोई दोषी नहीं है, तो जांच से डर कैसा? और यदि कोई दोषी है, तो उसकी पहचान चाहे जितनी प्रभावशाली क्यों न हो, कानून का सामना उसे ही करना चाहिए। लोकतंत्र की असली ताकत यही है कि यहां सवाल पूछना अपराध नहीं, बल्कि नागरिक का अधिकार है।




