- भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने पूछा- यूकेडी मैदान में उतरेगी या किसी बड़े दल की गोद में बैठेगी
- भाजपा को यूकेडी का डर या चुनावी बेचौनी, महेंद्र भट्ट की पोस्ट ने बढ़ाई सियासी हलचल
- विधानसभा चुनाव से पहले भाजपा प्रदेश अध्यक्ष की सोशल मीडिया पोस्ट पर उठे सवाल
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव की आहट तेज होते ही प्रदेश की राजनीति में बयानबाजी का दौर भी शुरू हो गया है। इस बीच भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट की एक सोशल मीडिया पोस्ट ने सियासी गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। अपनी पोस्ट में उन्होंने सीधे उत्तराखंड क्रांति दल पर निशाना साधते हुए लिखा कि अब देखना यह है कि यूकेडी कितनी विधानसभा सीटों पर चुनाव लड़ती है या फिर किसी बड़े दल की गोद में बैठ जाती है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यूकेडी का इतिहास सत्ता के साथ जाने का रहा है।
यही पोस्ट अब राजनीतिक बहस का विषय बन गई है। सवाल यह उठ रहा है कि जिस यूकेडी का विधानसभा में वर्तमान में कोई प्रभावी प्रतिनिधित्व नहीं है, उस पर भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष को सार्वजनिक टिप्पणी करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब कोई बड़ा दल किसी छोटे दल पर लगातार टिप्पणी करने लगे तो इसका अर्थ यह भी हो सकता है कि वह उसके संभावित चुनावी प्रभाव को लेकर सतर्क है।
यूकेडी भले ही पिछले दो दशकों में चुनावी तौर पर कमजोर हुई हो, लेकिन उत्तराखंड राज्य आंदोलन की विरासत आज भी उसके साथ जुड़ी हुई है। पहाड़ के कई क्षेत्रों में पार्टी का भावनात्मक आधार अभी भी पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। ऐसे में यदि विधानसभा चुनाव में यूकेडी अधिक सीटों पर उतरती है तो वह कई सीटों पर वोटों का समीकरण प्रभावित कर सकती है। महेंद्र भट्ट की पोस्ट को विपक्ष और राजनीतिक जानकार भाजपा की चुनावी रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं। उनका कहना है कि भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि यूकेडी स्वतंत्र राजनीतिक ताकत नहीं रही, जबकि दूसरी ओर इस तरह की टिप्पणी यह भी संकेत देती है कि भाजपा किसी भी संभावित वोट कटवा समीकरण को हल्के में लेने के मूड में नहीं है।
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उत्तराखंड की राजनीति में यूकेडी का वोट प्रतिशत भले सीमित रहा हो, लेकिन त्रिकोणीय मुकाबलों में उसका प्रभाव कई सीटों पर निर्णायक बन सकता है। यही कारण है कि चुनाव से पहले क्षेत्रीय दलों की गतिविधियों पर राष्ट्रीय दलों की पैनी नजर रहती है। हालांकि भाजपा की ओर से इसे सामान्य राजनीतिक टिप्पणी बताया जा सकता है, लेकिन समय और संदर्भ को देखते हुए यह पोस्ट कई सवाल छोड़ गई है। यदि यूकेडी वास्तव में भाजपा के लिए अप्रासंगिक है तो फिर उसके भविष्य को लेकर प्रदेश अध्यक्ष को सार्वजनिक टिप्पणी करने की जरूरत क्यों महसूस हुई?
अब निगाहें यूकेडी की रणनीति पर होंगी। क्या पार्टी पूरे दमखम के साथ चुनावी मैदान में उतरेगी या फिर किसी गठबंधन का रास्ता चुनेगी? इसका जवाब आने वाले महीनों में मिलेगा। लेकिन इतना तय है कि महेंद्र भट्ट की इस एक पोस्ट ने विधानसभा चुनाव से पहले उत्तराखंड की राजनीति में नई बहस जरूर छेड़ दी है।




