जीवन बचाने वाली दवाओं पर राहत का फैसला स्वागतयोग्य, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि बीमारी से जूझते परिवारों की जेब पर अब तक कितना बोझ पड़ता रहा और कीमतों की निगरानी करने वाली व्यवस्था कहां थी? कैंसर मरीज के शरीर पर हमला करता है, लेकिन महंगे इलाज का बोझ उसके पूरे परिवार को तोड़ देता है। बीमारी का पता चलते ही जिंदगी बचाने की जद्दोजहद शुरू होती है। अस्पताल के चक्कर, जांचों का खर्च, दवाओं की कीमतें और भविष्य की अनिश्चितता परिवार को ऐसी सुरंग में धकेल देते हैं, जहां उम्मीद तो दिखाई देती है, लेकिन उससे बाहर निकलने का रास्ता पैसे से होकर गुजरता है। ऐसे में कैंसर की दवाओं के दाम 93 प्रतिशत तक घटाने का सरकारी फैसला राहत की बड़ी खबर है। मगर इस राहत के साथ एक चुभता हुआ सवाल भी खड़ा होता हैकृजब कीमतों में इतनी बड़ी कटौती संभव है, तो जीवन बचाने वाली दवाएं मरीजों की पहुंच से बाहर क्यों थीं? सरकार का फैसला स्वागतयोग्य है, लेकिन केवल स्वागत और प्रचार से जनहित की कसौटी पूरी नहीं होती। असली सवाल यह है कि किन दवाओं के दाम घटे हैं, कितने मरीजों को इसका लाभ मिलेगा और क्या बाजार में नई कीमतों का ईमानदारी से पालन होगा? नौ नवंबर से लागू होने वाली नई दरें यदि मरीजों की जेब पर वास्तविक बोझ घटाती हैं, तो यह महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। लेकिन यदि राहत का बड़ा आंकड़ा सरकारी घोषणाओं में चमकता रहे और मरीज अस्पतालों तथा दवा दुकानों में महंगे इलाज से जूझते रहें, तो ऐसी कटौती का उद्देश्य अधूरा रह जाएगा। जीवनरक्षक दवाओं की कीमतों में 93 प्रतिशत तक की कटौती केवल राहत का आंकड़ा नहीं, बल्कि दवा मूल्य निर्धारण और बाजार की निगरानी पर गंभीर बहस का अवसर भी है। यह मान लेना सही नहीं होगा कि हर दवा की कीमत मनमाने ढंग से तय होती है या हर महंगी दवा अनुचित मुनाफे का परिणाम है। दवाओं के अनुसंधान, निर्माण, तकनीक और वितरण की अपनी लागत होती है। लेकिन इन वास्तविकताओं के बीच यह सुनिश्चित करना भी सरकार की जिम्मेदारी है कि मरीज की विवशता का अनुचित आर्थिक लाभ न उठाया जाए। कैंसर के मरीज के सामने सामान्य उपभोक्ता जैसी स्थिति नहीं होती। वह किसी जरूरी दवा को केवल इसलिए छोड़ नहीं सकता कि बाजार में उसका सस्ता विकल्प उपलब्ध नहीं है। कई बार उपचार की निरंतरता बेहद महत्वपूर्ण होती है। ऐसे में मरीज की जरूरत और उसकी आर्थिक क्षमता के बीच टकराव पैदा होता है। यही कारण है कि जीवनरक्षक दवाओं का बाजार केवल कारोबार का विषय नहीं हो सकता। यहां मुनाफे के साथ मानवीय जिम्मेदारी, पारदर्शिता और सरकारी जवाबदेही भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं। सरकार ने कीमतों में भारी कटौती का फैसला किया है, तो उसे यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि यह किन दवाओं पर लागू है और नई कीमतों का निर्धारण किस आधार पर किया गया है। पुरानी और नई कीमतों की दवावार सूची सार्वजनिक होनी चाहिए। दवा विक्रेताओं, वितरकों और संबंधित अस्पतालों की नियमित जांच होनी चाहिए। कहीं पुरानी कीमत पर बिक्री तो नहीं हो रही, कहीं दवाओं की उपलब्धता में कृत्रिम बाधा तो नहीं पैदा की जा रही और कहीं मरीजों को महंगे विकल्पों की ओर तो नहीं धकेला जा रहा। इन सवालों की निगरानी जरूरी है। क्योंकि भारत में योजनाओं और घोषणाओं की कमी नहीं, असली समस्या कई बार उनके क्रियान्वयन में सामने आती है। मूल्य नियंत्रण तभी सफल माना जाएगा, जब मरीज को दवा खरीदते समय वास्तविक राहत मिले। इसके लिए शिकायत दर्ज कराने की सरल व्यवस्था, समयबद्ध कार्रवाई और नियमों का उल्लंघन करने वालों के खिलाफ प्रभावी कदम जरूरी हैं। सरकार को यह भी बताना चाहिए कि नई कीमतों के बाद मरीजों के वास्तविक खर्च में कितनी कमी आई। जनहित की सफलता का प्रमाण विज्ञापन नहीं, जमीन पर दिखाई देने वाला बदलाव है। लेकिन कैंसर के इलाज की पूरी तस्वीर इससे भी बड़ी है। दवाओं की कीमत कम होने से उपचार का खर्च अपने आप 93 प्रतिशत नहीं घट जाएगा। जांच, शल्य चिकित्सा, विकिरण चिकित्सा, अस्पताल में भर्ती, चिकित्सकीय निगरानी और उपचार के बाद देखभाल पर भी बड़ी रकम खर्च होती है। बीमारी के कारण कामकाज प्रभावित होने और आय घटने का संकट अलग है। यदि दवा सस्ती हो जाए, लेकिन मरीज जांच और अस्पताल का खर्च न उठा पाए, तो राहत अधूरी रहेगी। इसलिए कैंसर के उपचार की संपूर्ण लागत को कम करना स्वास्थ्य नीति का लक्ष्य होना चाहिए। सबसे अधिक चिंता उन परिवारों की है, जिनकी आमदनी सीमित है और जिनके पास बीमारी से लड़ने के लिए पर्याप्त बचत नहीं है। मध्यमवर्गीय परिवार भी गंभीर बीमारी के सामने आर्थिक संकट में फंस सकते हैं। वर्षों की जमा पूंजी उपचार में खर्च हो जाती है और कई परिवार कर्ज के सहारे इलाज जारी रखते हैं। किसी परिवार की आर्थिक स्थिति ऐसी नहीं होनी चाहिए कि उसे जीवन बचाने और भविष्य बचाने में से किसी एक को चुनने की नौबत आ जाए। सरकारी अस्पतालों में आवश्यक दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करना, जांच सुविधाओं का विस्तार करना और स्वास्थ्य योजनाओं का लाभ समय पर पहुंचाना इस दिशा में अनिवार्य कदम हैं। आखिरकार, किसी देश की स्वास्थ्य व्यवस्था की असली परीक्षा यह नहीं है कि वहां कितनी आधुनिक दवाएं उपलब्ध हैं, बल्कि यह है कि जरूरत पड़ने पर आम नागरिक उन्हें खरीद और इस्तेमाल कर सकता है या नहीं। यदि जीवन बचाने वाली दवा मरीज की आर्थिक क्षमता से बाहर है, तो चिकित्सा विज्ञान की प्रगति का लाभ समाज के एक बड़े हिस्से तक नहीं पहुंच पा रहा है। कैंसर की दवाओं के दाम 93 प्रतिशत तक घटाने का फैसला राहत की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है। अब जरूरत इस बात की है कि सरकार इस पहल को पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही से जोड़े। दवाओं की नई कीमतें लागू हों, उनका उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई हो और मरीजों को मिलने वाली वास्तविक राहत का हिसाब सार्वजनिक किया जाए। बीमारी मरीज के शरीर में है, उसकी सजा पूरे परिवार की आर्थिक बर्बादी क्यों बने? जीवन बचाने वाली दवा पर राहत किसी सरकार का उपकार नहीं, जनस्वास्थ्य के प्रति उसकी जिम्मेदारी है। सरकार को यह जिम्मेदारी घोषणा से आगे बढ़कर निभानी होगी, ताकि कैंसर से लड़ रहे किसी मरीज के सामने इलाज और आर्थिक तबाही में से एक चुनने की मजबूरी न रहे।





