- सीएम धामी के बयानों ने प्रदेश की राजनीति में चुनावी संघर्ष की आहट
- कांग्रेस के पाप धो रही प्रदेश सरकार के बयान से विपक्ष ने बढ़ाया दबाव
- प्रदेश में अब तक के भ्रष्टाचार के आरोपों पर दलों को देना होगा हिसाब
देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा का सत्र समाप्त हुआ, लेकिन मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के बयानों ने प्रदेश की राजनीति में चुनावी संघर्ष की आहट तेज कर दी है। कांग्रेस के विरोध-प्रदर्शन पर सवाल उठाते हुए धामी ने कहा कि उनकी सरकार कांग्रेस के पाप धोने का काम कर रही है और सफाई आगे भी जारी रहेगी। यह महज एक राजनीतिक तंज नहीं, बल्कि विपक्ष को उसके अतीत के कठघरे में खड़ा करने की रणनीति का संकेत है। विधानसभा चुनाव 2027 से पहले भाजपा भ्रष्टाचार के सवाल पर कांग्रेस को रक्षात्मक स्थिति में लाना चाहती है, जबकि कांग्रेस मौजूदा सरकार की जवाबदेही को चुनावी मुद्दा बनाने की कोशिश में है।
इस राजनीतिक टकराव की खास बात यह है कि दोनों दल भ्रष्टाचार को हथियार बना रहे हैं, लेकिन दोनों के लिए यही मुद्दा राजनीतिक परीक्षा भी बन सकता है। भाजपा कांग्रेस के शासनकाल और पुराने विवादों का हिसाब मांगना चाहती है। कांग्रेस का जोर मौजूदा सरकार पर लगे आरोपों और उन पर कार्रवाई की स्थिति को लेकर सवाल उठाने पर है। अब मुकाबला केवल आरोप लगाने का नहीं, बल्कि अपने दावों को तथ्यों से साबित करने का है।
मुख्यमंत्री के बयान के राजनीतिक मायने उनकी भाषा से आगे जाते हैं। भाजपा कांग्रेस को केवल कमजोर विपक्ष के रूप में नहीं, बल्कि ऐसे दल के रूप में पेश करना चाहती है, जिसे भ्रष्टाचार और पुराने विवादों पर जवाब देना चाहिए। इस रणनीति से कांग्रेस के लिए सरकार की आलोचना करते समय अपने शासनकाल का बचाव करना भी जरूरी हो जाता है। धामी का संदेश यह है कि कांग्रेस यदि भाजपा सरकार से हिसाब मांगती है, तो उसे अपने अतीत के सवालों का सामना भी करना होगा। यह चुनावी राजनीति का जाना-पहचाना तरीका है विपक्ष के वर्तमान आरोपों का जवाब उसके पुराने रिकॉर्ड से देना। लेकिन इसकी सीमा भी है। किसी पूर्ववर्ती सरकार पर लगे आरोप मौजूदा सरकार के कामकाज का स्वतः प्रमाणपत्र नहीं बन जाते। भाजपा को अपनी उपलब्धियों और जवाबदेही का हिसाब अलग से देना होगा।
हरक सिंह रावत से जुड़े जैनी प्रकरण का उल्लेख इस सियासी बहस को और संवेदनशील बनाता है। ऐसे विवाद नेताओं की सार्वजनिक छवि और राजनीतिक विश्वसनीयता को प्रभावित कर सकते हैं। भाजपा के लिए यह कांग्रेस से जुड़े नेताओं पर सवाल उठाने का अवसर है, जबकि कांग्रेस के लिए अपने नेताओं के पक्ष को स्पष्ट करने की चुनौती। लेकिन यहां राजनीतिक आरोप और कानूनी निष्कर्ष के बीच अंतर बनाए रखना जरूरी है। उपलब्ध पुष्ट जानकारी के आधार पर इस प्रकरण को कांग्रेस के भ्रष्टाचार का निर्णायक प्रमाण नहीं कहा जा सकता। किसी भी आरोप की गंभीरता का निर्धारण संबंधित दस्तावेजों, जांच और कानूनी निष्कर्षों से ही होना चाहिए। यही भाजपा की रणनीति की कसौटी भी है। यदि पार्टी पुराने विवादों को चुनावी मुद्दा बनाती है, तो उसे तथ्य सामने रखने होंगे। केवल आरोप दोहराने से राजनीतिक शोर तो पैदा हो सकता है, लेकिन उससे जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होती।
विधानसभा सत्र के दौरान कांग्रेस ने भ्रष्टाचार सहित विभिन्न मुद्दों पर सरकार को घेरने की कोशिश की। विपक्ष का काम सरकार से सवाल पूछना और उसके फैसलों की जांच करना है। लेकिन इस भूमिका का प्रभाव तभी बढ़ता है, जब विरोध के साथ ठोस तथ्य, स्पष्ट मांगें और वैकल्पिक नीतियां भी सामने रखी जाएं। सदन में हंगामे के बीच 7,844.18 करोड़ रुपये का अनुपूरक बजट और विभिन्न विधायी प्रस्ताव पारित हुए। सत्र के दौरान विपक्ष ने चर्चा की मांग उठाई, जबकि सरकार ने विधायी कार्यवाही आगे बढ़ाई। इस घटनाक्रम ने यह प्रश्न भी छोड़ा कि भ्रष्टाचार और जनहित से जुड़े मुद्दों पर पर्याप्त तथा सार्थक चर्चा हो पाई या नहीं। कांग्रेस के सामने चुनौती यह है कि वह सरकार के खिलाफ लगाए गए आरोपों को प्रमाणों और तथ्यों के साथ जनता के सामने रखे। उसे यह भी स्पष्ट करना होगा कि सत्ता में आने पर पारदर्शिता, जांच और जवाबदेही के लिए उसकी नीति क्या होगी। केवल भाजपा पर हमला करने से वह अपने राजनीतिक अतीत से जुड़े प्रश्नों से मुक्त नहीं हो सकती।
धामी सरकार के सामने भी सवाल कम नहीं हैं। कांग्रेस के शासनकाल के विवादों का उल्लेख करना राजनीतिक रूप से प्रभावी हो सकता है, लेकिन इससे वर्तमान सरकार के खिलाफ उठने वाले सवाल समाप्त नहीं होते। भाजपा को यह बताना होगा कि उसके शासन में भ्रष्टाचार की शिकायतों पर क्या कार्रवाई हुई, जांच कितनी आगे बढ़ी और प्रशासनिक व्यवस्था में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए क्या कदम उठाए गए। यदि मुख्यमंत्री अपनी सरकार को घोटालों से मुक्त बताते हैं, तो इस दावे की विश्वसनीयता केवल राजनीतिक बयान से नहीं, बल्कि पारदर्शी व्यवस्था और निष्पक्ष कार्रवाई से मजबूत होगी। इसी तरह कांग्रेस पर लगाए गए आरोपों का मूल्यांकन भी प्रमाणों के आधार पर होना चाहिए। दोनों दलों के लिए एक ही कसौटी होनी चाहिए आरोप किसी पर भी हों, जांच निष्पक्ष हो और जवाबदेही तय हो।
उत्तराखंड में 2027 का चुनाव भाजपा और कांग्रेस के बीच राजनीतिक विश्वसनीयता की लड़ाई भी बनने जा रहा है। भाजपा कांग्रेस के पुराने विवादों को सामने रखकर सत्ता में वापसी की जमीन मजबूत करना चाहेगी। कांग्रेस मौजूदा सरकार के कामकाज, रोजगार, पलायन, महंगाई और शासन से जुड़े सवालों के आधार पर भाजपा को चुनौती देने की कोशिश करेगी। लेकिन चुनावी रणनीति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि राजनीतिक दल जनता की प्राथमिकताओं से कितना जुड़ते हैं। भ्रष्टाचार महत्वपूर्ण मुद्दा है, पर मतदाता के लिए रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा, सड़क, पलायन और स्थानीय विकास भी उतने ही अहम हैं। केवल एक-दूसरे के अतीत को उछालने से इन सवालों का समाधान नहीं निकलता।
धामी ने भराड़ीसैंण से कांग्रेस को उसके अतीत का हिसाब देने की चुनौती दी है। अब भाजपा को अपने वर्तमान का हिसाब देना होगा और कांग्रेस को अपने आरोपों के प्रमाण सामने रखने होंगे। 2027 की चुनावी लड़ाई में निर्णायक बढ़त उसी पक्ष को मिल सकती है, जो आरोपों के शोर से आगे बढ़कर अपने दावों की विश्वसनीयता साबित करे। सदन में सियासी वार शुरू हो चुका है। लेकिन लोकतंत्र में अंतिम फैसला न मुख्यमंत्री के तीखे बयान से होता है, न विपक्ष की नारेबाजी से। फैसला इस बात से होता है कि जनता के सवालों का जवाब किसने दिया, किसके दावे तथ्यों पर टिके और किसने जवाबदेही से बचने के बजाय उसका सामना किया।





