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दर्द, डेटा और दौलत

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राजनीति में कुछ शब्द भाषण खत्म होने के साथ खत्म हो जाते हैं और कुछ शब्द भाषण के बाद सवाल बनकर रह जाते हैं। प्रयागराज में राहुल गांधी ने युवाओं के संदर्भ में दर्द, डेटा और दौलत की जो त्रयी रखी, वह इसी दूसरी श्रेणी की है। तीन शब्द हैं, लेकिन इनके भीतर आज के युवा भारत की एक लंबी कहानी छिपी है। दर्द उस युवा का है जो पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी की तलाश में वर्षों निकाल देता है। डेटा उस व्यवस्था का सवाल है जो बेरोजगारी, भर्ती, परीक्षा और रोजगार के वास्तविक आंकड़ों को सामने रखने से बचती हुई दिखाई देती है और दौलत उस आर्थिक ढांचे का सवाल है, जिसमें अवसर और संपत्ति का वितरण लगातार बहस का विषय बना हुआ है। राहुल गांधी ने इन तीन शब्दों को एक राजनीतिक सूत्र की तरह पेश किया है। अब इस सूत्र की असली परीक्षा यह है कि क्या विपक्ष इसे केवल भाषण का नारा बनाएगा या युवाओं की जिंदगी बदलने का कार्यक्रम भी तैयार करेगा। युवा बेरोजगार है यह बात अब किसी राजनीतिक दल के लिए नई नहीं है। हर चुनाव में रोजगार सबसे बड़े मुद्दों में शामिल रहता है। लेकिन रोजगार का सवाल सिर्फ नौकरी मिलने या न मिलने का सवाल नहीं है। एक युवा की समस्या तब शुरू होती है जब वह वर्षों तक प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करता है। फिर परीक्षा होती है तो पेपर लीक की खबर आती है। भर्ती प्रक्रिया शुरू होती है तो पदों की संख्या कम पड़ जाती है। परिणाम आता है तो विवाद खड़ा हो जाता है। अदालत जाती है तो साल निकल जाते हैं। युवा की उम्र बढ़ती जाती है और उसकी उम्मीद छोटी होती जाती है। यही दर्द है। यह दर्द केवल आर्थिक नहीं है। इसमें समय का नुकसान है, परिवार की उम्मीदों का दबाव है और उस आत्मविश्वास का टूटना है जो एक युवा को यह विश्वास दिलाता है कि मेहनत करने से उसका भविष्य बेहतर हो सकता है। इसलिए रोजगार पर राजनीति करते समय आंकड़ों से ज्यादा जरूरी है उस युवा की जिंदगी को समझना। लोकतंत्र में आंकड़े सिर्फ संख्या नहीं होते। वे सरकार के कामकाज का आईना होते हैं। कितनी नौकरियां निकलीं?कितनी भर्तियां पूरी हुईं?कितने पद खाली हैं?कितनी परीक्षाएं रद्द हुईं?कितने युवाओं ने परीक्षा दी?कितनों को रोजगार मिला?कितने शिक्षित युवा बेरोजगार हैं? इन सवालों के जवाब सार्वजनिक और विश्वसनीय होने चाहिए। क्योंकि आंकड़ा छिपता है तो बहस अनुमान में बदल जाती है और अनुमान राजनीति का हथियार बन जाता है। युवाओं को केवल यह बताना पर्याप्त नहीं कि रोजगार बढ़ रहा है या अर्थव्यवस्था मजबूत हो रही है। उन्हें यह जानने का अधिकार है कि उस विकास में उनके लिए कितनी जगह बनी है। युवा पूछ रहा हैकृजीडीपी बढ़ी तो मेरी नौकरी कहां बढ़ी? यह सवाल असहज जरूर है, लेकिन लोकतंत्र में असहज सवाल ही सबसे जरूरी सवाल होते हैं। तीसरा शब्द सबसे ज्यादा राजनीतिक है दौलत। देश में संपत्ति पैदा हो रही है। नए उद्योग खड़े हो रहे हैं। कंपनियां बढ़ रही हैं। बाजार फैल रहा है। लेकिन सवाल यह है कि इस आर्थिक विकास का लाभ समाज के कितने हिस्से तक पहुंच रहा है? अगर आर्थिक विकास का बड़ा हिस्सा कुछ लोगों और कुछ क्षेत्रों तक सीमित रह जाए और दूसरी तरफ बड़ी संख्या में युवा स्थायी रोजगार के लिए संघर्ष करते रहें तो विकास का अर्थ अधूरा रह जाता है। दौलत का सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि रोजगार और संपत्ति एक-दूसरे से जुड़े हैं, जिस अर्थव्यवस्था में छोटे कारोबार कमजोर होंगे, स्थानीय उद्योग बंद होंगे, कृषि की आय पर दबाव होगा और रोजगार का बड़ा हिस्सा अस्थायी होगा, वहां केवल आर्थिक विकास के बड़े आंकड़े युवा की बेचौनी को शांत नहीं कर सकते। युवा को सिर्फ नौकरी नहीं चाहिए। उसे अवसर चाहिए। यहां दर्द सिर्फ बेरोजगारी का नहीं है। यह अपने घर से दूर जाने का दर्द भी है। अगर पहाड़ में शिक्षा है लेकिन उसके बाद रोजगार नहीं है, अगर युवा डिग्री लेकर शहर की ओर जाने को मजबूर है, तो विकास की कहानी में एक अध्याय अभी भी अधूरा है। राहुल गांधी ने तीन शब्द कह दिए। अब गेंद विपक्ष के पाले में है। अगर दर्द को राजनीति का मुद्दा बनाया गया है तो उसका समाधान क्या है? अगर डेटा की बात है तो क्या कांग्रेस और विपक्षी दल राज्यों में भर्ती, रोजगार और बेरोजगारी का अपना पारदर्शी डेटा सार्वजनिक करेंगे? अगर दौलत का सवाल उठाया गया है तो क्या वे बताएंगे कि छोटे उद्योग, स्टार्टअप, कृषि, पर्यटन और स्थानीय रोजगार को मजबूत करने की उनकी ठोस आर्थिक नीति क्या होगी? युवा अब केवल भाषण नहीं सुनना चाहता। वह पूछता है मेरे लिए योजना क्या है? यही वह जगह है जहां राजनीतिक नारे और राजनीतिक कार्यक्रम के बीच फर्क दिखाई देता है। भारतीय राजनीति ने लंबे समय तक युवाओं को एक बड़े वोट बैंक के रूप में देखा है। चुनाव आते हैं तो युवा सम्मेलन होते हैं, रोजगार के वादे होते हैं, नई योजनाओं की घोषणाएं होती हैं। लेकिन युवा केवल वोटर नहीं है। वह देश की सबसे बड़ी कार्यशील शक्ति बनने जा रहा है। अगर उसे गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, कौशल, रोजगार और उद्यम का अवसर मिलता है तो वही जनसंख्या आर्थिक ताकत बन सकती है। अगर अवसर नहीं मिलता तो वही जनसंख्या असंतोष का स्रोत भी बन सकती है। इसलिए दर्द, डेटा, दौलत को केवल राहुल गांधी का राजनीतिक नारा समझना गलती होगी। यह तीन शब्द सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए सवाल हैं। दर्द पूछता है युवा परेशान क्यों है? डेटा पूछता है सच्चाई कितनी है? दौलत पूछती है विकास का फायदा किसके पास गया? और लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल इन तीनों को जोड़कर बनता है अगर इसका जवाब हां है तो सरकार को आंकड़ों के साथ सामने आना चाहिए। अगर जवाब नहीं है तो विपक्ष को सिर्फ आलोचना नहीं, विकल्प देना चाहिए। क्योंकि देश का युवा अब भाषणों की तालियों से आगे निकल चुका है। उसे भर्ती की तारीख चाहिए, परीक्षा की विश्वसनीयता चाहिए, रोजगार का अवसर चाहिए और अपनी मेहनत के बदले सम्मानजनक भविष्य चाहिए। दर्द को पहचानना राजनीति की शुरुआत है। डेटा को सामने रखना लोकतंत्र की जिम्मेदारी है। लेकिन उस दर्द को अवसर और दौलत में बदल देनाकृयही असली शासन की परीक्षा है।

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