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70 सीटों का ‘मैजिक’ नंबर 36

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  • चुनाव से पहले गठबंधन और सीटों के तालमेल की सुगबुगाहट
  • बहुमत के आंकड़े के लिए सियासी दल तैयार कर रहे प्लान-बी
  • 70 सीटों वाले उत्तराखंड में एकला चलो या चुनावी साझेदारी
  • छोटे दलों और निर्दलीयों की भूमिका पर होने लगा मंथन तेज

देहरादून। उत्तराखंड विधानसभा चुनाव 2027 अभी कुछ महीने दूर है, लेकिन राजनीतिक दलों ने चुनावी बिसात बिछानी शुरू कर दी है। भाजपा और कांग्रेस जहां अपने-अपने बूथ संगठन को मजबूत करने में जुटी हैं, वहीं पर्दे के पीछे संभावित गठबंधनों और सीटों के तालमेल को लेकर चर्चाओं का दौर भी तेज हो गया है। हालांकि अभी तक किसी बड़े दल ने औपचारिक गठबंधन की घोषणा नहीं की है, लेकिन राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा जोरों पर है कि चुनाव नजदीक आते-आते कई सीटों पर रणनीतिक समझौते देखने को मिल सकते हैं। उत्तराखंड की 70 विधानसभा सीटों में बहुमत का आंकड़ा 36 है। ऐसे में हर सीट का महत्व बढ़ जाता है और यही वजह है कि दल अब जीतने की क्षमता वाले उम्मीदवारों के साथ-साथ संभावित चुनावी साझेदारों के विकल्प भी तलाश रहे हैं।
प्रदेश में भले ही मुकाबला मुख्य रूप से भाजपा और कांग्रेस के बीच हो, लेकिन कई सीटों पर क्षेत्रीय दल, निर्दलीय और स्थानीय प्रभाव वाले नेता चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इसी कारण प्रमुख दल ऐसे क्षेत्रों का आकलन कर रहे हैं, जहां सीधे मुकाबले के बजाय तालमेल अधिक लाभकारी साबित हो सकता है। चर्चा है कि कुछ क्षेत्रीय दल अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में सम्मानजनक सीटों की मांग रख सकते हैं, जबकि बड़े दल भी वोटों के बिखराव को रोकने के लिए सीमित स्तर पर समझौते का विकल्प खुला रखना चाहते हैं।
कांग्रेस संगठन विस्तार के साथ-साथ विपक्षी मतों के एकीकरण की रणनीति पर भी काम कर रही है। पार्टी के भीतर यह आकलन किया जा रहा है कि किन सीटों पर स्थानीय सामाजिक समीकरणों के आधार पर सहयोगी दलों या प्रभावशाली नेताओं के साथ तालमेल लाभदायक हो सकता है। हालांकि प्रदेश नेतृत्व की ओर से अभी गठबंधन को लेकर कोई आधिकारिक संकेत नहीं दिया गया है। दूसरी ओर भाजपा का फोकस फिलहाल संगठन और बूथ प्रबंधन पर दिखाई दे रहा है। पार्टी नेतृत्व कार्यकर्ताओं के माध्यम से गांव-गांव तक पहुंच बढ़ाने और सत्ता विरोधी माहौल को सीमित करने की रणनीति पर काम कर रहा है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा की प्राथमिकता फिलहाल अपने दम पर चुनाव लड़ने की होगी, लेकिन स्थानीय स्तर पर समीकरणों पर नजर बनाए रखी जाएगी।
राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि टिकट वितरण और गठबंधन की रणनीति एक-दूसरे से जुड़ी होगी। यदि किसी सीट पर संभावित सहयोगी दल को स्थान दिया जाता है तो वहां टिकट के दावेदारों की नाराजगी भी सामने आ सकती है। इसलिए दल पहले आंतरिक सर्वे, जीत की संभावना और स्थानीय समीकरणों का आकलन कर रहे हैं। सूत्रों के अनुसार प्रमुख दल कुमाऊं और गढ़वाल मंडलों के लिए अलग-अलग रणनीति तैयार कर रहे हैं, जिन सीटों पर मुकाबला त्रिकोणीय होने की संभावना है, वहां गठबंधन की चर्चा अधिक है, जबकि सीधी टक्कर वाली सीटों पर दल अपने मजबूत प्रत्याशी उतारने के पक्ष में हैं।

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