Home News Posts उत्तराखंड कभी ‘गुस्ताखियों’ का इलाज थी ‘कंडाली थेरेपी’

कभी ‘गुस्ताखियों’ का इलाज थी ‘कंडाली थेरेपी’

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  • पहाड़ की डांट, दर्द और देसी अनुशासन था कंडाली की छपाक
  • कान्वेंट के दौर में गुम हुआ पहाड़ का वह पारंपरिक अनुशासन
  • कंडाली की छपाक बनाती थी फौलाद, अब बदल गया है समय
  • सजा नहीं थी बल्कि पहाड़ी जीवन के कठोर संस्कारों का हिस्सा

देहरादून। पहले पहाड़ में बच्चे की गुस्ताखियों की एक ही सजा होती थी कंडाली की छपाक। आज पहाड़ के गांव खाली हो रहे हैं और जो बच्चे शहरों के कान्वेंट स्कूलों में पढ़ रहे हैं वह बच्चे प्राचीन कंडाली थेरेपी से कोसों दूर हैं। आज की पीढ़ी के लिए अनुशासन का मतलब मोबाइल छीन लेना या इंटरनेट बंद कर देना है। लेकिन जो लोग 80 या 90 के दशक में पहाड़ के सरकारी स्कूलों और खेतों में पले-बढ़े हैं वह जानते हैं कि कंडाली की उस छपाक ने उन्हें कितना मजबूत बनाया।
मोबाइल पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल कोठियाल की एक रिपोर्ट देखते समय कंडाली की छपाक शब्द आया। खाना खाते समय बेटी भी साथ में बैठी थी, तो बेटी ने तपाक से पूछ लिया कि पापा यह कंडाली की छपाक क्या है। कुछ देर में खुद सकपका गया। मैं पहाड़ में जन्मा और कई बार कंडाली की छपाक लगी है। बेटी के प्रश्न का जवाब देने के लिए भूमिका बनाई और उसे विस्तार से जानकारी दी। उसी के बाद मन में आया कि आज बच्चे मोबाइल पर हैं कही न कही उन्हें यह आर्टिकल घूम फिर कर मिल ही जाएगा और उन्हें कंडाली की छपाक पर विस्तार से पढ़ने को मिलेगा।
बता दें कि उत्तराखंड के गांवों में बचपन कभी केवल खिलौनों और मोबाइल की स्क्रीन में नहीं बीतता था। वहां खेत, जंगल, ढलानें थीं और उन्हीं के बीच जीवन के अपने देसी नियम भी थे और गलती होने परकृकंडाली की छपाक का नियम था। कंडाली यानी बिच्छू घास। पहाड़ के जंगलों और खेतों के किनारों पर उगने वाला यह पौधा जितना साधारण दिखता है, उसका स्पर्श उतना ही तीखा होता है। शरीर पर लगते ही जलन, चुभन और बेचौनी शुरू हो जाती है। लेकिन पहाड़ की पुरानी पीढ़ियों के लिए कंडाली केवल एक पौधा नहीं, बल्कि अनुशासन का देसी हथियार हुआ करती थी।
गांवों में जब बच्चे जरूरत से ज्यादा शरारत कर दें, खेतों में नुकसान कर दें, स्कूल से भाग जाएं या बड़ों की बात न मानें, तब कई घरों में डांट के साथ कंडाली की छपाक भी मिलती थी। बुजुर्ग आज भी मुस्कुराते हुए याद करते हैं कि मां या दादी खेत से ताजी कंडाली तोड़ लाती थीं और बस एक हल्की छपाक पूरे शरीर में बिजली-सी दौड़ा देती थी। उस दर्द में आंसू भी होते थे और डर भी। बच्चे घंटों खुजलाते रहते, लेकिन अगले कुछ दिनों तक गलती दोहराने की हिम्मत नहीं होती थी। पहाड़ के कठिन जीवन में यही देसी अनुशासन थाकृन कोई काउंसलिंग, न लंबी समझाइश, बस कंडाली की एक छपाक और सबक तैयार।
हालांकि आज के नजरिए से देखें तो यह तरीका कठोर लग सकता है, लेकिन उस दौर के सामाजिक और पारिवारिक जीवन में इसे सामान्य माना जाता था। पहाड़ का जीवन संघर्षों से भरा था। खेत, पशु, पानी और जंगल के बीच जीने वाले परिवारों में बच्चों को जल्दी जिम्मेदार बनाना जरूरी समझा जाता था। शायद इसी वजह से अनुशासन के तरीके भी उतने ही सख्त थे।
आज गांव बदल रहे हैं। कच्चे आंगन पक्के हो गए हैं, जंगलों की राहें सूनी पड़ रही हैं और बच्चों के खेल मोबाइल में सिमटते जा रहे हैं। नई पीढ़ी शायद कंडाली की छपाक का मतलब भी ठीक से न समझ पाए। लेकिन पहाड़ के बुजुर्गों की यादों में यह शब्द आज भी एक पूरा बचपन जिंदा कर देता है,कृजहां दर्द भी अपना था और अनुशासन भी देसी।

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सजा, दवा और स्वाद
विज्ञान और पहाड़ की परंपराएं भी अजीब हैं, जिस कंडाली से बच्चे खौफ खाते हैं, वही कंडाली पहाड़ की सबसे पौष्टिक डिश भी है। सर्दियों में बनने वाला कंडाली का साग या भुज्जी न सिर्फ आयरन और विटामिन से भरपूर होता है, बल्कि यह शरीर को गर्म रखने और ब्लड प्रेशर को कंट्रोल करने की अचूक दवा भी है। कंडाली का साग आज भी उत्तराखंड के पारंपरिक व्यंजनों में खास स्थान रखता है। यानी जो पौधा बचपन में सजा देता था, वही बड़े होने पर थाली में स्वाद बनकर लौट आता था।

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