- पूर्व मुख्यमंत्री मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी का 91 वर्ष की आयु में दून में निधन
- लंबे समय से थे बीमार, देहरादून स्थित मैक्स अस्पताल में ली खंडूड़ी ने अंतिम सांस
- सैन्य जीवन से लेकर राजनीति तक बेदाग छवि, अनुशासन के लिए जाने गए जनरल
- सैन्य अनुशासन से चलाई सरकार, भ्रष्टाचार के खिलाफ चलाया था जीरो टालरेंस
मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी
जन्म-1 अक्टूबर 1934 देहरादून
मृत्यु-19 मई 2026 देहरादून
पैतृक गांव- मरगदना गांव पौड़ी गढ़वाल उत्तराखंड
देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति का एक स्वर्णिम अध्याय आज शांत हो गया। खंडूड़ी है जरूरी के नारे से जन-जन के हृदय में बसने वाले, पूर्व मुख्यमंत्री और सेना के जांबाज मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी अब हमारे बीच नहीं रहे। लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे खंडूड़ी ने आज सुबह देहरादून के मैक्स अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी सहित देश और राज्य के तमाम दिग्गज नेताओं ने उनके निधन पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए इसे एक युग का अंत बताया है।
पौड़ी गढ़वाल की मिट्टी से निकला वह सख्त सैन्य अधिकारी, जिसने राजनीति में भी अनुशासन को ही अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया, आज पहाड़ की स्मृतियों में अमर हो गया। सेना की वर्दी से लेकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक, खंडूड़ी का व्यक्तित्व हमेशा बेदाग छवि और कठोर प्रशासनिक फैसलों के लिए जाना गया। लोग उन्हें सिर्फ नेता नहीं, बल्कि ईमानदार पहाड़ी जनरल के रूप में याद करते रहे। पौड़ी गढ़वाल के मरगदना गांव में जन्में जनरल खंडूड़ी का जन्म 1 अक्टूबर 1934 में हुआ था। शिक्षा देहरादून और अन्य स्थानों पर हुई और आज उन्होंने अंतिम सांस ली।
बता दें कि जनरल खंडूड़ी ने 1954 से 1991 तक सेना में अपनी सेवाएं देने के बाद जब उन्होंने राजनीति की ऊबड़-खाबड़ जमीन पर कदम रखा तो उनके पास केवल एक ही अस्त्र था अडिग अनुशासन। चाहे केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में सड़क परिवहन मंत्री के रूप में स्वर्णिम चतुर्भुज योजना को रफ्तार देनी हो या उत्तराखंड के मुख्यमंत्री के रूप में भ्रष्टाचार पर लगाम लगानी हो, उन्होंने कभी सि(ांतों से समझौता नहीं किया।
उत्तराखंड राज्य बनने के बाद जब राजनीति में भ्रष्टाचार, गुटबाजी और सत्ता संघर्ष की चर्चाएं तेज थीं, तब खंडूड़ी एक ऐसे चेहरे के रूप में उभरे जिन्होंने शासन में पारदर्शिता और सादगी की बात की। मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने सड़क, सेना और सीमांत क्षेत्रों के विकास को प्राथमिकता दी। पहाड़ के दूरस्थ गांवों तक सड़क पहुंचाने का उनका सपना आज भी कई लोगों की जुबान पर है।
उनकी राजनीतिक शैली भले ही कठोर मानी जाती रही हो, लेकिन पहाड़ का आम आदमी उन्हें भरोसे के प्रतीक के रूप में देखता था। गांवों की चौपालों में अक्सर यह कहा जाता थाकृखंडूड़ी जैसा नेता अब कहां। शायद यही वजह रही कि सत्ता से दूर होने के बाद भी उनके प्रति सम्मान कभी कम नहीं हुआ।
मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने प्रदेश को लोकायुक्त बिल जैसा सख्त कानून देने का साहस दिखाया। वह अक्सर कहते थे कि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी पहाड़ के काम आनी चाहिए। उनकी कार्यशैली में सेना जैसी स्पष्टता थीकृफाइलें रुकती नहीं थीं और भ्रष्टाचार करने वालों के लिए उनके दरबार में कोई जगह नहीं थी। उनकी सादगी का आलम यह था कि मुख्यमंत्री रहते हुए भी वह प्रोटोकाल की तामझाम से दूर रहना पसंद करते थे।
उनके निधन के साथ उत्तराखंड की राजनीति का वह दौर भी मानो विदा हो गया, जिसमें सि(ांत और सादगी अब भी जिंदा दिखाई देती थी। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी समेत कई नेताओं ने उनके निधन पर गहरा शोक जताया और उनके योगदान को अविस्मरणीय बताया।
राष्ट्र प्रथम, फिर प्रदेश और अंत में स्वयं
उनके दौर में लाल बत्ती का मोह त्यागने और नौकरशाही पर नकेल कसने की कई कहानियां आज भी सचिवालय की गलियों में सुनी जाती हैं। उनके लिए राष्ट्र प्रथम, फिर प्रदेश और अंत में स्वयं का मंत्र सिर्फ कहने के लिए नहीं, बल्कि जीने के लिए था। मेजर जनरल भुवन चंद्र खंडूड़ी अब हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी ईमानदारी की विरासत और साफ-सुथरी राजनीति का उनका विजन आने वाली पीढ़ियों के लिए हमेशा एक मशाल का काम करेगा।
जनरल खंडूड़ी एक नजर
1954 में कमीशन प्राप्त किया और 1971 के यु( में महत्वपूर्ण भूमिका
आर्मी में रहते हुए अति विशिष्ट सेवा पदक से उन्हें किया गया सम्मानित
1991 में पहली बार सांसद बने और वाजपेयी सरकार में कैबिनेट मंत्री रहे
2007-2009 और 2011-2012 के बीच दो बार प्रदेश की कमान संभाली
भ्रष्टाचार के खिलाफ जीरो टालरेंस और सशक्त लोकायुक्त कानून के प्रणेता




