तुलसी बाबा ने रामायण में लिखा है कि ‘समरथ को नहीं दोष गुसाई’ यानी जो सामर्थ्यवान है उसके दोष नहीं देखे जाते यानी वह चाहे जो कुछ भी करें वह सब उचित होता है। भले ही तत्कालीन लोग इसे सही मानते हो लेकिन सच यह है कि सत्ता जिसके भी हाथ में होती है और जो जितना अधिक सामर्थ्यवान होता है उससे अधिक उसे शीलवान होना चाहिए, संवेदनशील होना चाहिए तथा अपनी आलोचनाओं को सुनने का सामर्थ्य और धैर्य संयम भी उसके अंदर होना चाहिए। अगर ऐसा नहीं है तो ऐसे राजा को राजा नहीं सिर्फ तानाशाह ही कहा जाता है। जिसके डर से जनता सच कहने का साहस खो देती है। देश की राजनीति और सरकार के बारे में उक्त बातें सार्थक साबित हो रही हैं यही कारण है कि अपने चाल चरित्र और चेहरे के दम पर 2014 में देश की सत्ता पर काबिज होने वाली भाजपा जो स्वयं को पार्टी विद डिफरेंट के साथ अस्तित्व में आई थी आज चौतरफा सवालों के घेरे में है। प्रधानमंत्री से लेकर तमाम दिग्गज बीजेपी नेताओं के चाल और चरित्र को लेकर सोशल मीडिया पर अनगिनत आरोप लगाए जा रहे हैं। पीएम मोदी पर मोदी नामा जैसी किताब लिखने वाली मधु किश्वर हो जिन्होंने अपनी किताब में मोदी की तारीफों के पुल बांधे थे और चाहे सीमा गोविंद सिंह हो जिन्होंने यूपी के पूर्व सीएम कल्याण सिंह पर गंभीर आरोप लगाए हैं, को लेकर इस समय टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर भयंकर बहस छिड़ी हुई है जिसे देख और सुनकर आम आदमी भी हैरान परेशान है उसकी खास बात यह है कि सत्ताधारी दल में पिन ड्रॉप सन्नाटा है कोई कुछ भी कहने और बोलने को तैयार नहीं है। भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी जो बहुत लंबे समय से भाजपा नेताओं के चाल चरित्र पर सवाल खड़े करते रहे हैं इस ताजा प्रकरण से उनका भी और अधिक आक्रामक रुख देखा जा रहा है। एक भाजपा कार्यकर्ता ने अब मधु किश्वर के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज करा दी गई है लेकिन स्वामी के खिलाफ कार्यवाही क्यों नहीं इसे लेकर लोग अभी भी सवाल पूछ रहे हैं। खास बात यह है कि आरोपो के लपेटे में संघ भी आ चुका है क्योंकि संघ ही भाजपा का उत्पत्ति स्रोत है। लेकिन संघ ने भी इस मुद्दे पर खामोशी ओढ़ रखी है। खास तौर पर जब से एफ स्टीन फाइल का खुलासा हुआ है जिसमें देश के नेताओं मंत्रियों तथा उघोगपतियों की सक्रियता का खुलासा हुआ है इस चाल चरित्र और चेहरों से जुड़े मामले ने तूल पकड़ लिया है। जहां तक बात देश के तमाम राज्यों में भाजपा नेताओं के तमाम ऐसे मामले जो कि चाल, चरित्र और महिलाओं के यौन उत्पीड़न से जुड़े हैं चर्चाओं के केंद्र में रहे हैं। बात सिर्फ रवन्ना फाइल की नहीं है खिलाड़ी महिला पहलवानों के शारीरिक उत्पीड़न जिसे लेकर इन महिला खिलाड़ियों ने दिल्ली में प्रदर्शन किया था, उत्तराखंड के अंकिता भंडारी हत्याकांड तक अनेक ऐसे मामले हैं जिन्हें लेकर अभी तक धरने प्रदर्शन जारी हैं। इस तरह के मामलों को लेकर देशभर में जिस तरह की छी—छलेदर हो रही है उससे भी भाजपा को कितना सियासी नुकसान हुआ है या होगा? यह अलग बात है। लेकिन महिलाओं की राजनीति में सक्रियता और उनकी अहमियतता पर जो सवाल उठाए जा रहे हैं वह एक अपुरक क्षति है। जिसके लिए महिलाएं खुद ही जिम्मेदार है। सत्ता का अपना एक चरित्र होना अत्यंत ही जरूरी है। सत्ता का प्रयोग अगर अपनी कलुषित आकांक्षाओं की पूर्ति के लिए किया जाएगा तो उसकी परिणीति अच्छी नहीं हो सकती है सत्ता को चाहिए कि वह चरित्र के सर्वाेच्च उदाहरण पेश करें तभी जनता उसे सर आंखों पर रखती है।


