राजनीति में कब क्या होगा? इसको परखना कोई आसान काम नहीं है। वर्तमान दौर की राजनीति में तो यह और भी मुश्किल इसलिए हो गया है क्योंकि राजनीति का कोई चाल—चरित्र और चेहरा नहीं रह गया है। किसी भी पार्टी और नेता द्वारा कब अलटी—पलटी मार ली जाएगी और बाजी पलट दी जाएगी कुछ भी कहना या उसका अनुमान लगाना भी असंभव हो गया है। सारी राजनीति का खेल सिर्फ राजनीतिक दलों के सत्ता और नेताओं के निजी स्वार्थों के इर्द—गिर्द ही सिमट कर रह गया है। लोकतंत्र और सभी संवैधानिक मर्यादाओं को तार—तार कर चुकी वर्तमान की राजनीति का उद्देश्य अब लोक कल्याण और राष्ट्रीय विकास से कतई नहीं रह गया है। दिल्ली के शराब घोटाले पर कोर्ट का जो फैसला आया है वह अत्यंत ही विस्मयकारी है। इस मामले में जेल काट चुके संभावी उन अभियुक्तों को इस तरह के फैसले की उम्मीद नहीं थी यही कारण है कि इस समय तमाम राजनीति के विश्लेषक मीडिया और नेता इसे अपने—अपने ज्ञान सोच और संभावनाओं की कसौटी पर कसने में लगे हैं। कौन क्या सोचता है यह अलग बात है लेकिन यह फैसला एक परिवर्तनकारी घटना जरूर है जो देश की राजनीति की अबोहवा को तो बदलेगा ही इसके साथ ही इसके दूरगामी परिणाम देश की राजनीति पर देखने को मिल सकते हैं। इस फैसले के बाद जिन बातों पर सबसे अधिक चर्चा हो रही है उसमें इसे एक ऐसा षड्यंत्र होने की संभावना भी जताई जा रही है जैसी अन्ना हजारे आंदोलन के समय भाजपा और संघ द्वारा कांग्रेस की मनमोहन सरकार को उखाड़ फेंकने की बताई जाती है। केजरीवाल व आम आदमी पार्टी जिसे अभी भाजपा की बी टीम माना जाता है कुछ लोग इस फैसले को भी मोदी सरकार और भाजपा के एक और षड्यंत्र के तौर पर देख समझ रहे हैं जिसे आगामी समय में कुछ राज्यों में होने वाले चुनाव में कांग्रेस को हराने और भाजपा की जीत का रास्ता प्रशस्त करने वाला माना जा रहा है। फैसले के बाद जिस तरह के तेवर अरविंद केजरीवाल और राहुल गांधी द्वारा एक दूसरे के खिलाफ दिखाए जा रहे हैं वह इस बात का साफ संकेत है कि यह चुनाव परिणाम इस फैसले से प्रभावित हुए बिना नहीं रहेंगे। जहां भी आम आदमी पार्टी के फुटप्रिंट है उन राज्यों में आम आदमी पार्टी का चुनाव लड़ना कांग्रेस की हार व भाजपा की जीत का कारण बन सकता है। इस फैसले का दूसरा गंभीर प्रभाव उस विपक्षी एकता पर पड़ना भी लाजमी है जिसे हम बीते कुछ समय से संसद और संसद के बाहर भी देख रहे थे। केजरीवाल जब जेल में थे तब हमने सोनिया गांधी को उनकी पत्नी के समर्थन में मंच साझा करते हुए तथा उनसे सहानुभूति जताते व सहारा देते देखा था। लेकिन इस फैसले के बाद केजरीवाल उनके खिलाफ न जाने क्या—क्या कह रहे हैं भाजपा को तो यह अच्छे से पता है कि कोई भी एक अकेला विपक्षी दल उसका किसी चुनाव में मुकाबला नहीं कर सकता है। इसलिए उसका हर संभव प्रयास यही है कि विपक्षी एक साथ नहीं हो सकें। भले ही भाजपा अपने विपक्ष मुक्त लोकतंत्र के मंसूबे में सफल नहीं हो सकी हो लेकिन सत्ता तक पहुंच सके इसमें उसने सफलता हासिल कर ली है। सत्ता में बने रहने के लिए विपक्ष में एक जुटता और एकता न होने देने का ही अब उसकी सफलता का मूल मंत्र बन चुका है इसे विपक्ष भी भले ही जानता समझता है लेकिन अपने तात्कालिक नफा नुकसान कह गणित उसकी एकता के मार्ग में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है।




