नई दिल्ली। आज के समय में कुछ अपराधी ऐसे होते हैं जो पीड़ित को पैसे देकर जेल के सलाखों से बच जाते हैं। ऐसा ही कुछ मद्रास हाई कोर्ट ने किया था। उन्होंने पीड़ित को मुआवजा दिलाने का फैसला किया था। पर मामला जब पहुंचा तो मंगलवार के दिन सुप्रीम कोर्ट ने इसका ऐसा जवाब दिया है, जो देश की सभी अदालतों के लिए एक बड़ी चेतावनी है। जस्टिस विजय बिश्नोई की पीठ ने साफ कर दिया कि मुआवजा पीड़ित के राहत के लिए है, न कि अपराधी के लिए फ्री पास, मद्रास हाई कोर्ट के एक पुराने फैसले को रद्द करते हुए शीर्ष अदालत ने साफ कहा कि न्याय की तराजू को पैसों से नहीं तौला जा सकता है। जस्टिस विजय बिश्नोई ने बताया कि मुआवजा केवल पीड़ित की हानि की भरपाई के लिए है और इसका उद्देश्य अपराधी को सजा से बचाना नहीं है। सजा का उद्देश्य अपराधियों को रोकना और समाज में संदेश देना है कि कोई भी सामाजिक नियम तोड़ने पर इसका दंड भुगतेगा। सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें हत्या के प्रयास के मामले में तीन साल की जेल को सिर्फ दो महीने में घटा दिया गया था, क्योंकि अपराधियों ने प्रत्येक को 50,000 रुपये मुआवजा देने पर सहमति दी थी।
सुप्रीम कोर्ट ने चेताया कि गंभीर अपराधों में मुआवजा बढ़ाकर सजा घटाना खतरनाक है। इससे समाज को यह संदेश जा सकता है कि अपराधी केवल पैसे देकर अपनी जिम्मेदारी से बच सकते हैं। कई हाई कोर्टों में ये गलत प्रवृत्ति देखी गई है कि वे ट्रायल कोर्ट की सजा को बिना सोच-समझे कम कर देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इसे अनुचित और गलत प्रथा बताया है। कोर्ट ने कहा कि अपराधियों को माफ करने के लिए मुआवजा देना न्याय की भावना के खिलाफ है। यह केवल पीड़ित की राहत के लिए है और सजा की जगह नहीं ले सकता है। सभी अदालतों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि सजा और मुआवजा के बीच अंतर साफ रहे और समाज में सही संदेश जाए कि अपराध की कीमत सिर्फ पैसे से नहीं चुकाई जा सकती है।




