वंदे मातरम यह सिर्फ एक गीत नहीं, भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों से जुड़ा वह स्वर है जिसने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ करोड़ों भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना जगाई। ऐसे में जब यह खबर सामने आती है कि कांग्रेस के नेता या कार्यकर्ता वंदे मातरम के केवल दो अंतरे ही गाएंगे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर राष्ट्रगीत भी अब राजनीतिक रणनीति का हिस्सा क्यों बनता जा रहा है? देशभक्ति का प्रमाण किसी गीत की पंक्तियों की संख्या से तय नहीं होना चाहिए। लेकिन जब कोई राजनीतिक दल यह तय करने लगे कि राष्ट्रगीत का कौन सा हिस्सा गाया जाएगा और कौन सा नहीं, तब बहस केवल सांस्कृतिक नहीं रहती, बल्कि राजनीतिक हो जाती है। भाजपा निश्चित रूप से इस मुद्दे को कांग्रेस के खिलाफ इस्तेमाल करेगी। कांग्रेस पर राष्ट्रवाद के सवाल पर घेरा कसने की कोशिश होगी। सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक मंचों तक यह संदेश देने का प्रयास किया जाएगा कि कांग्रेस वंदे मातरम के प्रति पूरी तरह प्रतिबद्ध नहीं है। कांग्रेस को यह समझना होगा कि प्रतीकों की राजनीति में आधा कदम भी कई बार विपक्ष को पूरा नैरेटिव दे देता है। लेकिन दूसरी तरफ भाजपा से भी सवाल पूछा जाना चाहिए क्या राष्ट्रगीत को राजनीतिक हथियार बनाना उचित है? क्या देशभक्ति का पैमाना यह होना चाहिए कि कौन कितनी पंक्तियां गाता है? क्या राष्ट्रवाद का प्रमाण केवल मंच पर नारे लगाने और गीत गाने से तय होगा? वंदे मातरम का इतिहास स्वयं बताता है कि इस गीत का भाव भारत की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय चेतना से जुड़ा रहा है। इसलिए इसके सम्मान को किसी दल विशेष की संपत्ति बना देना भी उतना ही गलत है, जितना इसे लेकर अनावश्यक विवाद खड़ा करना। कांग्रेस यदि दो अंतरे गाने का फैसला करती है तो उसे इसकी स्पष्ट वजह जनता के सामने रखनी चाहिए। यदि यह किसी कार्यक्रम की निर्धारित परंपरा, समय या आयोजन की व्यवस्था से जुड़ा निर्णय है, तो उसे साफ-साफ बताया जाना चाहिए। लेकिन यदि यह राजनीतिक सुविधा के हिसाब से राष्ट्रगीत के चयन का मामला है, तो कांग्रेस को आत्ममंथन करना होगा। क्योंकि राजनीति में कुछ मुद्दे ऐसे होते हैं जहां अस्पष्टता नुकसान करती है। वंदे मातरम उन्हीं मुद्दों में से एक है। दूसरी ओर भाजपा को भी यह याद रखना होगा कि देशभक्ति किसी पार्टी का कापीराइट नहीं है। भारत की आजादी में कांग्रेस की भूमिका का इतिहास है, स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम की भूमिका का इतिहास है और राष्ट्रवाद की अपनी व्यापक भारतीय परंपरा है। इसे केवल चुनावी मंच का नारा बना देना उस विरासत को छोटा करता है। आज जरूरत इस बात की है कि वंदे मातरम को चुनावी विवाद से ऊपर रखा जाए, जो गाए, पूरे सम्मान के साथ गाए। जो न गाए, उससे सवाल हो सकता है, लेकिन देशभक्ति का प्रमाणपत्र बांटने की राजनीति से बचना चाहिए। क्योंकि अंततः सवाल यह नहीं है कि वंदे मातरम् के कितने अंतरे गाए गए। सवाल यह है कि देश के लिए उसमें व्यक्त भावना को राजनीति और समाज ने कितना आत्मसात किया। राष्ट्रगीत की पंक्तियां मंच पर खत्म हो जाती हैं, लेकिन राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी उसके बाद शुरू होती है। अगर राजनीति इस फर्क को समझ ले, तो शायद वंदे मातरम पर विवाद कम और उसके सम्मान पर सहमति ज्यादा दिखाई दे।




