Home उत्तराखंड देहरादून महंगाई की चाशनी में आमजन

महंगाई की चाशनी में आमजन

0
26

चीनी की कीमत बढ़ना सिर्फ बाजार की एक खबर नहीं है। यह उस रसोई की कहानी है जहां हर महीने आमदनी और खर्च के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है। सरकार चाहे महंगाई के आंकड़े कितने ही संतोषजनक क्यों न बताए, लेकिन बाजार में खड़ा उपभोक्ता आंकड़ों से नहीं, कीमतों से अपना घर चलाता है। और जब चीनी जैसी रोजमर्रा की जरूरत की चीज महंगी होती है तो सवाल सिर्फ कुछ रुपये का नहीं, सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं का होता है। महंगाई का सबसे खतरनाक रूप वही है जो धीरे-धीरे सामान्य बना दिया जाए। पहले तेल महंगा हुआ, फिर सब्जियां, दालें और दूसरी खाद्य वस्तुएं महंगी हुईं। अब चीनी की बढ़ती कीमतें बताती हैं कि आम आदमी की रसोई पर दबाव कम नहीं हुआ है। हर बार सरकार के पास कारणों की लंबी सूची होती है उत्पादन, मौसम, मांग, आपूर्ति, परिवहन, वैश्विक बाजार। लेकिन उपभोक्ता के पास सिर्फ एक सवाल हैकृमेरी जेब पर बोझ कम कब होगा? चीनी के मामले में स्थिति और भी दिलचस्प है। खेत में गन्ना पैदा करने वाला किसान अपनी लागत और मेहनत का उचित मूल्य मांगता है। चीनी मिलें अपनी लागत और आर्थिक दबाव का हवाला देती हैं। बाजार में व्यापारी अपनी मजबूरियां गिनाता है। लेकिन इस पूरी श्रृंखला का अंतिम सिरा हमेशा उपभोक्ता ही क्यों बनता है? सरकार को यह जवाब देना होगा कि कीमतों के इस खेल में निगरानी की व्यवस्था कहां है। यदि उत्पादन पर्याप्त है तो कीमत क्यों बढ़ रही है? यदि स्टाक मौजूद है तो बाजार में महंगाई क्यों है? यदि जमाखोरी नहीं है तो उपभोक्ता को राहत क्यों नहीं मिल रही? और यदि अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियां जिम्मेदार हैं तो सरकार के पास उपभोक्ताओं को राहत देने की क्या रणनीति है? यह भी समझना होगा कि चीनी अकेली चीज नहीं है। इसकी कीमत बढ़ने का असर चाय, मिठाई, बेकरी और अनेक खाद्य उत्पादों पर पड़ता है। यानी एक वस्तु की कीमत बढ़ने से महंगाई का असर कई दूसरी वस्तुओं तक पहुंच जाता है। सबसे ज्यादा चोट गरीब और निम्न-मध्यम वर्ग को लगती है, जिसके पास बढ़ते खर्च के मुकाबले आय बढ़ाने के विकल्प सीमित हैं। विडंबना यह है कि राजनीतिक मंचों पर आम आदमी की जिंदगी आसान बनाने के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। लेकिन असली परीक्षा मंच पर नहीं, रसोई में होती है। वहां जनता पूछती है कि महीने के आखिरी सप्ताह में राशन क्यों कम पड़ जाता है? बच्चों की जरूरतों और घर के खर्च के बीच संतुलन क्यों बिगड़ रहा है? और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों पर सरकार की पकड़ आखिर कितनी है? महंगाई को सिर्फ बाजार की समस्या मानकर सरकार अपना पल्ला नहीं झाड़ सकती। सरकार की जिम्मेदारी है कि वह उत्पादन से लेकर वितरण तक पूरी श्रृंखला पर निगरानी रखे, जमाखोरी और कृत्रिम कमी के खिलाफ कार्रवाई करे और किसान तथा उपभोक्ता दोनों के हितों के बीच संतुलन बनाए। क्योंकि किसान को उचित दाम और उपभोक्ता को उचित कीमत दोनों एक साथ संभव हैं। समस्या तब पैदा होती है जब नीति का फायदा किसी और को मिले और कीमत जनता चुकाए। चीनी की कीमतों का मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह सरकार के लिए एक चेतावनी है। महंगाई को आंकड़ों से नहीं, जनता की थाली और रसोई से मापा जाना चाहिए। यदि आम आदमी की खरीदने की क्षमता लगातार कमजोर हो रही है तो आर्थिक विकास के बड़े-बड़े दावे उसके लिए अधूरे हैं। देश को ऐसी अर्थव्यवस्था नहीं चाहिए जिसमें सरकार उपलब्धियों की मिठास का प्रचार करे और जनता महंगाई की कड़वाहट चखे। चीनी महंगी होने का सवाल छोटा हो सकता है, लेकिन इसके पीछे छिपा सवाल बहुत बड़ा है आखिर आर्थिक नीतियों का केंद्र कौन है जनता या बाजार? सरकार को इसका जवाब आंकड़ों में नहीं, राहत देकर देना होगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here