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60 की उम्र में नौकरी खत्म, अफसरों के लिए कुर्सी हाजिर!

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  • आमजन के लिए उम्र की सीमा, साहबों के लिए आजीवन कुर्सी
  • कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, पद बदलते हैं पर चेहरा वही
  • पेंशन भी जेब में और भारी-भरकम संविदा का वेतन भी जारी
  • अफसरों के लिए अनलिमिटेड एक्सटेंशन पर उठे गंभीर सवाल

देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी नौकरी की एक अजीब कहानी है। कर्मचारी की उम्र 60 साल होती है, फाइलों में सेवा समाप्त हो जाती है, पेंशन शुरू हो जाती है, लेकिन कुछ अफसरों की सरकारी पारी खत्म नहीं होती। कुर्सी बदल जाती है, पदनाम बदल जाता है, कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, कभी आयोग तो कभी किसी समिति में नई भूमिका मिल जाती है। यानी सरकारी नौकरी का कैलेंडर आम आदमी के लिए चलता है, लेकिन कुछ खास अफसरों के लिए शायद अतिरिक्त पन्ने भी रखे गए हैं। सवाल यह नहीं है कि किसी सेवानिवृत्त अफसर की विशेषज्ञता का इस्तेमाल क्यों किया जाए। सवाल यह है कि किस आधार पर, कितने समय के लिए और किस पारदर्शी प्रक्रिया के तहत? उत्तराखंड में सेवानिवृत्त सरकारी सेवकों की जनहित और अपरिहार्यता की स्थिति में पुनर्नियुक्ति का प्रावधान है। शासन के एक आदेश में सलाहकार, परामर्शी, विशेष कार्याधिकारी और विशेषज्ञ समन्वयक जैसे पदों पर संविदा के आधार पर तैनाती की व्यवस्था का उल्लेख है।
यहीं से असली सवाल पैदा होता है। अगर सरकार को किसी अफसर का अनुभव इतना जरूरी लगता है कि रिटायरमेंट के बाद भी उसे सरकारी काम सौंपना पड़े, तो फिर क्या राज्य में नई पीढ़ी के अधिकारियों और विशेषज्ञों की कमी है? और अगर कमी है तो उसे दूर करने की योजना क्या है? उत्तराखंड का युवा नौकरी के लिए परीक्षा देता है। हजारों युवा सालों तैयारी करते हैं। रिक्तियों का इंतजार करते हैं। भर्ती परीक्षाओं की तारीख देखते हैं। कभी परीक्षा टलती है, कभी परिणाम का इंतजार होता है। दूसरी तरफ सरकारी व्यवस्था में ऐसी तस्वीर दिखाई देती है जिसमें रिटायर होने के बाद भी अनुभवी अफसरों के लिए सरकारी दरवाजे बंद नहीं होते।
यह विरोधाभास सवाल पूछता है। क्या सरकारी व्यवस्था अनुभव के नाम पर एक ही चेहरे को बार-बार मौका देती रहेगी? सरकार कह सकती है कि अनुभवी अफसरों की जरूरत है। बिल्कुल है। अनुभव किसी भी प्रशासन की पूंजी है। लेकिन अनुभव और स्थायी सरकारी पुनर्वास में अंतर है। किसी विशेष परियोजना के लिए विशेषज्ञ की जरूरत हो तो निश्चित अवधि की नियुक्ति समझ में आती है। लेकिन अगर रिटायरमेंट के बाद लगातार नई जिम्मेदारियां मिलती रहें तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकारी व्यवस्था में पदों का एक अनौपचारिक पोस्ट-रिटायरमेंट क्लब तैयार हो रहा है? और यह सवाल सिर्फ एक सरकार का नहीं है। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन यह व्यवस्था कई बार अपना रास्ता खोज लेती है।
लोकतंत्र में कुर्सी किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती। सरकारी पद जनता के पैसे से चलते हैं। इसलिए जनता को यह जानने का अधिकार है कि रिटायरमेंट के बाद किसी अधिकारी की पुनर्नियुक्ति क्यों की गई, उसके लिए चयन की प्रक्रिया क्या रही, कितने उम्मीदवारों पर विचार हुआ और उसकी नियुक्ति की समयसीमा क्या है। वरना विशेषज्ञता शब्द धीरे-धीरे पहचान का दूसरा नाम बन सकता है। उत्तराखंड जैसे युवा राज्य में यह बहस और जरूरी है। यहां बेरोजगार युवाओं की सबसे बड़ी शिकायत सिर्फ नौकरी की कमी नहीं, बल्कि अवसरों की समानता को लेकर भी है। जब युवा देखता है कि एक ओर सरकारी पदों के लिए उम्र सीमा खत्म हो जाती है और दूसरी ओर कुछ रिटायर अफसरों के लिए सरकारी व्यवस्था में नई भूमिकाएं निकल आती हैं, तो उसके मन में सवाल पैदा होना स्वाभाविक है। सरकार को इस व्यवस्था के लिए एक साफ नीति बनानी चाहिए।
रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति अपवाद हो, परंपरा नहीं। हर पुनर्नियुक्ति के साथ कारण सार्वजनिक हो। पद की अवधि तय हो। काम का स्पष्ट दायरा हो। प्रदर्शन की समीक्षा हो। और जहां काम किसी नियमित सेवा अधिकारी या नए विशेषज्ञ से कराया जा सकता है, वहां सिर्फ पुराने प्रशासनिक संपर्कों के आधार पर नियुक्ति न हो। क्योंकि लोकतंत्र में अनुभव जरूरी है, लेकिन अवसरों का दरवाजा हमेशा एक ही पीढ़ी के लिए खुला रहना जरूरी नहीं है। उत्तराखंड को अब यह तय करना होगा कि सरकारी सेवा का मतलब 60 साल की उम्र में खत्म होने वाली नौकरी है या फिर कुछ लोगों के लिए सरकारी व्यवस्था में चलती रहने वाली दूसरी पारी? अगर दूसरी पारी जरूरी है तो उसके नियम सबके सामने होने चाहिए। वरना जनता यही पूछेगी कि सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट हुआ है या सिर्फ पदनाम से?

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