धराली आपदा पीड़ितों को मिले जख्मों का भर पाना आसान नहीं है। इस आपदा में जिन परिवारों ने अपनों को खोया है और जिनके घर परिवार सब कुछ देखते—देखते खत्म हो गया उनके पास सिसकियों के सिवाय कुछ नहीं बचा है उनका दर्द वही समझ सकते हैं, उनके अलावा इस दर्द को अन्य कोई भी नहीं महसूस कर सकता है। भले ही शासन प्रशासन के स्तर पर उनकी कुछ भी सहायता की जाय वह इन आपदा प्रभावितों के जख्मों को नहीं भर सकती है। धराली में एक नहीं सैकड़ो की संख्या में ऐसे लोग हैं जिन्होंने इस आपदा में न सिर्फ अपने जीवन भर की कमाई और संपदा को खो दिया है बल्कि कई ऐसे भी है जिनके परिवार में अपनों के लिए रोने वाला भी कोई नहीं बचा है। इस आपदा का सबसे दुखद पहलू यह है कि आपदा ने आपदा प्रभावितों की मदद के लिए पहुंचने के भी सभी रास्तों को बंद कर दिया। जिसके कारण पहले दो दिनों तक किसी तरह की कोई मदद प्रभावितों तक पहुंच ही नहीं सकी। सड़क मार्ग इतनी बुरी तरह से क्षतिग्रस्त हो गए कि धराली तक किसी वाहन तो दूर किसी का पैदल पहुंचना भी संभव नहीं हो सका। शासन प्रशासन अपनी पूरी ताकत झोंक कर भी 6 दिन बाद भी इन मार्गों को सुचारू नहीं बना सका है। वही खराब मौसम हेली सेवा को बाधित करता रहा है। भले ही अब धराली तक जेसीबी और ऑकलैंड जैसी भारी मशीनरी पहुंच चुकी हो तथा सर्चिंग डॉग स्क्वायड टीम और वह आधुनिक उपकरण भी पहुंच चुके हो जो मलबे में दबे लोगों का पता लगाने में सक्षम हो लेकिन यह बचाव और राहत काम शुरू होने में अब इतनी देर हो चुकी है कि वहंा जीवन की किसी संभावना की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। 30 से 40 फीट ऊंचे इस मलबे और पत्थरों के ढेर में अब किसी को खोज पाना संभव नहीं है। गंगोत्री से लेकर हर्षिल और गंगनानी तक पसरा इस आपदा क्षेत्र का दायरा इतना बड़ा था कि शासन प्रशासन को यह भी समझ नहीं आ सका कि बचाव और राहत कार्य कहां से शुरू किया जाए। हजारों की संख्या में पर्यटक जगह—जगह फंसे थे। जिन्हें हेली सेवा से रेस्क्यू किया गया अब तक 1200 से अधिक यात्री निकाले जा चुके हैं। जहां तक बात धराली की है तो उसका तो नामोनिशान ही मिट चुका है। यहां इस आपदा में जान माल के नुकसान का आकलन भी संभव नहीं है। न मरने वालो ंकी संख्या का और न लापता लोगों की संख्या का कोई पुख्ता आंकड़ा अब तक सामने आ सका है न आने की संभावना है। इस आपदा ने न सिर्फ राज्य में हो रहे उस अनियोजित विकास पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं बल्कि चार धाम यात्रा को पूरे साल 12 महीने संचालित किए जाने के फैसले को भी गलत साबित कर दिया है जो इसी साल किया गया था। मानसून काल में पहाड़ों पर आवागमन कितनी जटिल समस्या है इसका उदाहरण है यह धराली आपदा। यदि यात्रियों की सुरक्षा नहीं की जा सकती है तो मानसून काल में यात्रा नहीं होनी चाहिए। कुछ लोगों का आकलन है इस आपदा में हजारों लोगों की जान गई हैं लेकिन इसकी पुष्टि संभव नहीं है।




