आजादी के अमृत काल का ढोल पीटने वाले देश के नेताओं द्वारा भले ही एक भारत श्रेष्ठ भारत, विश्व गुरु भारत, आत्मनिर्भर भारत और विकसित भारत तथा घर में घुसकर मारने वाला भारत चौथी और तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने वाला भारत जैसे अनेक लोक लुभावन नारे गढ़ लिए गए हो और इनका प्रचार प्रसार के जरिए जन—जन के जहन में उतार दिया गया हो लेकिन यह सब बातें ठीक वैसे ही जुमलेबाजी है जैसे अभी नीति आयोग की बैठक में जापान को पछाड़कर भारत के विश्व की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का झूठा भरोसा दिया जाना था। देश की राजनीति में यथार्थ के धरातल पर क्या कुछ हो रहा है इसका सच इसके बिलकुल विपरीत है देश की संवैधानिक संस्थाओं के सामने अपना अस्तित्व बचाने की जो चुनौती वर्तमान समय में खड़ी दिखाई दे रही है शायद इससे पूर्व ऐसी स्थिति कभी नहीं देखी गई है। बात सिर्फ उस ईडी और सीबीआई जैसी संस्थाओं के कामकाज और उसके तरीकों की नहीं है नीति आयोग से लेकर इलेक्शन कमीशन तक कोई भी एक भी संस्था ऐसी नहीं है जिस पर गंभीर सवालिया निशान न लगे हो। राजभवनों से लेकर संसद तक की कार्यवाही सवालों के घेरे में है। न्यायपालिका की ओर देश के लोग टकटकी लगाकर देख रहे हैं कि वह संविधान की रक्षा का दायित्व किस तरह निभाता है। अभी कुछ दिन पूर्व जस्टिस चंद्रचूड़ के सेवानिवृत होने के बाद संजीव खन्ना ने सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस का पदभार संभाला था तो उन्होंने एक घोषणा की थी कि वह रिटायरमेंट के बाद कोई पद नहीं लेंगे। इसके बाद अब नए चीफ जस्टिस वी गवई ने यह पद संभाला तो उन्होंने भी जस्टिस खन्ना की तरह कहा कि उन्हें सरकार की कृपा पात्रता स्वीकार नहीं है उन्हें कोई पद नहीं चाहिए। जस्टिस गवई का साफ संदेश है उनकी नियुक्ति संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए हुई है। न्याय पालिका के अंदर से उठने वाली यह आवाज देशवासियों को आस्वस्थ करती है कि न्यायपालिका को अगर कोई खरीदने या अपने प्रभाव में लेने की कोशिश करेगा तो वह सफल नहीं हो सकता है। चीफ जस्टिस गवई के शपथ ग्रहण करते ही उन लोगों की बोलती बंद हो चुकी है जो सुप्रीम कोर्ट सुप्रीम कोड़ा बताने जैसी बेहूदा बातें कर रहे थे। राष्ट्रपति द्वारा उनसे जो 14 सवाल पूछे गए थे उनके एक छोटे से जवाब ने जिसमें उन्होंने कहा कि संविधान से बड़ा कोई नहीं हो सकता चाहे वह कोई भी क्यों न हो सभी को संविधान के दायरे में रहकर ही काम करना होगा। आज जब कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच अधिकारों के दायरे की सीमा रेखाओं की जंग छिड़ी है तथा देश का मीडिया अभिव्यक्ति के और सवाल रखने के अपनी मौलिक ताकत को खो चुका है पत्रकारों को सरकार का दल्ला जैसे शब्दों का प्रयोग किया जा रहा है तब ऐसे में मीडिया से उसके संवैधानिक दायित्वों को पूरा करने या निभाने की क्या उम्मीद की जा सकती है। ऐसी स्थिति में सिर्फ न्यायपालिका ही एकमात्र संविधान संरक्षण का जरिया शेष बचता है। आज जब देश का समाज नफरत की लपटों से घिरा हुआ है तथा मनमाने ढंग से चलने की जिद पर अड़ा हुआ है और मीडिया का काम सरकार की आरती उतारने भर का रह गया है न्यायपालिका को संविधान की हिफाजत के लिए कड़े फैसले लेने ही पड़ेंगे और यह काम अपने निजी स्वार्थ को त्याग कर ही किया जा सकता है।


