August 22, 2026मुंबई। महाराष्ट्र पुलिस के लिए सालों तक ड्यूटी करने वाले डॉग्स अब रिटायरमेंट के बाद अकेले नहीं होंगे। सरकार ने इनके लिए ऐसी व्यवस्था करने का फैसला किया है, जिसमें रिटायर होने के बाद भी उनका साथ उनके पुराने हैंडलर से नहीं छूटेगा। इन डॉग्स को अब किसी बाहरी व्यत्तिQ को गोद देने के बजाय पुलिस विभाग के साथ ही रखा जाएगा। उनके खाने—पीने से लेकर इलाज और देखभाल तक का खर्च महाराष्ट्र का गृह विभाग उठाएगा।मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि पुलिस बल में करीब 10 साल तक सेवा देने वाले इन डॉग्स ने अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा ड्यूटी में लगाया है। ऐसे में रिटायरमेंट के बाद उन्हें किसी तरह की परेशानी नहीं होनी चाहिए और वे सम्मान के साथ अपना बाकी जीवन बिता सकें, इसकी जिम्मेदारी सरकार की है।महाराष्ट्र पुलिस की कैनाइन यूनिट में शामिल डॉग्स करीब एक दशक तक सक्रिय सेवा देने के बाद ऑपरेशनल ड्यूटी से रिटायर होते हैं। पहले रिटायरमेंट के बाद इन्हें पुलिस विभाग से बाहर लोगों को गोद देने की व्यवस्था थी। अब सरकार ने इस नीति में बदलाव किया है। नई व्यवस्था के तहत रिटायर होने के बाद भी ये डॉग्स पुलिस विभाग और अपने पुराने हैंडलर के साथ ही रहेंगे। यानी ड्यूटी खत्म होने के बाद भी उनका पुलिस परिवार से रिश्ता बना रहेगा।इस फैसले के पीछे सिर्फ डॉग्स की देखभाल नहीं, बल्कि उनके और हैंडलर के बीच बनने वाला भावनात्मक रिश्ता भी एक बड़ी वजह है। करीब 10 साल तक एक ही हैंडलर के साथ रहकर ट्रेनिंग, ड्यूटी और ऑपरेशन में हिस्सा लेने के दौरान दोनों के बीच गहरा जुड़ाव बन जाता है। ऐसे में रिटायरमेंट के बाद अचानक हैंडलर से अलग कर किसी नए घर या नए माहौल में भेजना कई बार डॉग्स के लिए परेशानी का कारण बनता था। नए माहौल में उनके तनाव में आने और कुछ मामलों में खाना तक छोड़ देने की स्थिति सामने आने की बात कही गई है।नई नीति के मुताबिक पुलिस डॉग्स ऑपरेशनल ड्यूटी से रिटायर होने के बाद भी पुलिस विभाग की देखरेख में रहेंगे। उनके भोजन, स्वास्थ्य, चिकित्सा और रोजमर्रा की जरूरतों का खर्च गृह विभाग उठाएगा। यानी करीब एक दशक तक देश और समाज की सुरक्षा में पुलिस के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने वाले इन वफादार श्चार पैरों वाले जवानोंश् को रिटायरमेंट के बाद किसी सहारे की तलाश नहीं करनी पड़ेगी। ड्यूटी के दौरान वफादारी निभाने वाले इन पुलिस डॉग्स के लिए अब रिटायरमेंट का मतलब विदाई नहीं, बल्कि सम्मान के साथ एक नई जिंदगी की शुरुआत होगी।
August 22, 2026हरिद्वार। उत्तराखण्ड के मैदानी जिले इन दिनों गोलियों की तड़तड़ाहट से गुंजायमान है। बीते दो दिन पूर्व जहंा राजधानी दून की सड़कों पर बदमाशों द्वारा गोलियंा बरसाई गयी वहीं एक बार फिर बीती रात धर्मनगरी हरिद्वार की सड़क पर बदमाशो का ताडव सामने आया है। यहंा बदमाशों द्वारा सरेराह शराब कैंटीन संचालक पर गोलिया बरसाकर हत्या कर दी गयी। सूचना मिलने पर पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर बदमाशों की तलाश शुरू कर दी है।जानकारी के अनुसार, ढंडेरा निवासी अमन लंबे समय से क्षेत्र में शराब की कैंटीन का संचालन कर रहे थे। बीती देर रात उन्होंने अपनी कैंटीन बंद की और घर लौटने के लिए निकल पड़े। रास्ते में पहले से घात लगाए बैठे दो बाइक सवार बदमाशों ने उन्हें रोक लिया। कुछ ही क्षणों में उन्होंने अमन पर ताबड़तोड़ गोलियां दाग दीं। गोलियां लगते ही अमन गंभीर रूप से घायल होकर सड़क पर गिर पड़े। गोलियों की आवाज सुनकर आसपास के लोग तुरंत मौके पर पहुंचे। उन्होंने घायल अमन को देखा और तुरंत पुलिस को सूचना दी। पुलिस ने बेहद तेजी से कार्रवाई करते हुए घायल को नजदीकी अस्पताल पहुंचाया। अस्पताल पहुंचने पर डॉक्टरों ने अमन को मृत घोषित कर दिया। पुलिस ने शव का पंचनामा तैयार कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया है। घटना की सूचना मिलते ही सिविल लाइंस कोतवाली के वरिष्ठ अधिकारियों ने मौके पर पहुंचकर बारीकी से निरीक्षण किया। बदमाशों को पकड़ने के लिए पूरे इलाके में कांबिंग ऑपरेशन चलाया गया। देर रात तक हालांकि किसी ठोस सुराग का पता नहीं चल सका। पुलिस का कहना है कि आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगाली जा रही है। घटना की सटीक वजह अभी स्पष्ट नहीं हो पाई है, लेकिन प्रथम दृष्टया पुलिस इसे पुरानी रंजिश से जोड़कर देख रही है। वहींहत्या की खबर फैलते ही ढंडेरा और आसपास के क्षेत्रों में आक्रोश की लहर दौड़ गई। लोगों ने सिविल लाइंस कोतवाली पहुंचकर जोरदार हंगामा किया और पुलिस थाने का घेराव कर दिया। भीड़ ने पुलिस से आरोपियों को जल्द गिरफ्तार करने और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की मांग की। स्थानीय निवासियों का कहना है कि इलाके में इस तरह की घटनाओं से लोगों में भय का माहौल बन गया है।
August 22, 2026देहरादून। मेरे सपनों का उत्तराखंड’ अभियान को प्रदेश के विघार्थियों से अभूतपूर्व प्रतिक्रिया मिल रही है। राज्यभर से अब तक 2.5 लाख से अधिक विघार्थियों ने अपने निबंध एवं सुझाव पोर्टल पर जमा कर उत्तराखंड के भविष्य को लेकर अपना विजन साझा किया है।मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की पहल पर शुरू किए गए मेरे सपनों का उत्तराखंड’ अभियान को प्रदेश के विघार्थियों से अभूतपूर्व प्रतिक्रिया मिल रही है। राज्यभर से अब तक 2.5 लाख से अधिक विघार्थियों ने अपने निबंध एवं सुझाव पोर्टल पर जमा कर उत्तराखंड के भविष्य को लेकर अपना विजन साझा किया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने बीते 10 अगस्त को प्रदेशभर के कक्षा 11वीं एवं 12वीं के लगभग तीन लाख विघार्थियों के साथ ऑनलाइन संवाद करते हुए उनसे आह्वान किया था कि वे बताएं कि आने वाले वर्षों में वे अपने उत्तराखंड को किस रूप में देखना चाहते हैं। मुख्यमंत्री के इस आह्वान के बाद सरकारी एवं निजी विघालयों के विघार्थियों ने बड़े उत्साह के साथ अभियान में भागीदारी की। विघार्थियों ने पर्यटन, रोजगार, सामाजिक विकास, वन एवं पर्यावरण, शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक सहित आठ प्रमुख विषयों पर अपने सुझाव और नए विचार प्रस्तुत किए हैं। खास बात यह है कि ये केवल निबंध नहीं, बल्कि उत्तराखंड की नई पीढ़ी की आकांक्षाओं और भविष्य के प्रदेश को लेकर उनकी सोच का दस्तावेज बन रहे हैं। मुख्यमंत्री धामी ने स्पष्ट किया है कि विघार्थियों से प्राप्त अच्छे और व्यावहारिक सुझावों का स्वयं अवलोकन किया जाएगा तथा उपयोगी विचारों को राज्य की नीतियों एवं भविष्य की कार्ययोजनाओं में शामिल करने की दिशा में भी कार्य किया जाएगा। अभियान के अंतर्गत 140 श्रेष्ठ विचारों का चयन किया जाएगा। चयनित विघार्थियों को शासन के वरिष्ठ अधिकारियों एवं सचिवों के साथ अपने विचारों पर चर्चा करने का अवसर मिलेगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी भी इन विघार्थियों के साथ स्वयं संवाद कर उनके विजन और अनुभवों को सुनेंगे। इसके साथ ही श्रेष्ठ विघार्थियों को करियर एवं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में सहयोग और अन्य पुरस्कार प्रदान किए जाने की भी व्यवस्था की गई है। पोर्टल पर निबंध जमा करने वाले विघार्थियों को डिजिटल प्रमाण पत्र भी प्रदान किया जा रहा है। अभियान में प्रदेश के पर्वतीय एवं मैदानी क्षेत्रों के साथ ही सरकारी और निजी विघालयों के विघार्थियों की व्यापक भागीदारी देखने को मिल रही है। अभियान के संयोजक डॉ. राहुल अग्रवाल ने बताया कि नई पीढ़ी को सीधे राज्य की विकास प्रक्रिया और नीति निर्माण की सोच से जोड़ने की यह एक अभिनव पहल है। प्रदेश के अलग—अलग हिस्सों से लगातार प्रविष्टियां प्राप्त हो रही हैं। 24 अगस्त निबंध जमा करने की अंतिम तिथि निर्धारित की गई है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी स्वयं अभियान की नियमित समीक्षा कर रहे हैं। सरकार का प्रयास है कि प्रदेश की युवा पीढ़ी केवल विकास योजनाओं की लाभार्थी न रहे, बल्कि ट्टविकसित उत्तराखंड’ की संकल्पना और नीति निर्माण में सक्रिय भागीदार भी बने। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कहा कि “हमारे विघार्थी केवल उत्तराखंड का भविष्य नहीं हैं, बल्कि उनके विचार आज के उत्तराखंड को भी नई दिशा देने की क्षमता रखते हैं। ट्टमेरे सपनों का उत्तराखंड’ के माध्यम से हम नई पीढ़ी की सोच को सुन रहे हैं। युवाओं के अच्छे और व्यावहारिक सुझावों को प्रदेश के विकास में स्थान दिया जाएगा। हमारा संकल्प है कि युवा जिस उत्तराखंड का सपना देख रहे हैं, उसे साकार करने में उन्हें भी सहभागी बनाया जाए।”
August 22, 2026लखनऊ। उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले नेताओं की सुरक्षा को लेकर अब तक का सबसे बड़ा और अभूतपूर्व कदम उठाया है। गृह मंत्रालय की सलाह पर यूपी के सुरक्षा मुख्यालय ने राज्य के 52 प्रमुख नेताओं को करीब 1.5 लाख रुपए की कीमत वाली हाई—टेक बुलेटप्रूफ जैकेट मुहैया कराई हैं।सुरक्षा मुख्यालय ने पहले चरण में 8 और दूसरे चरण में 44 नेताओं को जैकेट सौंपी, जिससे कुल संख्या 52 हो गई है। सुरक्षा केवल सत्ता पक्ष तक सीमित नहीं है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती के अलावा कैबिनेट मंत्री नंद गोपाल गुप्ता श्नंदीश्, संजय निषाद, ओपी राजभर, रामपुर से विधायक आकाश सक्सेना, राज्य महिला आयोग की उपाध्यक्ष अपर्णा यादव, संगीत सोम और सुरेश राणा जैसे बड़े नाम शामिल हैं। इस सुरक्षा व्यवस्था में योगी सरकार के 11 कैबिनेट मंत्रियों को भी शामिल किया गया है। उत्तर प्रदेश की 18वीं विधानसभा का कार्यकाल मई 2027 में समाप्त हो रहा है। नियमानुसार, अगले यानी 19वीं विधानसभा के चुनाव फरवरी— मार्च 2027 के दौरान आयोजित होने प्रस्तावित हैं। चुनाव की घोषणा जनवरी 2027 की शुरुआत में हो सकती है। यूपी में कुल 403 विधानसभा सीटें हैं।
August 22, 2026उत्तरकाशी। यमुनोत्री विधानसभा से निर्दलीय विधायक संजय डोभाल ने आज दूसरे दिन जिला प्रशासन कार्यालय के मुख्य द्वार पर धरना दिया। विधायक ने जिला योजना में कथित 10 प्रतिशत कमीशन के आरोपों की जांच और दोषियों के खिलाफ कार्यवाही किए जाने हेतू लिखित आश्वासन देने की मांग को लेकर प्रशासन से प्रत्यक्ष वार्ता करने की मांग की है।विधायक और उनके समर्थक निर्धारित समय पर डीएम कार्यालय पहुँचे, तो डीएम दफ्तर के भीतर किसी भी वरिष्ठ अधिकारी की अनुपस्थिति को लेकर तीखा सवाल उठाया गया। विधायक ने प्रश्न किया कि जब मैंने पूर्व में बता दिया था कि आज मैं डीएम कार्यालय आऊँगा, तब डीएम साहब कार्यालय से गायब क्यों हैं? संजय डोभाल ने जिला योजना में 10 प्रतिशत कमीशन लगाए जाने का गंभीर आरोप लगाया है। उनका कहना है कि यह भ्रष्टाचार सीधे—सीधे विकास योजनाओं और आम जनता के हितों से छेड़छाड़ है। उन्होंने मांग की है कि भ्रष्टाचार में नामजद अधिकारियों और बिचोलियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की जाए, प्रभावित योजनाओं का जनप्रतिनिधि के समक्ष फिर से वितरित कराई जाए। विधायक ने यह भी कहा कि वे शांति एवं सभ्य तरीके से वे अपनी मांगें रख रहे हैं, पर यदि प्रशासन ने लिखित आश्वासन नहीं दिया तो आंदोलन तेज किया जाएगा और उत्तरकाशी जिला मुख्यालय से लेकर संबंधित गांवों तक व्यापक विरोध—प्रदर्शन किए जाएँगे।
August 22, 2026आमजन के लिए उम्र की सीमा, साहबों के लिए आजीवन कुर्सी कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, पद बदलते हैं पर चेहरा वही पेंशन भी जेब में और भारी-भरकम संविदा का वेतन भी जारी अफसरों के लिए अनलिमिटेड एक्सटेंशन पर उठे गंभीर सवाल देहरादून। उत्तराखंड में सरकारी नौकरी की एक अजीब कहानी है। कर्मचारी की उम्र 60 साल होती है, फाइलों में सेवा समाप्त हो जाती है, पेंशन शुरू हो जाती है, लेकिन कुछ अफसरों की सरकारी पारी खत्म नहीं होती। कुर्सी बदल जाती है, पदनाम बदल जाता है, कभी सलाहकार तो कभी विशेषज्ञ, कभी आयोग तो कभी किसी समिति में नई भूमिका मिल जाती है। यानी सरकारी नौकरी का कैलेंडर आम आदमी के लिए चलता है, लेकिन कुछ खास अफसरों के लिए शायद अतिरिक्त पन्ने भी रखे गए हैं। सवाल यह नहीं है कि किसी सेवानिवृत्त अफसर की विशेषज्ञता का इस्तेमाल क्यों किया जाए। सवाल यह है कि किस आधार पर, कितने समय के लिए और किस पारदर्शी प्रक्रिया के तहत? उत्तराखंड में सेवानिवृत्त सरकारी सेवकों की जनहित और अपरिहार्यता की स्थिति में पुनर्नियुक्ति का प्रावधान है। शासन के एक आदेश में सलाहकार, परामर्शी, विशेष कार्याधिकारी और विशेषज्ञ समन्वयक जैसे पदों पर संविदा के आधार पर तैनाती की व्यवस्था का उल्लेख है।यहीं से असली सवाल पैदा होता है। अगर सरकार को किसी अफसर का अनुभव इतना जरूरी लगता है कि रिटायरमेंट के बाद भी उसे सरकारी काम सौंपना पड़े, तो फिर क्या राज्य में नई पीढ़ी के अधिकारियों और विशेषज्ञों की कमी है? और अगर कमी है तो उसे दूर करने की योजना क्या है? उत्तराखंड का युवा नौकरी के लिए परीक्षा देता है। हजारों युवा सालों तैयारी करते हैं। रिक्तियों का इंतजार करते हैं। भर्ती परीक्षाओं की तारीख देखते हैं। कभी परीक्षा टलती है, कभी परिणाम का इंतजार होता है। दूसरी तरफ सरकारी व्यवस्था में ऐसी तस्वीर दिखाई देती है जिसमें रिटायर होने के बाद भी अनुभवी अफसरों के लिए सरकारी दरवाजे बंद नहीं होते।यह विरोधाभास सवाल पूछता है। क्या सरकारी व्यवस्था अनुभव के नाम पर एक ही चेहरे को बार-बार मौका देती रहेगी? सरकार कह सकती है कि अनुभवी अफसरों की जरूरत है। बिल्कुल है। अनुभव किसी भी प्रशासन की पूंजी है। लेकिन अनुभव और स्थायी सरकारी पुनर्वास में अंतर है। किसी विशेष परियोजना के लिए विशेषज्ञ की जरूरत हो तो निश्चित अवधि की नियुक्ति समझ में आती है। लेकिन अगर रिटायरमेंट के बाद लगातार नई जिम्मेदारियां मिलती रहें तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या सरकारी व्यवस्था में पदों का एक अनौपचारिक पोस्ट-रिटायरमेंट क्लब तैयार हो रहा है? और यह सवाल सिर्फ एक सरकार का नहीं है। सत्ता बदलती है, चेहरे बदलते हैं, लेकिन यह व्यवस्था कई बार अपना रास्ता खोज लेती है।लोकतंत्र में कुर्सी किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं होती। सरकारी पद जनता के पैसे से चलते हैं। इसलिए जनता को यह जानने का अधिकार है कि रिटायरमेंट के बाद किसी अधिकारी की पुनर्नियुक्ति क्यों की गई, उसके लिए चयन की प्रक्रिया क्या रही, कितने उम्मीदवारों पर विचार हुआ और उसकी नियुक्ति की समयसीमा क्या है। वरना विशेषज्ञता शब्द धीरे-धीरे पहचान का दूसरा नाम बन सकता है। उत्तराखंड जैसे युवा राज्य में यह बहस और जरूरी है। यहां बेरोजगार युवाओं की सबसे बड़ी शिकायत सिर्फ नौकरी की कमी नहीं, बल्कि अवसरों की समानता को लेकर भी है। जब युवा देखता है कि एक ओर सरकारी पदों के लिए उम्र सीमा खत्म हो जाती है और दूसरी ओर कुछ रिटायर अफसरों के लिए सरकारी व्यवस्था में नई भूमिकाएं निकल आती हैं, तो उसके मन में सवाल पैदा होना स्वाभाविक है। सरकार को इस व्यवस्था के लिए एक साफ नीति बनानी चाहिए।रिटायरमेंट के बाद नियुक्ति अपवाद हो, परंपरा नहीं। हर पुनर्नियुक्ति के साथ कारण सार्वजनिक हो। पद की अवधि तय हो। काम का स्पष्ट दायरा हो। प्रदर्शन की समीक्षा हो। और जहां काम किसी नियमित सेवा अधिकारी या नए विशेषज्ञ से कराया जा सकता है, वहां सिर्फ पुराने प्रशासनिक संपर्कों के आधार पर नियुक्ति न हो। क्योंकि लोकतंत्र में अनुभव जरूरी है, लेकिन अवसरों का दरवाजा हमेशा एक ही पीढ़ी के लिए खुला रहना जरूरी नहीं है। उत्तराखंड को अब यह तय करना होगा कि सरकारी सेवा का मतलब 60 साल की उम्र में खत्म होने वाली नौकरी है या फिर कुछ लोगों के लिए सरकारी व्यवस्था में चलती रहने वाली दूसरी पारी? अगर दूसरी पारी जरूरी है तो उसके नियम सबके सामने होने चाहिए। वरना जनता यही पूछेगी कि सरकारी नौकरी से रिटायरमेंट हुआ है या सिर्फ पदनाम से?