देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कल एक बार फिर देशवासियों के सामने अपने मन की बात सुनाने के लिए टीवी पर आए और उन्होंने कहा कि देशवासियों के मन में पहलगाम की घटना को लेकर भारी आक्रोश और गुस्सा है तथा घटना के दोषियों को बक्शा नहीं जाएगा उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी। इससे 2 दिन पूर्व की बात है जब देश के लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी को बिहार के मधुबनी में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के साथ सार्वजनिक मंच पर हंसी ठिठोली करते हुए अत्यंत ही प्रसन्न मुद्रा में देखा था जिसे देखकर देश के आम आदमी को ऐसा लगा था कि उन्हें किसी बात से कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। देशभर में उनके इस अंदाज को देखकर लोगों ने सोशल मीडिया पर उनके बारे में न जाने क्या—क्या कहा भी। हालांकि यहां उन्होंने अपने जन संबोधन में भी पाकिस्तान और आतंकियों को कड़ा सबक सिखाने और सजा देने की बात कही गई थी यही नहीं इस हमले पर बुलाई गई सर्व दलीय बैठक में उनकी अनुपस्थिति तथा चुनावी सभा में शिरकत करने को लेकर भी तमाम सवाल विपक्ष के नेताओं द्वारा तो कहे ही गए, अगर भाजपा सांसद सुब्रमण्यम स्वामी के पोस्ट आप पढ़ ले तो आपको लगेगा कि उनके रवैये को लेकर नेताओं और आम आदमी में उतना ही आक्रोश है जितना लगातार हो रही इस तरह की आतंकी घटनाओं को लेकर है। पुलवामा में सीआरपीएफ के 40 जवानों की मौत के बाद अब पहलगाम में 28 लोगों की जिस तालिबानी अंदाज में आतंकियों द्वारा हत्या की गई है वह कोई मामूली घटना नहीं है। अगर इतनी बड़ी घटना को भी केंद्र सरकार या कोई नेता गंभीरता से नहीं ले रहा है तो इससे ज्यादा दुर्भाग्यपूर्ण और चिंताजनक बात कुछ नहीं हो सकती है। देश के हर आम आदमी से लेकर समूचे विपक्ष तक का जिस तरह से सरकार को समर्थन मिल रहा है ऐसे में सरकार के सामने कड़े से कड़े फैसले लेने में भी कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए। देश की जनता ने आपको लगातार तीसरी बार अगर अपना समर्थन देकर सत्ता शीर्ष पर बैठाया है तो फिर जनता की अपेक्षा पर खरे उतरने की चुनौती को आपको स्वीकार करना ही होगा और न करने की स्थिति में जनता तो आपसे सवाल करेंगी ही। क्योंकि जनता सिर्फ आपको अपना वोट देने और आतंकियों के हाथों मरने अथवा भय के साए में जीने के लिए नहीं बनी है। लोग ऐसी स्थिति में अगर देश के प्रधानमंत्री और गृहमंत्री से सवाल कर रहे हैं तो उन्हें जनता के सवालों का जवाब देने के लिए जनता के सामने आना ही चाहिए। अच्छा होता कि खुद पीएम इस मुद्दे पर कोई पत्रकार वार्ता करते और अपनी बात जनता तक पहुंचाते। लेकिन वह अपने मन की बात कहने का जरिया सिर्फ अपने मन की बात कार्यक्रम को ही बना चुके हैं क्योंकि यहां सिर्फ वह अपनी मन की बात कहते हैं उनसे पूछा कुछ नहीं जा सकता है।


