अपने पूरे कार्यकाल में विवादों में घिरे रहे मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार आज सेवानिवृत हो जाएंगे। उनकी सेवा निवृत्ति से एक दिन पूर्व केंद्र सरकार द्वारा अपने द्वारा बनाये गये चुनाव आयोग में आयुक्तों की नियुक्ति के लिए बनाई गई नई व्यवस्था के तहत डा. ज्ञानेश कुमार को नया मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्त कर दिया गया है। खास बात यह है कि चुनाव आयोग में आयुक्तों की नियुक्तियाें को लेकर विपक्ष द्वारा सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर जो निष्पक्षता की मांग की गई थी तथा सरकार पर चुनाव आयोग अपने नियंत्रण में रखने का जो आरोप लगाया गया था उस पर 19 फरवरी यानी कल सुनवाई की जानी है लेकिन इससे पूर्व ही मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति कर दी गई है। वर्तमान सरकार द्वारा बनाई गई व्यवस्था के तहत मुख्य न्यायाधीश जो नियुक्ति समिति के सदस्य हुआ करते थे की व्यवस्था को समाप्त करते हुए प्रधानमंत्री तथा गृहमंत्री और नेता विपक्ष को इस समिति में रखा गया है। सीधे सपाट शब्दों में इस बदलाव के जरिए सत्ता पक्ष नें आयुक्तों की नियुक्ति पर अपना पूर्ण नियंत्रण कर लिया गया है। नेता विपक्ष जो इस समिति के तीसरे सदस्य होते हैं उनका सदस्य होना न होना कोई मायने नहीं रखता है न उनकी राय का कोई औचित्य रह जाता है तीन सदस्यीय इस समिति में सत्ता पक्ष के दो सदस्य जो भी फैसला लेते हैं वही मान्य होता है। कल भी यही हुआ नेता विपक्ष राहुल गांधी इस मुख्य चुनाव आयुक्त की निर्वाचन प्रणाली की बैठक में शामिल जरूर हुए लेकिन पीएम मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के सामने इस पर फैसला 2—1 से सरकार के पक्ष में होना पहले से तय था। राहुल गांधी तो इस बैठक में सिर्फ अपनी आपत्ति दर्ज कराने के लिए ही गए हुए थे और उन्होंने किया भी वही। उन्होंने चुनाव आयोग जैसी सबसे महत्वपूर्ण लोकतांत्रिक संस्था के आयुक्तों की नियुक्तियों पर सवाल उठाते हुए कहा कि सरकार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार करना चाहिए अगर निर्वाचन आयोग के आयुक्त की नियुक्तियां निष्पक्ष नहीं होगी तो चुनाव भी निष्पक्ष नहीं हो सकते हैं। यह भी पूर्व निर्धारित था कि उनकी बात को कोई तवज्जो पीएम मोदी और गृहमंत्री द्वारा नहीं दी जानी है। हुआ भी वैसा ही और डा. ज्ञानेश कुमार को मुख्य आयुक्त नियुक्त कर दिया गया है। सवाल यह है कि अगर सुप्रीम कोर्ट द्वारा कल 19 फरवरी को उनकी नियुक्ति असवैधानिक ठहरा दिया जाता है जैसा कि इलेक्टोरल बांड के मामले में हुआ था तब क्या होगा लेकिन सत्ता पक्ष को इसकी कोई परवाह नहीं है क्योंकि उसने जो करना है सो करना ही है। डा. ज्ञानेश कुमार लंबे समय से गृहमंत्री अमित शाह के अधीन आने वाले मंत्रालयों में काम कर चुके हैं तथा अमित शाह के साथ उनके करीबी रिश्ते रहे हैं। भले ही राजीव कुमार जो अब पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त होने वाले हैं उनके जाने के बाद भी निर्वाचन आयोग का कार्य प्रणाली पर कोई असर पड़ने वाला नहीं है। चुनाव आयुक्तो में एक एस.एस. संधू है जो उत्तराखंड में मुख्य सचिव पद से सेवा निवृत होकर आयोग के सदस्य बनाए गए है। बात अगर लोकतंत्र, संविधान और निर्वाचन आयोग की की जाए तो निर्वाचन आयोग के पास तो संवैधानिक अधिकार है उनमें एक सशक्त लोकतंत्र की व्यवस्थाएं बनाए रखने की ताकत और क्षमता है। निर्वाचन आयोग का निष्पक्ष होना ही निष्पक्ष चुनाव संपन्न कराने की गारंटी होता है। जिसके बिना लोकतंत्र कभी मजबूत नहीं हो सकता।




