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हंगामे से शुरू हुआ बजट सत्र

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ग्रीष्मकालीन राजधानी गैरसैण तो जून में सत्र दून में क्यों?
विपक्ष ने सतपाल महाराज से पूछे सवाल

देहरादून। अपेक्षानुसार आज उत्तराखंड विधानसभा के बजट सत्र की शुरुआत विपक्ष के हंगामे के साथ हुई। सत्र शुरू होने से पहले ही विपक्षी दल कांग्रेस के विधायक पोस्टर लेकर विधानसभा की सीढ़ियों पर बैठ गए। वही प्रश्नकाल के दौरान भी सवालों का सही उत्तर न मिलने पर कांग्रेसियों ने जमकर हंगामा किया।
कांग्रेस विधायकों ने आज इस बात पर आपत्ति जताई कि जब भाजपा गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर चुकी है तो उसने जून के महीने में आहूत किए जाने वाले बजट सत्र को दूून में क्यों रखा? नेता विपक्ष यशपाल आर्य ने कहा कि भाजपा को गैरसेंण से कोई सरोकार है न पहाड़ से। उन्होने कहा कि ग्रीष्म कालीन राजधानी गैरसैंण घोषित करने के बाद भी सरकार ने गैरसैंण में सत्र आयोजित क्यों नहीं किया यह पहाड़ की उपेक्षा है और जनादेश का अपमान है। कांग्रेस विधायक आदेश चौहान ने कहा कि राज्य आंदोलन के समय से गैरसैंण राज्य के लोगों की भावनाओं के केंद्र में है लेकिन भाजपा इन भावनाओं से खिलवाड़ कर रही है जिसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। कांग्रेसी विधायकों का कहना है कि पहले गैरसैंण में सत्र रखने का फैसला किया गया लेकिन इसे बाद में बदल दिया गया सरकार की ऐसी क्या मजबूरी थी? जो गैरसैंण में सत्र का आयोजन नहीं किया गया उन्होंने कहा कि इससे भाजपा की पहाड़ विरोधी मानसिकता का ही पता चलता है। कांग्रेसी विधायकों ने सरकार के खिलाफ नारेबाजी भी की।
उधर आज सदन की कार्यवाही शुरू हुई तो विपक्ष ने कुछ मुद्दों पर नियम 310 के तहत चर्चा कराने की मांग की गई। गैरसैंण के मुद्दे पर कांग्रेस 310 के तहत चर्चा कराना चाहती थी लेकिन इसे नियम 58 के अंतर्गत स्वीकार किया गया जिसे लेकर कांग्रेसी विधायकों ने सदन में भी हंगामा किया। कांग्रेस विधायक तिलकराज बेहड़ द्वारा एक अधिकारी की टिप्पणी को लेकर विशेषाधिकार हनन का मुद्दा उठाते हुए नियम 310 के तहत चर्चा कराने की मांग की गई जिसे अस्वीकार करने पर कांग्रेसी नेताओं ने नाराजगी जताई।
प्रश्नकाल हालांकि शांतिपूर्ण ढंग से चला लेकिन तय कार्यक्रम के अनुसार सतपाल महाराज की आज सवालों का जवाब देने की बारी थी। पर्यटन, पीडब्ल्यूडी और सिंचाई से जुड़े कई सवालों का जवाब वह ठीक से नहीं दे सके। जिन्हें लेकर कांग्रेसियों ने सरकार की घेराबंदी की गई। तथा सत्ता पक्ष के लोग उनका बचाव करते दिखे। समाचार लिखे जाने तक वित्त मंत्री बजट पेश नहीं कर सके थे।

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