May 2, 2026रघुनाथ मंदिर, लक्ष्मण मंदिर और सीता माता मंदिर को धार्मिक सर्किट के रूप में भव्यता से किया जायेगा विकसित देहरादून। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 15 जून तक सीएम घोषणाओं के लंबित शासनादेश जारी करने के निर्देश देते हुए कहा कि रघुनाथ मंदि, लक्ष्मण मंदिर और सीता माता मंदिर को धार्मिक सर्किट रूप में विकसित किया जायेगा।आज यहां मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने सचिवालय में मुख्यमंत्री घोषणाओं के अंतर्गत विधानसभा क्षेत्रों यमकेश्वर, पौड़ी, श्रीनगर, चौबटृाखाल, लैंसडाउन और कोटद्वार की समीक्षा के दौरान अधिकारियों को ये निर्देश दिए। मुख्यमंत्री घोषणाओं को समयबद्ध रूप से पूर्ण करने तथा उनकी प्रभावी निगरानी के लिए प्रोग्राम इवैल्यूएशन एंड रिव्यू टेक्निक (पी.ई.आर.टी.) चार्ट तैयार किया जाए। बिजली, पेयजल, वनाग्नि, मानव—वन्यजीव संघर्ष तथा सड़क से संबंधित समस्याओं का विभागों द्वारा यथाशीघ्र समाधान किया जाए। स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने पर विशेष ध्यान दिया जाए। विधायकोंं द्वारा अपने क्षेत्रों की जिन समस्याओं को उठाया जा रहा है, अधिकारी उन्हें गंभीरता से लेते हुए प्राथमिकता के आधार पर उनका समाधान करें। जिन घोषणाओं के अभी तक शासनादेश जारी नहीं हुए हैं, उन्हें 15 जून 2026 तक जारी किया जाए। सभी विभाग आपसी समन्वय से जनसमस्याओं का समाधान करें। मुख्यमंत्री ने कहा कि राज्य के प्रत्येक विकासखंड में बालिकाओं के लिए एक—एक छात्रावास बनाया जाएगा। इसके लिए प्रत्येक ब्लॉक में छात्राओं की सर्वाधिक संख्या वाले विघालयों को चिन्हित करते हुए आवश्यक भूमि उपलब्ध कराने के निर्देश अधिकारियों को दिए गए। उन्होंने कहा कि रघुनाथ मंदिर, कोट ब्लॉक स्थित लक्ष्मण मंदिर तथा फलस्वाड़ी स्थित सीता माता मंदिर को धार्मिक सर्किट के रूप में भव्यता से विकसित किया जाए। मुख्यमंत्री ने कहा कि विधायकगणों द्वारा केंद्रीय विघालय संगठन खोलने के लिए दिए जा रहे प्रस्तावों पर शिक्षा विभाग तथा संबंधित जिलाधिकारी केंद्र सरकार के मानकों के अनुरूप सभी आवश्यक कार्यवाही सुनिश्चित करें, ताकि प्रस्ताव केंद्र सरकार को भेजे जाने पर उन्हें शीघ्र स्वीकृति मिल सके।युवाओं को प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए पौड़ी में मल्टीपरपज हॉल बनाया जाए। मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को निर्देश दिए कि विधायकोंं द्वारा बैठक में उठाई गई समस्याओं का संबंधित विभागीय सचिव प्राथमिकता के आधार पर समाधान सुनिश्चित करें। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री घोषणाओं से संबंधित रोपवे प्रकरणों की अलग से समीक्षा की जाए। साथ ही पार्किंग की समस्याओं का प्राथमिकता से समाधान किया जाए तथा सरकारी कार्यालयों में नियमित रूप से सोलर पैनल लगाए जाएं। बैठक में कैबिनेट मंत्री सतपाल महाराज, डॉ. धन सिंह रावत, विधायक श्रीमती रेनू बिष्ट, श्री राजकुमार पोरी, दलीप सिंह रावत, मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन, प्रमुख सचिव डॉ. आर. मीनाक्षी सुंदरम, सचिव श्ौलेश बगोली, रविनाथ रमन, डॉ. पंकज कुमार पांडेय, डॉ. आर. राजेश कुमार, रणवीर सिंह चौहान, विभिन्न विभागों के विभागाध्यक्ष तथा वर्चुअल माध्यम से गढ़वाल आयुक्त विनय शंकर पाण्डेय और जिलाधिकारी पौड़ी श्रीमती स्वाति भदौरिया उपस्थित थे।
May 2, 2026भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष के तीन दिवसीय प्रवास को लेकर भाजपा के कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह कोर ग्रुप, मंत्रियों के अतिरिक्त एक जिला, मंडल टीम संग बैठक में परखेंगे जमीनी तैयारी विधानसभा चुनाव 2027 में जीत की दृदृष्टि से मिलेगा भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष का मार्गदर्शनः भट्ट देहरादून। भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के दौरे में सरकार और संगठन पर विस्तृत चर्चा के साथ 27 के चुनाव रणनीति पर होगा मंथन। भाजपा प्रदेश अध्यक्ष महेंद्र भट्ट ने बताया कि शीघ्र होने वाले इस पहले प्रवास में राष्ट्रीय अध्यक्ष मंडल से लेकर प्रदेश और सरकार में कैबिनेट मंत्रियों की बैठक लेंगे।पार्टी मुख्यालय में पत्रकारों के विभिन्न मुद्दों पर पूछे गए सवालों के जबाब में भट्ट ने भाजपा राष्ट्रीय अध्यक्ष के प्रस्तावित दौरे को लेकर बताया कि शीघ्र पांच राज्यों के परिणामों के बाद वह तीन दिवसीय प्रवास पर उत्तराखंड आयेंगे। इसको लेकर पार्टी कार्यकर्ताओं में जबरदस्त उत्साह है और एयरपोर्ट से लेकर पार्टी मुख्यालय तक वह जगह-जगह पर उनका शानदार स्वागत करने को उत्सुक हैं।अपने प्रवास में अध्यक्ष जी बलबीर रोड स्थित पार्टी मुख्यालय में प्रदेश कोर ग्रुप की बैठक लेंगे, जिसमें मुख्यमंत्री, पूर्व मुख्यमंत्री, सांसद समेत कोर कमेटी के सदस्य मौजूद रहेंगे। बैठक में आगामी विधानसभा चुनाव रणनीति को लेकर विस्तृत चर्चा होगी। प्रदेश संगठन द्वारा राज्य के वर्तमान राजनैतिक परिदृश्य का खाका खींचते हुए, विधानसभावार पार्टी की तैयारियों का ब्यौरा प्रस्तुत किया जाएगा।इसके साथ ही केंद्र और राज्य सरकार के कामों का जनता पर प्रभाव, विधायकों के प्रदर्शन और क्षेत्रवार मुद्दों पर चर्चा की जाएगी। इसी तरह जिन सीटों पर पार्टी जनता का विश्वास हासिल नहीं कर पाई थी उसके लिए विशेष रणनीतिक योजना का खाका तैयार किया जाएगा। इस बार भाजपा सभी विधानसभाओं को जीतने की दृष्टि से बनने वाली चुनावी योजनाओं पर राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा मार्गदर्शन दिया जाएगा।चार धाम यात्रा में वीआईपी दर्शन को लेकर पूछे गए सवालों का जवाब देते हुए कहा भगवान के दरबार में व्यवस्था सबके लिए समान हैं और कोई भी विशेष नहीं है। बाबा केदार भी अपने सभी भक्तों को दर्शन दे रहे हैं। जहां तक प्रदर्शन की बात है तो सबको अपनी बात कहने का लोकतंत्रिक अधिकार है। सरकार की तैयारी शानदार है, लिहाजा विपक्ष को यात्रा को लेकर भ्रम फैलाने और देवभूमि की छवि खराब करने के प्रयासों से बचना चाहिए।उन्होंने कांग्रेस प्रभारी के गढ़वाल दौरे को लेकर कहा कि यह कांग्रेस का निजी मामला है। लेकिन इतना जरूर है कि उनका पिछला कुमायूं दौरा बहुत अच्छे परिणाम वाला नहीं रहा, ठीक ऐसा ही कुछ गढ़वाल में भी रहने वाला है। अभी तो यह भी तय नहीं है कि वह धार्मिक यात्रा पर हैं या राजनीतिक। फिलहाल तो उनके प्रभारी के आने से प्रदेश कांग्रेस की स्थिति में कोई सुधार नहीं आने वाला है। क्योंकि कांग्रेस पार्टी और उनके नेता जनता के अरमानों पर ही बहुत भारी पड़ रहे हैं, जिसे वह जल्द से जल्द उतारना चाहती है। लिहाजा उनके आने जाने से प्रदेश की राजनीति में कोई प्रभाव नहीं पड़ने वाला है।
May 2, 2026पुलिस कार्रवाई पर उठे बड़े सवाल देहरादून। दून पुलिस द्वारा छात्र—छात्राओं और स्थानीय लोगों पर जिस तरह हिंसक हमला किया गया जिसे अब पुलिस के आला अधिकारी हल्का लाठी चार्ज और दो पुलिसकर्मियों को लाइन हाजिर कर हल्का—फुल्का मामला बनाने की कोशिश की जा रही है। उसकी तस्वीर और वायरल वीडियो पुलिस की इस अमानवीय तथा बर्बरतापूर्ण कार्यवाही की कहानी खुद बता रही हैं इसके लिए किसी भी तरह के साक्ष्य की कोई जरूरत नहीं है।इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम बात यह है कि प्रेम नगर क्षेत्र के जिस उत्तरांचल विश्वविघालय को प्रशासन द्वारा दी गई अनुमति को 15 दिन पहले खारिज कर दिया गया था उसकी सूचना छात्र—छात्राओं को देना प्रबंधको ने क्यों जरूरी नहीं समझा और अनुमति खारिज होने के बाद भी इस संगीत शो का आयोजन क्यों किया गया। क्या इसके लिए वह भीड़ जिम्मेदार थी जिस पर पुलिस द्वारा बेरहमी से लाठियां भाजी गई या फिर वह विश्वविघालय और उसका वह प्रबंधन जिन्होंने इसकी अवहेलना करते हुए इस कार्यक्रम का आयोजन कराया गया। क्या पुलिस प्रशासन द्वारा विश्वविघालय प्रबंधन के खिलाफ भी कोई कार्यवाही की जाएगी या फिर मासूम जनता पर लाठियां भांज कर और कुछ लोगों को अस्पताल पहुंचा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली गई है।इस घटना को लेकर अब लोगों में भारी आक्रोश है तथा इस पुलिसिया कार्रवाई के लिए सोशल मीडिया पर थू—थू किया जा रहा है। यह ठीक है कि इस कार्यक्रम में उमड़ी भीड़ के कारण यातायात बाधित हुआ लेकिन इसके जिम्मेदार वह लोग नहीं है जो सिंगर दर्शन रावल को सुनने आए थे। महिलाओं की चीख पुकार और पुलिस कर्मियों के लाठियां बरसाने की तस्वीर बताती है कि यह अगर हल्का लाठीचार्ज है तो फिर बड़ी कार्रवाई तो सिर्फ गोलियां मारना ही हो सकता है। लोगों की आलोचना के बाद दो पुलिस कर्मियों को लाइन हाजिर क्यों किया गया अगर पुलिस की कोई गलती नहीं थी। अभी—अभी दो दिन पूर्व एक प्रॉपर्टी डीलर से लूट के मामले में एक बदमाश का एनकाउंटर कर वाहवाही लूटने वाली प्रेम नगर पुलिस ने इस कार्यवाही से अपनी सारी साख को धोकर रख दिया है।चारों तरफ इसे लेकर पुलिस की निंदा हो रही है। राजधानी में आए दिन होने वाले मर्डर और अपराधों को रोक पाने में नाकाम पुलिस का आम लोगों पर उतारा गया यह गुस्सा किसी भी सूरत में ठीक नहीं कहा जा सकता है। देखना यह है कि अब प्रशासन विश्वविघालय प्रबंधन पर कोई कार्रवाई करने का साहस दिखा पता है या नहीं।
May 2, 2026करोड़ों की फीस, बदले में डी.जे. नाइट्स नाच-गाने के बीच खो रही है शैक्षणिक गंभीरता देहरादून। दूनघाटी में प्राइवेट यूनिवर्सिटी में शोर संस्कृति का नया ट्रेड शुरू हो गया है। यूनिवर्सिटी लाखों—करोड़ों की फीस लेने के बाद छात्र—छात्राओं को संगीत की धुनों पर थिरकते नजर आ रहे हैं। हालांकि यूनिवर्सिटी प्रशासन ऐसे कार्यक्रमों को छात्र—छात्रओं के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी बताता है। वहीं दूसरी ओर समाज का एक वर्ग इन आयोजनों पर होने वाले भारी—भरकम खर्च को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। आज बहस इस बात पर छिड़ गई है कि क्या प्राइवेट यूनिवर्सिटी अपनी मूल दिशा से भटककर मनोरंजन के अड्डे बनते जा रहे हैं।दूनघाटी की प्राइवेट यूनिवर्सिटी में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों में नामी गायकों, डीजे और कलाकारों को बुलाने की एक होड़ सी मची है। एक ही रात के लिए लाखों—करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए जा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जिस छात्र की फीस से यह पैसा आता है, क्या उसे बदले में वैसी विश्वस्तरीय श्ौक्षणिक सुविधाएं मिल रही हैं? जानकारों का मानना है कि प्राइवेट यूनिवर्सिटी अब शिक्षा की गुणवत्ता के बजाय स्टार पावर के दम पर अपनी ब्रांडिंग करने में जुटे हैं।वही दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि यूनिवर्सिटी अब पढ़ाई, शोध और नवाचार के बजाय नाचने—गाने के अड्डे में तब्दील होती दिख रही हैं। जब साल भर का फोकस कल्चरल इवेंट्स और सेलिब्रिटी नाइट्स पर रहेगा, तो छात्र के भीतर बौद्धिक गंभीरता कैसे विकसित होगी। अभिभावकों का कहना है कि आज भी कई छात्र आर्थिक अभाव के कारण अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में भव्य आयोजनों पर खर्च को लेकर असंतोष स्वाभाविक है। उनका मानना है कि विश्वविघालयों को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए और शिक्षा के मूल उद्देश्य ज्ञान और समान अवसर को सर्वाेपरि रखना चाहिए।अब सबसे गंभीर प्रश्न आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को लेकर आता है। एक ओर जहां यूनिवर्सिटी आर्टिस्ट्स को बुलाने के लिए बजट का पिटारा खोल देती है। वही जब बात किसी गरीब परिवार के प्रतिभाशाली छात्र की फीस माफी या छात्रवृत्ति की आती है, तो नियम—कायदों का हवाला दिया जाता है। यूनिवर्सिटी करोड़ों रूपये चंद घंटों के शोर में बर्बाद हुआ, उसे ग्रामीण क्षेत्रों के उन बच्चों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था जो संसाधन न होने के कारण उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते हैं?बता दें कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी प्रदेश में, जहां कई माता—पिता पेट काटकर अपने बच्चों को शहर पढ़ने भेजते हैं, वहां विश्वविघालयों की नैतिक जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। मनोरंजन आवश्यक है, लेकिन वह शिक्षा की लागत और गरीबों के हक को मारकर नहीं होना चाहिए।शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह बहस केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र से जुड़ा सवाल है। जरूरी है कि विश्वविघालय शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाए रखें, ताकि न तो प्रतिभाओं का दमन हो और न ही शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो।
May 2, 2026जब देश की जनता अच्छे दिन आने की उम्मीद में मोदी की सरकार लेकर आई तो उसने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि उसने अपने इतने बुरे दिन लाने का इंतजाम कर लिया है जहां भूखा मरने पर मजबूर होना पड़ेगा। अगर वर्ल्ड बैंक की ताजा रिपोर्ट पर गौर करें तो आने वाले समय में 4.5 करोड़ लोग भुखमरी की लाइन में शामिल होने वाले हैं इसका भारत पर व्यापक असर इसलिए पड़ेगा क्योंकि इनमें हर छठा आदमी भारत का है। अभी खाड़ी युद्ध के बीच राहुल गांधी ने कहा था कि 29 अप्रैल को वोटिंग समाप्त होते ही तेल और गैस की कीमतों में बेतहाशा वृद्धि होगी जिसे सरकार नकार रही थी और पर्याप्त उपलब्धता की बात कर रही थी लेकिन बीते कल कमर्शियल गैस सिलेंडर के दामों में 900 रूपये की वृद्धि कर दी गई जो अब तक की सबसे बड़ी वृद्धि है। कमर्शियल गैस सिलेंडर पर बीते 4 महीनो में 81 फीसदी बढ़ोतरी हो चुकी है इससे खाने—पीने की वस्तुओं पर चलने वाले व्यवसाय पर क्या असर पड़ेगा और जो बाजार के खाने पर निर्भर है उनकी जेब पर क्या असर पड़ेगा? इसे कोई समझने को तैयार नहीं है। आने वाले समय में रसोई गैस सिलेंडर की कीमतों में भारी वृद्धि की संभावना है तथा पेट्रोल—डीजल 25 से 30 रुपए अधिक महंगा हो सकता है। भारत अपनी जरूरत का 50 फीसदी एलपीजी आयात करता है अगर र्हाेंमुज का दरवाजा बंद रहता है तो आने वाला समय किस हद तक संकट को लेकर आएगा? इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। भले ही सरकार के द्वारा पेश किए जाने वाले दावों में देश की विकास दर सरपट दौड़ रही हो लेकिन इसकी जो हकीकत है उसको सिर्फ वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट ही नहीं बता रही है डॉलर के मुकाबले रुपए की गिरती कीमत जो 95 तक पहुंच रही है तथा देश का शेयर बाजार जिसमें घरेलू निवेश का लाखों करोड़ हर सप्ताह डूब रहा है और रिकॉर्ड विदेशी निवेश अपना पैसा निकाल कर हर रोज भाग रहे हैं। देश की पांच ट्रिलियन वाली अर्थव्यवस्था की सच्चाई बताने के लिए काफी है। बीते साल विदेशी निवेशको 1.66 करोड़ की निकासी की थी लेकिन इस साल के बीते 4 माह में 1.19 की निकासी की जा चुकी है। भारत की विकास दर का आंकड़ा अभी भी 4 से 5 फीसदी पर अटका हुआ है। सरकार भले ही अपने आंकड़ों में इस विकास दर को कुछ भी बताएं और देश के लोगों को विकसित भारत का सपना दिखाएं, बीते 11 सालों से देश में यही सब हो रहा है लेकिन देश का गोदी मीडिया आज तक भी मोदी नोटिस कांड का बाजा बजा रहा है। मोदी कांग्रेस के समय में रुपए की कीमत 56 रूपये आने पर अपनी छाती पीटा करते थे वह अब डॉलर के मुकाबले 95 रुपए पर पहुंचने पर अपनी मजबूत अर्थव्यवस्था का ढंोल पीट रहे हैं। न तो विदेशी निवेश आगे बढ़ता दिख रहा है और न निर्यात का आंकड़ा मगर विकास दर छलांगे मार रही है। सत्ता में बैठे लोग न तो सच को सुनना चाहते हैं न समझना और देखना उनका एकमात्र उद्देश्य सिर्फ और सिर्फ चुनावी जीत तक ही सीमित भर रह गया है। इन दिनों सरकार और पूरी सरकार सिर्फ पश्चिम बंगाल का चुनाव जीतने में जुटी हुई है अगर देश के 80 90 लाख लोग भुखमरी वाली स्थिति पर पहुंच भी जाते हैं तो इससे उन्हें क्या फर्क पढ़ना है। सरकार चुनाव में मस्त है तथा देश की जनता महंगाई से त्रस्त है। लोगों की जमा पूंजी ठिकाने लग रही है बैंकों के बचत खातों में पैसा आ नहीं रहा है। लोग और अधिक गरीब होते जा रहे हैं उनकी समझ नहीं आ रहा है कि यह कैसा विकास है।
May 2, 2026देवभूमि उत्तराखंड के कण-कण में माना जाता है देवताओं का वासयहाँ की सबसे अनूठी परंपरा है क्षेत्रपाल या भूमिपाल की अवधारणा पहाड़ के हर गांव में क्षेत्र रक्षक के रूप में करते हैं क्षेत्रपाल देवता वास देहरादून। गांव में स्थित किसी पुराने पेड़ के नीचे, पत्थरों से बना एक छोटा सा मंदिर, जहां लोहे के त्रिशूल, घंटियां और पत्थर की मूर्तियां क्षेत्रपाल देवता के मंदिर में होती हैं। पहाड़ के हर गांव की सरहद पर एक ऐसा रक्षक देवता विराजमान होता है। यह देवता सिर्फ पूजा के प्रतीक नहीं, बल्कि क्षेत्र के रक्षक, मार्गदर्शक और न्याय के प्रतीक माने जाते हैं।पहाड़ की परंपरा के अनुसार हर गांव की अपनी एक निश्चित सीमा होती है। इस सीमा की रक्षा का उत्तरदायित्व क्षेत्र रक्षक देवता का होता है। मान्यता है कि जब गांव के लोग सो जाते हैं, तब देवता अपने दिव्य घोड़े पर सवार होकर हाथ में मशाल लेकर गांव की सरहदों का चक्कर लगाते हैं और हिंसक पशुओं व बुरी आत्माओं से गांव की रक्षा करते हैं। गांव में कोई भी शुभ कार्य होकृचाहे शादी-ब्याह हो, जनेऊ संस्कार हो या नई फसल की कटाईकृसबसे पहले क्षेत्रपाल को याद किया जाता है।क्षेत्रपाल देवताओं के मंदिर आलीशान नहीं होते। अक्सर किसी विशाल पीपल या बांज के पेड़ के नीचे, पत्थरों से बना एक छोटा सा थान होता है। वहां लोहे के त्रिशूल, घंटियां और पत्थर की मूर्तियां स्थापित होती हैं। यह सादगी इस बात का प्रतीक है कि देवता प्रकृति के कितने करीब हैं और हर ग्रामीण के लिए सुलभ हैं। पहाड़ के लोग कानून से ज्यादा अपने ग्राम देवता और क्षेत्रपाल से डरते हैं। यह विश्वास गांव में अनुशासन और नैतिकता बनाए रखने का काम करता है। ऐसी मान्यता है कि यदि गांव में कोई चोरी होती है या आपसी विवाद सुलझ नहीं पाता, तो क्षेत्रपाल के थान पर न्याय की गुहार लगाई जाती है।आधुनिक युग में भी पहाड़ की यह परंपरा अटूट है। यह विज्ञान के लिए कौतूहल हो सकता है, लेकिन एक पहाड़ी के लिए यह उसकी आस्था और पहचान है। यह क्षेत्र रक्षक देवता केवल पत्थर की मूर्तियां नहीं, बल्कि हिमालयी संस्कृति के वह प्रहरी हैं, जिन्होंने सदियों से इन दुर्गम गांवों को जीवंत बनाए रखा है। आज भले ही युवा रोजगार के लिए शहरों की ओर पलायन कर रहे हों, लेकिन अपने गांव और क्षेत्र देवता के प्रति उनकी आस्था आज भी कायम है।