- करोड़ों की फीस, बदले में डी.जे. नाइट्स
- नाच-गाने के बीच खो रही है शैक्षणिक गंभीरता
देहरादून। दूनघाटी में प्राइवेट यूनिवर्सिटी में शोर संस्कृति का नया ट्रेड शुरू हो गया है। यूनिवर्सिटी लाखों—करोड़ों की फीस लेने के बाद छात्र—छात्राओं को संगीत की धुनों पर थिरकते नजर आ रहे हैं। हालांकि यूनिवर्सिटी प्रशासन ऐसे कार्यक्रमों को छात्र—छात्रओं के सर्वांगीण विकास के लिए जरूरी बताता है। वहीं दूसरी ओर समाज का एक वर्ग इन आयोजनों पर होने वाले भारी—भरकम खर्च को लेकर सवाल खड़े कर रहा है। आज बहस इस बात पर छिड़ गई है कि क्या प्राइवेट यूनिवर्सिटी अपनी मूल दिशा से भटककर मनोरंजन के अड्डे बनते जा रहे हैं।
दूनघाटी की प्राइवेट यूनिवर्सिटी में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजनों में नामी गायकों, डीजे और कलाकारों को बुलाने की एक होड़ सी मची है। एक ही रात के लिए लाखों—करोड़ों रुपये पानी की तरह बहा दिए जा रहे हैं। सवाल यह उठता है कि जिस छात्र की फीस से यह पैसा आता है, क्या उसे बदले में वैसी विश्वस्तरीय श्ौक्षणिक सुविधाएं मिल रही हैं? जानकारों का मानना है कि प्राइवेट यूनिवर्सिटी अब शिक्षा की गुणवत्ता के बजाय स्टार पावर के दम पर अपनी ब्रांडिंग करने में जुटे हैं।
वही दूसरी ओर आलोचकों का कहना है कि यूनिवर्सिटी अब पढ़ाई, शोध और नवाचार के बजाय नाचने—गाने के अड्डे में तब्दील होती दिख रही हैं। जब साल भर का फोकस कल्चरल इवेंट्स और सेलिब्रिटी नाइट्स पर रहेगा, तो छात्र के भीतर बौद्धिक गंभीरता कैसे विकसित होगी। अभिभावकों का कहना है कि आज भी कई छात्र आर्थिक अभाव के कारण अपनी पढ़ाई पूरी नहीं कर पा रहे हैं। ऐसे में भव्य आयोजनों पर खर्च को लेकर असंतोष स्वाभाविक है। उनका मानना है कि विश्वविघालयों को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी चाहिए और शिक्षा के मूल उद्देश्य ज्ञान और समान अवसर को सर्वाेपरि रखना चाहिए।
अब सबसे गंभीर प्रश्न आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के बच्चों को लेकर आता है। एक ओर जहां यूनिवर्सिटी आर्टिस्ट्स को बुलाने के लिए बजट का पिटारा खोल देती है। वही जब बात किसी गरीब परिवार के प्रतिभाशाली छात्र की फीस माफी या छात्रवृत्ति की आती है, तो नियम—कायदों का हवाला दिया जाता है। यूनिवर्सिटी करोड़ों रूपये चंद घंटों के शोर में बर्बाद हुआ, उसे ग्रामीण क्षेत्रों के उन बच्चों के लिए इस्तेमाल नहीं किया जा सकता था जो संसाधन न होने के कारण उच्च शिक्षा से वंचित रह जाते हैं?
बता दें कि उत्तराखंड जैसे पहाड़ी प्रदेश में, जहां कई माता—पिता पेट काटकर अपने बच्चों को शहर पढ़ने भेजते हैं, वहां विश्वविघालयों की नैतिक जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। मनोरंजन आवश्यक है, लेकिन वह शिक्षा की लागत और गरीबों के हक को मारकर नहीं होना चाहिए।
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह बहस केवल एक संस्थान तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र से जुड़ा सवाल है। जरूरी है कि विश्वविघालय शिक्षा और सांस्कृतिक गतिविधियों के बीच संतुलन बनाए रखें, ताकि न तो प्रतिभाओं का दमन हो और न ही शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो।




