- उत्तराखंड में एसआईआर के नोटिसों पर खड़ा हुआ एक सवाल
- कागज देने लाठी टेककर आओ और नोटिस देने हम खुद आएँगे
- चुनाव में एक-एक वोट के लिए दादाजी के पैर छूने वाली सरकार
- न गांव में सड़कें थीं, न अस्पताल, न जन्म पंजीकरण की व्यवस्था
- 1940 के दशक के जन्में बुजुर्ग से जन्म प्रमाण पत्र मांगना उत्पीड़न
देहरादून। 85 साल का एक बुजुर्ग…सरकारी नौकरी की। पूरी ईमानदारी से की। रिटायर हुए पच्चीस साल हो गए। सरकार ने नौकरी दी, सेवा पुस्तिका बनाई, वेतन दिया, पेंशन दी। हर महीने बैंक में पेंशन पहुंचती रही। हर चुनाव में वोट डाला। राशन कार्ड बना। आधार बना। बैंक खाता खुला। बिजली का बिल भरा। जीवन भर सरकार के रिकॉर्ड में नागरिक रहे। लेकिन अब अचानक सरकार कह रही है जन्म प्रमाण पत्र लेकर आइए। सवाल यह नहीं है कि दस्तावेज क्यों मांगा जा रहा है। सवाल यह है कि 85 साल के उस नागरिक से, जिसका जन्म उस दौर में हुआ जब गांवों में जन्म का सरकारी पंजीकरण लगभग न के बराबर था, उससे आज आप कौन-सा कागज मांग रहे हैं? क्या उत्तराखंड के पहाड़ों में 1940 के दशक में हर गांव में जन्म प्रमाण पत्र बनते थे? क्या उस समय अस्पतालों में जन्म होना आम बात थी? क्या सरकार के पास इसका जवाब है? अगर नहीं, तो फिर यह नोटिस किस समझ के आधार पर लिखा गया? और कहानी यहीं खत्म नहीं होती। बीएलओ घर तक आया। नोटिस देकर चला गया। लेकिन दस्तावेज लेने नहीं आएगा। अब 85 साल का बुजुर्ग खुद दफ्तर पहुंचे। मतलब सरकार का कागज घर-घर जाएगा, लेकिन नागरिक का कागज घर से नहीं उठेगा। इसे सुविधा कहते हैं या संवेदनहीनता? जिस सरकार ने चुनाव के समय घर-घर संपर्क का नारा दिया, वही सरकार अब कह रही है दादा जी, आप खुद लाइन में आइए।
अब कुछ अलग बात करते हैं क्या कभी किसी मंत्री से कहा गया कि अपनी उम्र साबित कीजिए? कभी किसी अधिकारी से कहा गया कि 85 साल पहले का जन्म प्रमाण पत्र लाइए? नहीं। लेकिन एक बूढ़े नागरिक से कहा जा रहा है कि पहले अपने जन्म का सबूत दो। यह सिर्फ प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। यह उस सोच का आईना है जिसमें नागरिक पर भरोसा कम और फाइल पर भरोसा ज्यादा है। विडंबना देखिए…जिस व्यक्ति की पूरी सेवा सरकार के रिकार्ड में दर्ज है, जिसकी पेंशन सरकारी खजाने से निकल रही है, उसी सरकार को अब उसके जन्म पर संदेह हो गया है। तो क्या इतने वर्षों तक सरकार किसी ऐसे व्यक्ति को पेंशन देती रही जिसकी पहचान उसे पता ही नहीं थी? अगर पहचान थी, तो फिर नया प्रमाण क्यों? अगर पहचान नहीं थी, तो इतने वर्षों तक सरकारी रिकार्ड किस आधार पर चलता रहा?
उत्तराखंड के गांवों में हजारों ऐसे बुजुर्ग हैं जिनके पास जन्म प्रमाण पत्र नहीं है। उनके पास स्कूल छोड़ने का प्रमाण पत्र हो सकता है। भूमि के रिकार्ड हो सकते हैं। मतदाता सूची में नाम हो सकता है। सेवा पुस्तिका हो सकती है। पेंशन का रिकार्ड हो सकता है। लेकिन क्या इन सबकी अब कोई कीमत नहीं बची? क्या हर नागरिक को फिर से शून्य से अपनी पहचान साबित करनी होगी? यह सवाल सिर्फ एक बुजुर्ग का नहीं है। यह सवाल उस व्यवस्था का है जो हर कुछ वर्षों में अपने ही नागरिक से पूछती है बताओ, तुम कौन हो? लोकतंत्र में सरकार नागरिक के दरवाजे पर सम्मान लेकर जाती है, संदेह नहीं।
अगर किसी 85 वर्षीय बुजुर्ग को सिर्फ इसलिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ें कि उसके जन्म के समय सरकारी रजिस्टर ही नहीं बनते थे, तो यह केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं रह जाती, बल्कि व्यवस्था की संवेदनशीलता की परीक्षा बन जाती है। उत्तराखंड की सरकार से सवाल हैकृकि क्या एसआईआर का उद्देश्य रिकार्ड दुरुस्त करना है या बुजुर्गों को दफ्तरों की कतार में खड़ा करना? क्या ऐसे मामलों में घर-घर दस्तावेज सत्यापन की व्यवस्था नहीं हो सकती? क्या सेवा रिकार्ड, पेंशन रिकार्ड और दशकों पुराने सरकारी अभिलेखों को वैकल्पिक प्रमाण नहीं माना जा सकता? क्योंकि लोकतंत्र की ताकत फाइलों से नहीं, नागरिकों के विश्वास से चलती है और जब एक 85 साल का बुजुर्ग अपनी लाठी के सहारे यह साबित करने निकले कि मैं पैदा हुआ था, तब सवाल सरकार पर उठते हैं, उस बुजुर्ग पर नहीं। उत्तराखंड में चल रहे एसआईआर में ऐसी कई खामियां सामने आ रही हैं, जिससे लोग सकते हैं और यह सोच रहे है कि आगे वोट दें या नहीं। जब प्रदेश के एक आईएएस को नोटिश दिया जा सकता है तो आम आदमी तो नौकरशाहों के लिए चीटी के समान ही तो है। हालांकि कुछ दिन पूर्व प्रदेश के मुख्य चुनाव आयुक्त ने एसआईआर में बुजुर्गों के लिए घर पर ही व्यवस्था की प्रेस रिलीज जारी की थी, लेकिन शायद वह सिर्फ अखबारों में छापने के लिए थी। हकीकत में जमीन पर काम कैसे होता है यह तो बीएलओ ही जानता है।




