लोगों की जान की कीमत पर फर्जीवाड़ा

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उत्तराखंड सरकार का आपदा और कोरोना प्रबंधन कितना बेहतर है? इसकी हकीकत बताने के लिए हाईकोर्ट की वह टिप्पणी ही काफी है जिसमें उसने कहा कि अगर सीएम और अफसर दिल्ली में है तो यह और भी बेहतर है वह दिल्ली में बैठकर ही चाय पर बैठक कर चार धाम यात्रा के लिए एसओपी बना सकते हैं। हाईकोर्ट की यह टिप्पणी उस सच के करीब है जो इस समय हो रहा है। सीएम दिल्ली में चुनावी तैयारियों में जुटे हैं और सरकारी प्रवक्ता उनकी अनुपस्थिति में चारधाम यात्रा शुरू करने और कोरोना कर्फ्यू बढ़ाने तथा एसओपी जारी कर रहे हैं। यह हाल तब है जब हरिद्वार महाकुंभ के कोरोना जांच घोटाले को लेकर सरकार की भारी फजीहत हो रही है। और चार धाम यात्रा को लेकर हाईकोर्ट द्वारा लताड़ा जा रहा है। यह दोनों ही मामले अब हाईकोर्ट तक पहुंच गए हैं विपक्ष इन मामलों को लेकर सरकार की घेराबंदी में लगा है यह अलग बात है। लेकिन सत्ता में बैठे लोग खुद अब इस बात को स्वीकार करने पर विवश हैं कि यह अत्यंत ही गंभीर मामला है और इसकी जांच जो की ही जाएगी दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। कोरोना की जांच का यह फर्जीवाड़ा सिर्फ जांच के नाम पर सरकार को वित्तीय नुकसान पहुंचाए जाने तक ही सीमित नहीं है अपितु सीधेे तौर पर लोगों की जान से खिलवाड़ करने का है। यह कितना हैरान करने की बात है कि सरकार ने चेन्नई की जिस एचएलएल लैब को जांच के लिए अधिकृत किया गया था उसने जांच का ठेका ऐसी अन्य लैब को दे दिया जिसका प्रस्ताव सरकार ने खारिज कर दिया था। लाखों लोगों की बिना जांच किए ही फर्जी नाम पते और फोन नंबर भरकर सिर्फ जांच की खानापूर्ति कर सरकार से करोड़ो रुपए वसूलने के प्रयास किए गए अगर मामले का खुलासा नहीं हुआ होता तो जांच एजेंसी को इसका पूरा भुगतान भी हो जाता जिस पर अब रोक लगा दी गई है। भले ही सरकार का अब बड़ा वित्तीय नुकसान न हो लेकिन इस फर्जीवाड़े के कारण महाकुंभ कोरोना का एक प्रभावी स्प्राइडर नहीं बना इस बात को तो कोई भी नहीं नकार सकता है। कुम्भ के बाद व्यापक पैमाने पर राज्य और देश भर में हुई मौतों में से कितनी मौतें इस जांच के फर्जीवाड़े के कारण हुई भले ही इसका सही आंकड़ा नहीं निकाला जा सकता लेकिन इन मौतों के लिए जांच एजेंसी के साथ—साथ वह अधिकारी भी जिम्मेवार हैं जिन्होंने समय रहते इस पर ध्यान नहीं दिया। जब पूरे देश मे पॉजिटिविटी रेट इतना अधिक था तो हरिद्वार का पाजिटिविटी रेट इतना कम क्यों था? इस पर उन अधिकारियों ने उसी समय गौर कर लिया होता जब यह सब हो रहा था तो मामला उसी समय पकड़ा जा सकता था। इस मामले को लेकर जांच एजेंसी ने आपदा में अवसर तलाश लिया जिस पर आपदा एक्ट में अब मुकदमा दर्ज करने की कार्रवाई हो रही है लेकिन उन अधिकारियों पर कार्रवाई कब होगी जिनकी लापरवाही के कारण यह हुआ। सरकार की किरकिरी कराने के लिए तो यह अधिकारी ही जिम्मेवार हैं। सरकार को चाहिए कि वह इन अधिकारियों की भूमिका की भी जांच कराएं हो सकता है कि उनकी मिलीभगत के कारण ही यह सब संभव हुआ हो। देखना यह है कि सरकार इसकी जांच को कहां तक ले जाती है?

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