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जब बच्चे स्कूल पहुंचे तब जागा प्रशासन

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बारिश में राजधानी बेहाल, डीएम का अवकाश आदेश देर से आया
भीगते रहे छात्र-छात्राएं व मासूम नौनिहाल, जाम में फंसे अभिभावक
सड़कें बनीं दरिया, स्कूल पहुंचे बच्चों को फिर लौटना पड़ा अपने घर
सवाल जब आसमान रात से बरस रहा था तो फैसला सुबह देर से क्यों


देहरादून। राजधानी में मूसलाधार बारिश ने केवल सड़कों को ही नहीं डुबोया, बल्कि प्रशासन की आपदा प्रबंधन व्यवस्था पर भी बड़े सवाल खड़े कर दिए। सुबह से तेज बारिश के बीच हजारों बच्चे रोज की तरह स्कूल के लिए निकल पड़े। कई स्कूलों में प्रार्थना सभा भी हो गई, कक्षाएं शुरू हो गईं और तभी जिला प्रशासन की ओर से स्कूलों में अवकाश का आदेश जारी हुआ। नतीजा यह हुआ कि जिन बच्चों को सुरक्षित घरों में होना चाहिए था, वह बारिश, जलभराव और ट्रैफिक जाम के बीच फंस गए।
राजधानी की कई प्रमुख सड़कें कुछ ही घंटों में नदी का रूप ले चुकी थीं। नालों का पानी सड़कों पर बह रहा था। वाहन रेंग रहे थे और जगह-जगह लंबा जाम लगा था। सबसे अधिक परेशानी उन अभिभावकों को हुई, जिन्होंने अपने बच्चों को स्कूल छोड़ दिया था। अवकाश की सूचना मिलते ही उन्हें दोबारा स्कूलों की ओर दौड़ लगानी पड़ी। कई परिवार घंटों तक जाम में फंसे रहे, जबकि छोटे-छोटे बच्चे भीगते हुए स्कूल से घर लौटे।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब मौसम विभाग लगातार भारी बारिश की चेतावनी जारी कर रहा था और रात से ही राजधानी में तेज बारिश हो रही थी, तब अवकाश का निर्णय समय रहते क्यों नहीं लिया गया? यदि सुबह स्कूल खुलने से पहले आदेश जारी हो जाता, तो हजारों बच्चों और अभिभावकों को इस परेशानी से बचाया जा सकता था। यह पहला अवसर नहीं है जब देहरादून में बारिश के दौरान प्रशासनिक निर्णयों के समय को लेकर सवाल उठे हों। हर मानसून में राजधानी की वही तस्वीर सामने आती है जलभराव, बंद नालियां, घंटों लंबा ट्रैफिक जाम और फिर आपात बैठकें। फर्क सिर्फ इतना है कि हर साल दावे नए होते हैं और समस्याएं पुरानी।
अभिभावकों में इस पूरे घटनाक्रम को लेकर भारी नाराजगी देखी गई। उनका कहना था कि बच्चों की सुरक्षा से जुड़ा फैसला सबसे पहले होना चाहिए। यदि प्रशासन मौसम की स्थिति पर लगातार नजर रख रहा था, तो स्कूल खुलने से पहले ही स्पष्ट आदेश जारी किया जाना चाहिए था। सोशल मीडिया पर भी लोगों ने सवाल उठाए कि आखिर निर्णय लेने में इतनी देरी क्यों हुई।
राजधानी की सड़कों की हालत ने भी नगर निकायों और संबंधित विभागों की तैयारियों की पोल खोल दी। जहां-जहां कुछ देर की बारिश में सड़कें तालाब बन गईं, वहां वर्षों से चल रहे ड्रेनेज सुधार और जल निकासी के दावों पर सवाल खड़े हो गए। लोगों का कहना है कि हर साल मानसून से पहले नालों की सफाई और जलभराव रोकने की योजनाओं की बात होती है, लेकिन पहली तेज बारिश ही पूरी व्यवस्था की वास्तविकता सामने ला देती है।
अभिभावकों का कहना है कि मौसम आधारित निर्णयों के लिए एक स्पष्ट और समयबद्ध प्रोटोकाल होना चाहिए। यदि भारी बारिश की संभावना हो, तो स्कूलों में अवकाश या समय परिवर्तन का निर्णय सुबह बच्चों के घरों से निकलने से पहले लिया जाना चाहिए। इससे भ्रम की स्थिति भी नहीं बनेगी और अनावश्यक जोखिम भी टाला जा सकेगा। राजधानी में आज जो हुआ, उसने एक बार फिर यह याद दिलाया कि आपदा केवल प्राकृतिक नहीं होती, कई बार निर्णय लेने में हुई देरी भी संकट को बढ़ा देती है। सवाल सिर्फ इतना नहीं है कि बारिश कितनी हुई, बल्कि यह भी है कि प्रशासन ने समय पर फैसला क्यों नहीं लिया?
देहरादून की सड़कों पर बहता पानी कुछ घंटों में उतर जाएगा, ट्रैफिक भी सामान्य हो जाएगा, लेकिन उन अभिभावकों के मन में उठे सवाल आसानी से नहीं मिटेंगे, जिन्होंने अपने बच्चों को सुरक्षित स्कूल भेजा था और कुछ ही देर बाद उन्हें बाढ़ जैसे हालात में वापस लाना पड़ा। मानसून हर साल आएगा, लेकिन क्या हर साल फैसले भी इतने ही देर से आएंगे यही सबसे बड़ा सवाल है।

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