नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने अभिव्यक्ति की आजादी पर जोर देते हुए कहा है कि मामूली मामलों को अवमानना का मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। सोमवार को जस्टिस अभय एस ओका और उज्जल भुयान की सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने सुनवाई के दौरान मीडिया की स्वतंत्रता के महत्व पर जोर दिया। इसने अदालतों को विशेष रूप से फ्री स्पीच के प्रति सहनशील होने की आवश्यकता की याद दिलाई और कहा कि मामूली बहाने पर अवमानना का मुद्दा नहीं बनाना चाहिए।
पीठ ने पूछा, अदालतों को उनके आदेशों के खिलाफ की गई कुछ टिप्पणियों के बारे में क्यों संवेदनशील होना चाहिए। इस साल जनवरी में सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों में 1.45 लाख अवमानना के मामले लंबित थे। उनमें से कुछ मीडिया संगठनों और स्वतंत्र पत्रकारों के खिलाफ थे। इनमें से कुछ मनमाने, अनुचित या अतिवाद वाले हो सकते हैं। सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई विकिपीडिया के खिलाफ दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश के बारे में थी, जिसमें आलोचना को अदालती कार्यवाही में हस्तक्षेप माना गया था। लेकिन जैसा कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा, न्यायाधीशों को आलोचना को गंभीरता से लेना चाहिए, कभी-कभी कोई कहता है कि आप यहां पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर बैठे हैं या आप उचित सुनवाई नहीं कर रहे हैं। लोग कुछ कहते हैं और हमें इसे सहन करना पड़ता है। कोई कहता है कि हम पूर्वाग्रह से ग्रसित हैं। यह उनकी राय है, लेकिन हम कानून के अनुसार निर्णय लेते हैं।




