July 29, 2026हर साल मानसून में वही मातम, आखिर कब सीखेगा सिस्टम बारिश ने फिर खोली तैयारियों की पोल, पहाड़ों पर जिंदगी ठप आपदा के साथ अब राजनीतिक जवाबदेही भी है बड़ा सवाल देहरादून। उत्तराखंड में मानसून का मौसम हर साल आता है। पहाड़ों पर बादल हर वर्ष बरसते हैं। नदियां उफान पर आती हैं। भूस्खलन होता है। सड़कें टूटती हैं। गांवों का संपर्क कटता है। लोग घंटों नहीं, कई बार दिनों तक फंसे रहते हैं। फर्क सिर्फ इतना होता है कि हर साल सरकारी बयान बदल जाते हैं, लेकिन तस्वीरें नहीं। इस बार भी वही हो रहा है। राज्य के कई जिलों में लगातार हो रही बारिश ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है। पहाड़ दरक रहे हैं, सड़कें मलबे में दबी हैं, नदी-नाले खतरे के निशान के करीब बह रहे हैं और प्रशासन युद्धस्तर पर राहत कार्यों का दावा कर रहा है। लेकिन सवाल राहत कार्यों का नहीं, बल्कि उस तैयारी का है, जो हर मानसून से पहले की जानी चाहिए थी।उत्तराखंड में मानसून कोई अप्रत्याशित घटना नहीं है। मौसम विभाग हर वर्ष पहले से चेतावनी देता है। संवेदनशील स्थानों की सूची भी तैयार रहती है। फिर भी हर बार वही मार्ग बंद होते हैं, वही पुल क्षतिग्रस्त होते हैं और वही गांव अलग-थलग पड़ जाते हैं। आखिर क्यों? राज्य में आपदा प्रबंधन पर हर वर्ष करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं। जिला स्तर पर नियंत्रण कक्ष बनाए जाते हैं। मशीनें खरीदी जाती हैं। राहत दलों को प्रशिक्षित किया जाता है। समीक्षा बैठकें होती हैं। लेकिन पहली तेज बारिश के बाद ही पूरा तंत्र दबाव में दिखाई देता है।प्रश्न यह नहीं कि बारिश कितनी हुई। प्रश्न यह है कि जिन स्थानों को वर्षों से भूस्खलन संभावित क्षेत्र माना जाता है, वहां स्थायी समाधान क्यों नहीं हो पाया? जिन सड़कों पर हर मानसून में मलबा आता है, वहां वैज्ञानिक सुरक्षा उपाय कितने प्रभावी साबित हुए? यदि हर वर्ष एक जैसी समस्या सामने आती है, तो क्या उसे केवल प्राकृतिक आपदा कहकर टाला जा सकता है?उत्तराखंड पिछले कुछ वर्षों में तेजी से आधारभूत ढांचा विकसित करने वाले राज्यों में शामिल रहा है। सड़कें चौड़ी हुईं, सुरंगें बनीं, चारधाम संपर्क परियोजनाओं ने नई रफ्तार पकड़ी। इन परियोजनाओं का उद्देश्य बेहतर संपर्क और आर्थिक विकास है, लेकिन इसके साथ पर्यावरणीय संतुलन और भू-वैज्ञानिक सुरक्षा पर लगातार चर्चा होती रही है। विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि हिमालय युवा पर्वतमाला है। यहां निर्माण कार्यों में अतिरिक्त सावधानी, प्रभावी जल निकासी, ढलानों का वैज्ञानिक उपचार और नियमित निगरानी आवश्यक है। यदि इन पहलुओं की अनदेखी होती है, तो भारी वर्षा के दौरान जोखिम बढ़ सकता है। यह बहस विकास के विरोध की नहीं, बल्कि सुरक्षित और टिकाऊ विकास की है।बारिश के दौरान सबसे अधिक परेशानी उस व्यक्ति को होती है जिसकी खबर शायद सबसे कम बनती है। दूरस्थ गांव की गर्भवती महिला, जिसे अस्पताल तक पहुंचने में घंटों लग जाते हैं। वह छात्र, जिसकी परीक्षा सड़क बंद होने से छूट जाती है। वह किसान, जिसकी खेत की मेड़ बारिश में बह जाती है। वह टैक्सी चालक, जिसकी पूरी कमाई पर्यटन पर निर्भर है। वह दुकानदार, जिसका सामान सड़क बंद होने के कारण समय पर नहीं पहुंच पाता। सरकारी आंकड़ों में ये केवल प्रभावित लोग होते हैं, लेकिन पहाड़ की जिंदगी में यही असली संकट है।उत्तराखंड में वर्ष 2013 की विनाशकारी आपदा के बाद यह उम्मीद बनी थी कि राज्य आपदा प्रबंधन के क्षेत्र में एक नई मिसाल बनेगा। कई सुधार भी हुए। एसडीआरएफ की क्षमता बढ़ी, संचार व्यवस्था बेहतर हुई, मौसम चेतावनी प्रणाली मजबूत हुई और राहत अभियानों में तकनीक का इस्तेमाल बढ़ा। फिर भी हर मानसून यह महसूस होता है कि सबसे कठिन चुनौती आपदा आने के बाद राहत पहुंचाने की नहीं, बल्कि आपदा के प्रभाव को पहले से कम करने की है। यदि किसी सड़क पर लगातार पांच वर्षों से भूस्खलन हो रहा है, तो उसे केवल मशीन भेजकर खोल देना समाधान नहीं कहा जा सकता। यदि किसी गांव का संपर्क हर बरसात में टूटता है, तो वहां स्थायी सुरक्षा व्यवस्था विकसित करना ही वास्तविक तैयारी होगी।आज बदलते जलवायु पैटर्न के कारण कम समय में अत्यधिक वर्षा की घटनाएं बढ़ रही हैं। इससे पर्वतीय राज्यों में जोखिम और बढ़ जाता है। ऐसे में पारंपरिक योजनाओं से आगे बढ़कर आधुनिक तकनीक, भू-वैज्ञानिक अध्ययन, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और वैज्ञानिक योजना पर आधारित रणनीति की आवश्यकता है। सिर्फ राहत पैकेज घोषित कर देना पर्याप्त नहीं होगा। आवश्यकता उस मॉडल की है जिसमें विकास, पर्यावरण और आपदा सुरक्षा एक-दूसरे के पूरक बनें। क्या मानसून पूर्व तैयारियों का स्वतंत्र मूल्यांकन होना चाहिए? क्या संवेदनशील मार्गों का वार्षिक सुरक्षा आडिट सार्वजनिक किया जाना चाहिए? क्या निर्माण एजेंसियों की जवाबदेही तय करने की व्यवस्था पर्याप्त है? क्या जिला स्तर पर स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन में अधिक भूमिका दी जानी चाहिए? क्या हर वर्ष दोहराई जाने वाली समस्याओं के लिए समयबद्ध स्थायी कार्ययोजना बनाई गई है? यह सवाल किसी एक सरकार या एक विभाग तक सीमित नहीं हैं। यह उत्तराखंड के भविष्य से जुड़े प्रश्न हैं।इस समय प्राथमिकता लोगों की सुरक्षा, राहत और आवश्यक सेवाओं की बहाली है। राहत दल लगातार काम कर रहे हैं और कई स्थानों पर कठिन परिस्थितियों में जान जोखिम में डालकर मार्ग खोलने और लोगों तक सहायता पहुंचाने का प्रयास कर रहे हैं। उनका योगदान महत्वपूर्ण है। लेकिन जब बारिश थमेगी, मलबा हट जाएगा और सड़कें फिर खुल जाएंगी, तब असली परीक्षा शुरू होगी। क्या इस बार भी समीक्षा बैठकों के बाद फाइलें बंद हो जाएंगी? या फिर उन कारणों पर गंभीरता से काम होगा जो हर मानसून में उत्तराखंड को एक जैसी त्रासदी के सामने खड़ा कर देते हैं? क्योंकि पहाड़ की जनता अब केवल यह नहीं पूछ रही कि बारिश कितनी हुई। वह यह भी पूछ रही है कि तैयारी कितनी थी और शायद यही सवाल आने वाले समय में उत्तराखंड की राजनीति, प्रशासन और विकास माडल तीनों की सबसे बड़ी परीक्षा बनने वाला है।