June 30, 2026सत्ता के गलियारों से लेकर गांव की चौपालों तक चर्चाओं का केंद्र बना मिशन 2027 संगठनात्मक बैठकों का दौर तेज और नए सामाजिक समीकरण साधने की कवायद शुरू भाजपा में हैट्रिक की चुनौती, कांग्रेस को वापसी की उम्मीद, आप और यूकेडी की सियासी जमीन की तलाश देहरादून। उत्तराखंड में भले ही विधानसभा चुनाव में अभी समय बाकी हो, लेकिन प्रदेश की राजनीति पूरी तरह 2027 के चुनावी रण के इर्द-गिर्द घूमने लगी है। सत्ता के गलियारों से लेकर गांव-गांव तक राजनीतिक चर्चाओं का केंद्र अब आगामी विधानसभा चुनाव बन चुका है। भाजपा, कांग्रेस, आप और उत्तराखंड क्रांति दल ने अपनी-अपनी रणनीतियों को धार देना शुरू कर दिया है। टिकट के दावेदार सक्रिय हो गए हैं, संगठनात्मक बैठकों का दौर तेज हो गया है और राजनीतिक दल नए सामाजिक समीकरण साधने में जुट गए हैं।इस बार का चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन या सत्ता बचाने की लड़ाई नहीं होगा, बल्कि यह उत्तराखंड की राजनीतिक दिशा और विकास के मॉडल को भी तय करेगा। बेरोजगारी, पलायन, स्थानीय अस्मिता, भू-कानून, मूल निवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और पहाड़ों में विकास जैसे मुद्दे चुनावी विमर्श के केंद्र में रहने की संभावना है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के नेतृत्व में भाजपा लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी का सपना देख रही है। यदि भाजपा ऐसा करने में सफल होती है तो वह उत्तराखंड के राजनीतिक इतिहास में नया अध्याय लिख देगी। भाजपा की रणनीति का केंद्र सरकार की योजनाओं, डबल इंजन सरकार, सड़क, रेल और हवाई कनेक्टिविटी, निवेश, धार्मिक पर्यटन और समान नागरिक संहिता जैसे मुद्दों पर रहेगा। पार्टी का मानना है कि पिछले वर्षों में बुनियादी ढांचे और निवेश के क्षेत्र में हुए कार्य उसके लिए बड़ा चुनावी हथियार बन सकते हैं।हालांकि भाजपा के सामने चुनौतियां भी कम नहीं हैं। प्रदेश में बेरोजगारी, भर्ती परीक्षाओं में अनियमितताओं, पलायन और स्थानीय असंतोष जैसे मुद्दे विपक्ष को सरकार पर हमला करने का अवसर दे सकते हैं। इसके अलावा कई सीटों पर सत्ता विरोधी लहर और टिकट वितरण भी पार्टी के लिए चुनौती बन सकता है। मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस इस बार चुनाव को पूरी तरह स्थानीय मुद्दों के इर्द-गिर्द ले जाना चाहती है। पार्टी का मानना है कि राज्य गठन के 27 वर्ष बाद भी उत्तराखंड आंदोलन के मूल उद्देश्य अधूरे हैं। कांग्रेस की रणनीति स्थानीय अस्मिता, जल-जंगल-जमीन, सशक्त भू-कानून, मूल निवास, बेरोजगारी, पलायन और युवाओं के अधिकार जैसे मुद्दों पर केंद्रित है। पार्टी यह संदेश देने की कोशिश कर रही है कि उत्तराखंड के संसाधनों पर पहला अधिकार यहां के लोगों का होना चाहिए। कांग्रेस का सबसे बड़ा दांव युवा मतदाता हैं। पार्टी बेरोजगारी और रोजगार के अवसरों की कमी को बड़ा चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में है। इसके साथ ही ग्रामीण और पर्वतीय क्षेत्रों में बढ़ते पलायन को भी सरकार की विफलता के रूप में पेश किया जाएगा। हालांकि कांग्रेस के सामने भी चुनौतियां हैं। संगठनात्मक एकजुटता, गुटबाजी और नेतृत्व के बीच तालमेल बनाए रखना पार्टी के लिए सबसे बड़ी परीक्षा होगी।आम आदमी पार्टी ने पिछले विधानसभा चुनाव में उत्तराखंड में बड़े दावे किए थे, लेकिन उसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। इसके बाद पार्टी का संगठन काफी हद तक कमजोर हुआ। इसके बावजूद आप शिक्षा, स्वास्थ्य, भ्रष्टाचार और रोजगार के मुद्दों के सहारे फिर से अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने में जुटी है। पार्टी शहरी क्षेत्रों, युवाओं और मध्यम वर्ग के बीच अपनी पैठ बनाने की कोशिश कर रही है। हालांकि प्रदेश में मजबूत संगठन और प्रभावी स्थानीय नेतृत्व की कमी उसके लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि आप कुछ सीटों पर प्रभावी लड़ाई लड़ती है तो वह मुख्य दलों के वोट समीकरण को प्रभावित कर सकती है।उत्तराखंड राज्य आंदोलन की अगुवाई करने वाली उत्तराखंड क्रांति दल के लिए 2027 का चुनाव अस्तित्व की लड़ाई बन गया है। यूकेडी एक बार फिर स्थानीय अस्मिता, मूल निवास, सशक्त भू-कानून, जल-जंगल-जमीन और उत्तराखंडियत के मुद्दों को लेकर जनता के बीच जाने की तैयारी कर रही है। पार्टी का मानना है कि प्रदेश में क्षेत्रीय राजनीति की जरूरत आज भी बनी हुई है और राष्ट्रीय दल राज्य आंदोलन की मूल भावना को पूरा करने में असफल रहे हैं। लेकिन यूकेडी के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपना खोया जनाधार वापस हासिल करने और युवाओं को पार्टी से जोड़ने की है। यदि पार्टी इन मुद्दों को जन आंदोलन का रूप देने में सफल होती है तो कुछ क्षेत्रों में चुनावी समीकरण बदल सकते हैं। भले ही चुनाव की तारीखों की घोषणा में अभी समय हो, लेकिन उत्तराखंड में चुनावी माहौल बनना शुरू हो गया है। राजनीतिक दल बूथ स्तर तक संगठन को मजबूत करने, नए मतदाताओं को जोड़ने और जनता के बीच अपने मुद्दों को स्थापित करने में जुट गए हैं।