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गालीबाज मासूम को फिर ‘मंच’

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  • डीएवी कालेज प्रकरण में एफआईआर के बाद यूपीएल फाइनल में प्रस्तुति का फैसला
  • सवालों में उत्तराखंड की सांस्कृतिक प्राथमिकता, स्थानीय कलाकारों का फिर तिरस्कार
  • उत्तराखंड में स्थानीय कलाकारों के सम्मान को लेकर छिड़ गई एक बार फिर से बहस

देहरादून। देवभूमि उत्तराखंड में मंच की मर्यादा और स्थानीय कलाकारों के सम्मान को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ गई है। अप्रैल में देहरादून के डीएवी पीजी कॉलेज में मंच से कथित अभद्र भाषा के इस्तेमाल को लेकर विवादों में आए हरियाणवी गायक मासूम शर्मा को अब उत्तराखंड प्रीमियर लीग के ग्रैंड फिनाले में दोबारा प्रस्तुति के लिए आमंत्रित किए जाने पर सवाल उठ रहे हैं। रायपुर स्थित राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट स्टेडियम में होने वाले समापन समारोह में मासूम शर्मा की प्रस्तुति प्रस्तावित है।
मामले की संवेदनशीलता इसलिए भी बढ़ गई है क्योंकि डीएवी पीजी कालेज के अप्रैल के कार्यक्रम में कथित आपत्तिजनक भाषा के मामले में डालनवाला कोतवाली में उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज हुई थी। पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता की विभिन्न धाराओं में मामला दर्ज कर जांच शुरू की थी और गायक को बयान दर्ज कराने के लिए नोटिस भी जारी किया था। बाद में शर्मा ने अपने व्यवहार के लिए सार्वजनिक रूप से खेद जताया था। अब सवाल यह है कि जब उसी प्रकरण की गूंज अभी पूरी तरह थमी भी नहीं थी, तो प्रदेश के इतने बड़े सार्वजनिक आयोजन के लिए उन्हीं कलाकार का चयन कैसे हुआ? कांग्रेस समेत विभिन्न संगठनों ने आयोजन समिति और सरकार से इस चयन की प्रक्रिया तथा पूर्व विवाद की समीक्षा को लेकर सवाल किए हैं। कांग्रेस के प्रदेश उपाध्यक्ष लालचंद शर्मा ने भी पूछा कि विवाद के बावजूद यूपीएल फाइनल में उन्हें मंच देने का निर्णय क्यों लिया गया और क्या कलाकारों के चयन को लेकर कोई स्पष्ट दिशा-निर्देश हैं।
विवाद का दूसरा पहलू उत्तराखंड के स्थानीय कलाकारों से जुड़ा है। गढ़वाल, कुमाऊं और जौनसार की समृद्ध लोकसंगीत परंपरा के साथ प्रदेश में नई पीढ़ी के अनेक गायक, वादक और संगीत समूह लगातार काम कर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रदेश के बड़े सार्वजनिक मंचों पर स्थानीय प्रतिभाओं को प्राथमिकता कितनी मिल रही है। मूल निवास और भू-कानून संघर्ष समिति ने भी यही मुद्दा उठाते हुए कहा कि उसका विरोध किसी बाहरी कलाकार से नहीं, बल्कि मंच पर अश्लीलता, गाली-गलौज और आपत्तिजनक भाषा से है। समिति ने सीएयू के साथ बातचीत में भविष्य के आयोजनों में उत्तराखंड के स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता देने की शर्त रखी।
कार्यक्रम को लेकर विरोध के बीच क्रिकेट एसोसिएशन आफ उत्तराखंड की ओर से बताया गया कि कलाकार को कार्यक्रम का आधा भुगतान पहले ही किया जा चुका है, इसलिए इस समय कार्यक्रम रद्द करना संभव नहीं है। बातचीत के बाद यह सहमति बनी कि मासूम शर्मा मंच से उत्तराखंड की जनता से सार्वजनिक रूप से माफी मांगेंगे और भविष्य में आपत्तिजनक भाषा अथवा फूहड़ प्रस्तुति नहीं करने की बात स्पष्ट करेंगे। उत्तराखंड क्रांति दल ने हालांकि कार्यक्रम रद्द कर स्थानीय कलाकारों को अवसर देने की मांग की है। दल ने कार्यक्रम रद्द नहीं होने की स्थिति में स्टेडियम के बाहर विरोध की चेतावनी भी दी है। पुलिस ने भी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पर्याप्त सुरक्षा व्यवस्था की बात कही है।
पूरे विवाद का सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या उत्तराखंड के बड़े मंचों पर कलाकारों के चयन का कोई सांस्कृतिक और सामाजिक मानदंड होना चाहिए? कलाकार किसी भी प्रदेश का हो सकता है और देशभर के कलाकारों का उत्तराखंड में स्वागत भी होना चाहिए, लेकिन स्थानीय प्रतिभाओं को लगातार हाशिये पर रखकर बाहरी कलाकारों को प्राथमिकता देने की शिकायत लंबे समय से सामने आती रही है।
देवभूमि की पहचान केवल पर्यटन और क्रिकेट तक सीमित नहीं है। यहां की पहचान उसकी लोकभाषाओं, लोकधुनों, परंपराओं और उन कलाकारों से भी बनती है, जिन्होंने सीमित संसाधनों के बावजूद पहाड़ की संस्कृति को देश-दुनिया तक पहुंचाया है। इसलिए सवाल मासूम शर्मा के कार्यक्रम से आगे बढ़कर उत्तराखंड की सांस्कृतिक नीति और आयोजकों की प्राथमिकताओं का भी है। बड़े मंचों पर बाहर से आने वाले कलाकारों का स्वागत हो, लेकिन क्या उसी मंच पर पहाड़ की अपनी आवाज को भी उतनी ही जगह मिलेगीकृयह सवाल अब उत्तराखंड के कलाकारों और सांस्कृतिक जगत के बीच चर्चा का विषय बन गया है।

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