उत्तराखंड में होने वाले पंचायत चुनाव देश के वर्तमान लोकतंत्र की हकीकत बयंा की जीती जागती तस्वीर है। सत्ता को चुनाव कब कराना है यह बात सरकार अपनी सहूलियत के अनुसार तय करेगी। कोई उस पर सवाल नहीं उठा सकता है। चुनाव आयोग सत्ता के दिशा निर्देश पर चुनाव कार्यक्रम बनाएगा। राज्य में भले ही पंचायत एक्ट लागू हो लेकिन एक्ट के किस नियम का पालन किया जाएगा और किसका नहीं यह भी सत्ता द्वारा ही तय किया जाएगा। भले ही चुनाव आयोग को दो—दो अधिसूचना जारी करनी पड़े। चुनाव आयोग की हालत यह है कि उसे बार—बार अपने आदेशों पर स्पष्टीकरण के लिए कोर्ट जाना पड़ रहा है। जब निष्पक्षता और पारदर्शिता का अभाव होता है तो सरकार और चुनाव आयोग को बार—बार अपनी नीतियां और फैसला बदलने पर मजबूर होना पड़ता है। आरक्षण रोटेशन से लेकर चुनाव की तारीखें तय करने और आवेदन पत्रों की जांच से लेकर दो—दो मतदाता सूचियों में नाम होने के तमाम मुद्दों पर अब तक जितने सवाल खड़े हो चुके हैं उन्हें देखकर अब लोग यह कहने लगे हैं कि यह चुनाव हो रहा है या फिर कोई तमाशा हो रहा है। पहले समय पर चुनाव न कराया जाना और फिर चुनाव कराए जाने के लिए मानसून के आपदा काल को सही समय ठहराया जाना ही गलत था लेकिन आरक्षण रोटेशन की तमाम खामियों के उजागर होने के बाद चुनाव की अधिसूचना जारी होना फिर उसे रद्द कर दूसरी अधिसूचना जारी किया जाना ऐसी अजब गजब स्थितियां रही हैं जो इससे पूर्व पहले कभी नहीं देखी गई। नगर निकाय व पंचायत की सूचियाें में दो—दो तीन—तीन जगह नाम के जिस मुद्दे पर हाईकोर्ट अपना स्पष्ट फैसला सुना चुका है कि यह असंवैधानिक है, के बावजूद भी चुनाव आयोग द्वारा ऐसे प्रत्याशियों को चुनाव लड़ने से न रोका जाना जिनके नाम दो—दो सूचियां में दर्ज हैं क्या यह कोर्ट के फैसले की अवमानना नहीं है? इसका जवाब एक आम आदमी भी जानता है। लेकिन इसके बावजूद भी 700 से अधिक ऐसे उम्मीदवार चुनाव लड़ रहे हैं जिनके नाम दो—दो मतदाता सूची में दर्ज हैं। जिनके बारे में खुद यह उम्मीदवार भी जानते हैं कि यह कानूनी तौर पर अपराध है जिसमें उनको 7 साल की सजा भी हो सकती है तथा चुनाव जीतने के बाद भी उनके चुनाव जीतने को अवैध करार दिया जाना तय है लेकिन फिर भी वह चुनाव मैदान में डटे हैं। उनका मानना है कि इसके लिए वह खुद जिम्मेदार नहीं है चुनाव आयोग जिम्मेदार है। निसंदेह यह चुनाव आयोग की अकर्मठता का ही प्रमाण है। चुनाव आयुक्त द्वारा बिना ठोस आधार के जब प्रत्याशियों के नामांकन पत्र रद्द किए जा सकते हैं तो इससे बड़ा साक्ष्य अकर्मठता का क्या हो सकता है। सही मायने में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली ही निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं तो चुनाव क्या खास पारदर्शी होंगे? लेकिन हाई कोर्ट की अवमानना तक पहुंचे इस मामले की अब बड़ी कीमत निर्वाचन आयोग को चुकानी पड़ेगी यह तय है कि प्रत्याशियों का जो होगा सो तो होगा ही।




