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डेमोग्राफी चेंज बड़ा मुद्दा

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उत्तराखंड की राजनीति में अब डेमोग्राफी चेंज एक ऐसा बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन चुका है या फिर आप यह भी कह सकते हैं कि बना दिया गया है कि सत्तारूढ़ भाजपा जैसे दलों को यह मुद्दा सत्ता की चाबी लगने लगा है। इस मुद्दे को लेकर दो बातों को समझना जरूरी है। पहली बात यह है कि क्या वास्तव में कोई बहुत बड़ा डेमोग्राफिक चेंज हुआ है या हो रहा है? और दूसरा सवाल यह है कि क्या इसे रोकने के लिए उठाए जा रहे कदम सही है। राज्य की वर्तमान भाजपा सरकार धर्मांतरण कानून और नए भू—कानून को अपनी बड़ी उपलब्धियों में शुमार करती है। सरकार द्वारा राज्य में हो रहे अवैध अतिक्रमण को हटाने और धार्मिक संरचनाओं पर बुलडोजर चलाने का अभियान लंबे समय से चलाया जा रहा है मजारों पर रोज बुलडोजर चलाये जा रहे हैं तथा मदरसों के खिलाफ सीलिंग की कार्यवाही भी पूरे प्रदेश में चल रही है। सवाल यह है कि क्या धार्मिक संरचनाएं व अवैध मदरसे ही इस डेमोग्राफिक चेंज का अहम कारण है। या फिर अवैध रूप से बसने वाली बस्तियां भी इसका कारण है। पूरे राज्य में अवैध बस्तियों की उत्पत्ति कोई एक दिन में नहीं हुई है। भले ही इनकी संख्या कम रही हो लेकिन राज्य गठन से पूर्व भी राज्य में सैकड़ो अवैध बस्तियां थी खास बात यह है कि इन बस्तियों को बसाने वाले भी नेता ही थे और इन बस्तियों तक बिजली—पानी व सड़कों जैसी सुविधाएं पहुंचाने वाले भी नेता ही थे। इन अवैध बस्तियों के नियमितिकरण को लेकर बीते दो दशकों से जो राजनीति हो रही है वह किसी से भी छिपी नहीं है लेकिन इस समस्या का कोई समाधान न आज तक हुआ है और न होगा। क्योंकि यह मुद्दा वोट से जुड़ा हुआ है ठीक वैसे ही अब डेमोग्राफिक चेंज का मुद्दा भी वोट से जुड़ चुका है। अभी 2 दिन पूर्व सीएम धामी का एक बयान आया था जिसमें उन्होंने कहा था कि मैं राज्य की डेमोग्राफी को चेंज नहीं होने दूंगा इसके साथ ही उन्होंने राज्य की जनता से यह भी अपील की थी कि इसके लिए उन्हें राज्य के लोगों के सहयोग की जरूरत है। बीते कल प्रेस क्लब में एक पत्रकार वार्ता में शिव प्रसाद सेमवाल द्वारा अधोईवाला में 200 बीघा वन भूमि पर सैकड़ो अवैध निर्माण और कब्जे होने का मुद्दा उठाया गया। इससे पहले अभी तपोवन के खलंगा क्षेत्र में एक अवैध रिजॉर्ट निर्माण का मामला सामने आया था जिसे कुछ युवा नेताओं के विरोध के बाद रोका गया। सवाल यह है क्या इन अवैध कब्जों से राज्य की डेमोग्राफी पर कोई प्रभाव नहीं पड़ रहा है? इन अवैध बस्तियों को सरकारी और वन भूमि पर कौन बसा रहा है और क्यों बसा रहा है राजधानी में सरकार की नाक के नीचे होने वाले इन अवैध कब्जों पर कभी शासन—प्रशासन की नजर क्यों नहीं जाती है? दरअसल डेमोग्राफी चेंज को सिर्फ हिंदू—मुस्लिम के चश्मे से ही देखा जाता है। यही कारण है कि हमारे नेताओं का ध्यान अवैध अतिक्रमण पर कम डेमोग्राफी चेंज पर ज्यादा है। रही बात अवैध अतिक्रमण और जमीनों की लूटपाट की तो बीते 20 सालों में जितने व्यापक स्तर पर यह खेल होता रहा है अब कुछ बचा नहीं है। अब तो स्थिति ट्टअब पछताये होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत’ जैसी ही है। राज्य में सैकड़ो सालों से जैसे पहले देश के कोने—कोने से लोग आकर बस गए यह क्रम हमेशा जारी रहेगा। फर्क इतना भर आया है कि अब किसे उत्तराखंड में बसने दिया जाएगा और किसे नहीं।

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