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बेरोजगारों को धोखा

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केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा कल बेरोजगारों के लिए एक रोजगार प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दे दी गई। एक लाख करोड़ की इस योजना से साढ़े तीन करोड़ रोजगार पैदा होने का दावा किया गया है। मोटा—मोटी इस योजना को ऐसे समझा जा सकता है कि कोई नियोक्ता अगर किसी बेरोजगार को पहले नौकरी देता है तो सरकार उस कर्मचारी को एक महीने का वेतन जो अधिकतम 15 हजार होगा सरकार द्वारा नियोक्ता के खाते में कुछ किस्तों में डाला जाएगा जो कर्मचारी के तय वेतन से अलग होगा। लेकिन नियोक्ता को इसके लिए क्षमता (जरूरत) से अधिक कर्मचारी रखने पर ही इसका लाभ दिया जाएगा इसके अलावा भी अन्य कई शर्तें इसमें जोड़ी गई हैं। यह लाभ बेरोजगारों व नियोक्ताओं को अगस्त 2025 से 2027 के बीच दी जाने वाली नौकरियों पर ही मिल सकेगा। सरकार का दावा है कि नियोक्ताओं का इस अतिरिक्त श्रम से अपना कारोबार बढ़ाने का लाभ होगा वहीं बेरोजगारों जिनकी संख्या 3.30 करोड़ होगी, को रोजगार मिल सकेगा। इस योजना को जान समझ कर कोई भी व्यक्ति इस बात का अनुमान लगा सकता है कि यह सरकार द्वारा बेरोजगारी के मुद्दे की असफलता को छिपाने का एक प्रयास और बेरोजगारों को एक और खूबसूरत झांसा देने की कोशिश है जैसा कि पिछले एक दशक से सरकार करती आ रही है। बात चाहे केंद्रीय नेताओं के और भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री द्वारा नौकरी पाने वालों को नियुक्ति पत्र बांटे जाने के हाईटेक राजनीतिक ड्रामे की हो जिसे हम बीते कई सालों से देखते आ रहे हैं। देश के युवाओं को 2014 से पहले भी सरकारी नौकरियां मिलती थी क्या आपने कभी प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को समारोह का आयोजन कर उन्हें नियुक्ति पत्र बांटते देखा था? दर असल सत्ता पाने के लिए जो अनाप—शनाप ऐसे वायदे कर दिए जाते हैं जिन्हें कभी पूरा नहीं किया जाता उनके परिणाम दीर्घकाल में ठीक नहीं होते हैं। बेरोजगारी भी एक ऐसा ही मुद्दा है। हर साल 2 करोड़ युवाओं को सरकारी नौकरी देने का वादा करने वाले प्रधानमंत्री मोदी और उनकी सरकार से भले ही कोई यह सवाल न पूछे कि इस वायदे का क्या हुआ? लेकिन जिन युवा बेरोजगारों ने अच्छे दिन आने के वायदे पर भरोसा करके उन्हें एक नहीं दो—दो बार वोट दिया वह अब समझ चुके हैं कि उन्हें कैसे धोखा दिया गया है। जिन गरीबों को 15 लाख खाते में आने और काला धन वापस लाने के लालच में भाजपा को वोट दिया था उनका भरम भी अब टूट चुका है। सत्ता में बैठे लोग खुद ही कह चुके हैं कि वह तो चुनावी शगुफा था। युवाओं को जो बेरोजगार है उन्हें पकोड़ा तलने और बेचने को रोजगार बता कर उनका मखौल भी यह नेता उड़ाते रहे हैं। ऐसे में युवाओं की नाराजगी भी लाजमी है। इस सच को सत्ता में बैठे लोग भी जानते हैं कि साल में 2 करोड़ रोजगार देने का वादा करने के 10 साल में उन्होंने कितने लोगों को रोजगार दिया है। बढ़ती बेरोजगारी और पेपर लीक की घटनाओं ने युवाओं को कितनी पीड़ा दी है यह वही जानते हैं। सेना में होने वाली रेगुलर भर्ती की जगह लाई गई अग्निवीर योजना का भी फोड़ा फूट चुका है जिसमें अब सरकार कई संशोधन करने में जुटी है। सत्ता में बैठे नेता युवाओं का भरोसा खो चुके हैं यही कारण है कि अब सरकार प्राइवेट नौकरियां करने वालों को 10—15 हजार देकर उन्हें कह रही है कि हमें आपका भी ख्याल है। जबकि भरोसा यह भी नहीं है कि यह 10—15 हजार भी उन्हें मिलेगा या फिर इसका फायदा भी नियोक्ता उठा ले जाएंगे। धन्य है सरकार के नीति नियंत्रक और उनकी सोच की जो युवा बेरोजगारों पर इतनी बड़ी मेहरबानी कर रहे हैं।

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