उच्च हिमालयी राज्यों के लिए यूं तो गर्मी, सर्दी, बरसात का कोई भी मौसम आसान नहीं होता है। गर्मी के मौसम में धधकते जंगल इंसानी जीवन और वन्य जीव जंतुओं की जान पर भारी पड़ते हैं वही सर्दी के मौसम में बर्फबारी आवा गमन को ठप कर देती है और कड़ाके की सर्दी को सहना एक बड़ी चुनौती बन जाता है इस सब के बीच मानसून काल तो जैसे तमाम आपदाओं को लेकर आता है। अभी एक दिन पहले ही रुद्रप्रयाग के दूर दराज क्षेत्र के गांव में मामूली सी बरसात के बाद एक घर भरभरा कर गिर गया जिसमें सो रहे दंपति और उनके दो मासूम बच्चे मलबे में दबकर मर गए। अभी 2 दिन पहले ही मौसम विभाग द्वारा राज्य में मानसून पहुंचने की बात कही गई है लेकिन उत्तराखंड में मानसून पहुंचने की घोषणा के साथ ही राज्य में 25 जून तक भारी बारिश का रेड अलर्ट भी जारी कर दिया गया है। यही नहीं केदारनाथ राजमार्ग पर 4 किलोमीटर के हिस्से में पहाड़ से पत्थरों की बरसात हो रही है इस भूस्खलन की घटना में दो लोगों की जान जा चुकी है वहीं आधा दर्जन लोग घायल हो चुके हैं। केदारनाथ पैदल यात्रा मार्ग पर यात्री भागते हुए बचते—बचाते इस रास्ते को पार कर रहे हैं। जो अत्यंत ही जोखिम भरा है। अभी खराब मौसम के कारण गौरीकुंड के जंगलों में हेलीकॉप्टर क्रैश की घटना में सात लोगों की मौत हो गई थी जिसके बाद हेली सेवा को अभी तक शुरू नहीं किया जा सका है। 23 जून से तो वैसे भी मानसून काल के लिए हेली सेवा को बंद किया जाना था अब तक हजारों यात्रियों के टिकट कैंसिल किये जा चुके हैं। तथा अब हेली सेवा को मानसून काल के लिए पूर्णतया बंद किया जा चुका है। बात सिर्फ चार धाम यात्रा और चार धाम यात्रियों की सुरक्षा तक ही सीमित नहीं है। पूरे राज्य में मानसून काल में कहीं रोड ब्लॉक तो कहीं बाढ़ और बादल फटने की घटनाओं के कारण पूरे राज्य का जनजीवन बुरी तरह से प्रभावित होता है। राज्य का आपदा प्रबंधन विभाग में मानसून काल शुरू होने से महीनों पहले ही तैयारियां शुरू कर दी जाती हैं। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी अब तक तमाम विभागों की कम से कम तीन समीक्षा बैठक कर चुके हैं। आपदा के कारण स्वास्थ्य सेवाओं, ऊर्जा सेवाओं व सड़क तथा परिवहन सेवाओं को दुरुस्त रखना जरूरी होता है। मार्ग बंद होने पर उसे कितनी जल्द खोला जा सके तथा पेयजल और स्वास्थ्य सेवाओं के अलावा पीड़ित लोगों व प्रभावितों तक तुरंत मदद पहुंचाने के लिए सड़क, बिजली, पानी की व्यवस्थाओं के साथ—साथ दवाओं व भोजन व्यवस्था को दुरस्त रखने की जरूरत होती है। मानसून से पूर्व ही जरूरी आवश्यकता की वस्तुओं व खाघान्न का भंडारण करना पड़ता है। चार धाम यात्रा का संचालन भी जारी रहता है। भले ही समय—समय पर उसमें रुकावटें आती रहती है। अब तक 35—36 लाख यात्री चार धाम की यात्रा कर चुके हैं। देखना होगा कि यह आंकड़ा कहां तक पहुंचता है। लेकिन इससे ज्यादा जरूरी है आपदा प्रबंधन का बेहतर होना क्योंकि आपदाओं को रोका जाना संभव नहीं है। इससे होने वाले नुकसान को जितना कम किया जा सके बेहतर है।




