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वीवीआईपी कल्चर का मारा देश

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यह अलग बात है कि तमाम नेताओं और अधिकारियों द्वारा देश में प्रचलित वीआईपी और वीवीआईपी के कल्चर को अच्छा नहीं माना जाता है। कई नेताओं और अधिकारियों के द्वारा सुरक्षा और व्यवस्थाओं के नाम पर उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं का लाभ सीमित मात्रा में लेने के प्रयास भी किए जाते हैं लेकिन आमतौर पर हर एक उच्च पद पर बैठे लोग जिन्हें वीआईपी और वीवीआईपी की श्रेणी में रखा जाता है उन्हें अपना रुतबा कायम रखने के लिए तमाम तरह के ताम—झाम अत्यंत ही जरूरी व मनभावन लगते हैं। इन वीआईपी और वीवीआईपी के साथ जितना लंबा गाड़ियों का काफिला और सुरक्षा का ताम—झाम होता है वहीं उनके पद के रूतबे का मापदंड माना जाता है। इससे जुड़ी दो बातें सबसे अहम होती हैं पहली बात है इस कल्चर पर किए जाने वाला खर्च और दूसरी बात है इस कल्चर के कारण आम आदमी को होती परेशानी और असुविधा। देश के नेताओं द्वारा इस वीआईपी कल्चर को मेंटेन रखने पर अपने वेतन—भत्तों और अन्य तमाम सुविधाओं पर होने वाले खर्चे से 100 गुना से भी ज्यादा खर्च किया जाता है। जो पैसा इस वीआईपी कल्चर पर खर्च होता है वह जनता की गाड़ी कमाई का होता है। हालात यह होते हैं कि अगर किसी मंत्री को 4—6 विभागों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ती है तो विभाग से उसे गाड़ी, घोड़ा इत्यादि सभी सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। वीआईपी कल्चर पर खर्च को अगर आधा भी कर दिया जाए तो 10 सालों में देश से गरीबी दूर हो सकती है। अब रही बात दिक्कतों की जो आम आदमी को उठानी पड़ती है। कई बार आपने ऐसी भी खबरें सुनी होगी कि इस वीआईपी कल्चर के झमेले में फंसी एंबुलेंस मरीज को समय पर अस्पताल नहीं पहुंचा सकी और मरीज ने दम तोड़ दिया। इन दिनों राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू दून के दौरे पर है। कल उनके कार्यक्रमों के चलते राजपुर रोड जैसे शहर के सबसे प्रमुख एवं व्यस्ततम रोड को 4—5 घंटे तक जीरो जोन रखा गया। इस दौरान आसपास के गली मोहल्लों तक की सड़कों पर जाम जैसी स्थितियां रही और लोग फंसे रहे। यही नहीं इस साइलेंस जोन में पूरी तरह से सन्नाटा रहा। इस क्षेत्र में दुकानदार और व्यवसायियों की दुकानों को न सिर्फ बंद करा दिया गया, कुछ दुकानें अगर खुली भी मिली तो उनके चालान काट दिए गए। यह स्वाभाविक ही है कि जब आम आदमी को अपना घर परिवार चलाने के लिए काम करने से भी रोका जाएगा तो उनमें नाराजगी होगी ही। लोग अखबारों के दफ्तरों को फोन कर शिकायतें करते दिखे। कई क्षेत्रों से तो कूड़ा उठाने के लिए आने वाली गाड़ियां भी न पहुंचने और कूड़ा उठान न होने की शिकायत भी लोगों ने की। पता चला कि नगर निगम के सफाई कर्मियों की ड्यूटी उन क्षेत्रों में लगाई गई थी जिन क्षेत्रों में राष्ट्रपति का आना—जाना था। कितनी अच्छी बात है कि इस गर्मी के मौसम में सड़कों व मोहल्लों में भले ही गंदगी के ढेर लगे रहे लेकिन जिन सड़कों से राष्ट्रपति को गुजरना है वह एकदम चकाचक देखनी चाहिए। लेकिन देश के इस सिस्टम का किया भी क्या जा सकता है पिछली बार जब राष्ट्रपति आई थी तो प्रशासन उनकी सुरक्षा व व्यवस्था में जुटा रहा था और दिनदहाड़े राजपुर रोड पर बदमाश एक ज्वेलरी शोरूम में डकैती डालकर साफ निकल गए थे। सिस्टम और सरकार के सामने तो किसी का कोई अधिकार टिकता नहीं है तो इसके बारे में कहना भी क्या?

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