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संवैधानिक व्यवस्था का मुद्दा

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क्या केंद्र सरकार द्वारा संवैधानिक संस्थाओं और मर्यादाओं तथा परंपराओं का महत्व मिटाने की कोशिशें की जा रही है यह सवाल हम यहां खुद नहीं उठा रहे हैं राज्यसभा में नेता विपक्ष और कांग्रेस के शीर्ष नेता तथा अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लिखे पत्र में उठाया गया है जिसमें उन्होंने लोकसभा में डिप्टी स्पीकर के 6 साल से खाली पड़े पद को मानसून सत्र से पूर्व भरने की मांग की है। देश के संसदीय इतिहास में यूं तो बीते एक दशक में अनेक ऐसी घटनाएं पेश आ चुकी है जो संवैधानिक व्यवस्थाओं और परंपराओं के अनुकूल नहीं है। लेकिन लोकसभा में डिप्टी स्पीकर का चुनाव ही न कराने की यह घटना ऐसी घटना है कि इससे पूर्व यह पद कभी खाली नहीं रहा है। 2019 से खाली पड़े इस पद पर सरकार ने किसी भी व्यक्ति को न बैठा कर एक नया इतिहास रचा गया है। परंपरा के अनुसार डिप्टी स्पीकर का यह पद विपक्ष के पास रहता है। मिली जुली सरकार के समय में उस दल का कोई नेता डिप्टी स्पीकर बनाया जाता रहा है जो सबसे बड़ा विपक्षी दल होता है। 2004 में जब भाजपा विपक्ष में थी तो विपक्षी गठबंधन के अकाली दल के नेता चरण जीत को लोकसभा का डिप्टी स्पीकर बनाया गया था उसके बाद भाजपा के नेता करिया मुंडा डिप्टी स्पीकर बनाए गए थे। लेकिन अब 2019 के बाद केंद्र सरकार द्वारा इस पद को ही समाप्त कर दिया गया है। राज्यसभा और लोकसभा में स्पीकर और डिप्टी स्पीकर की भूमिका कितनी अहम होती है यह हम सभी जानते हैं। सत्ता पक्ष का स्पीकर भले ही होता हो लेकिन स्पीकर की कुर्सी पर बैठने वाला कोई भी नेता किसी दल विशेष का नेता नहीं रह जाता है क्योंकि यह एक संवैधानिक दायित्व का पद होता है। स्पीकर की कुर्सी पर बैठने वाले व्यक्ति को दलीय राजनीति से ऊपर उठकर काम करने की जरूरत होती है। लेकिन भाजपा के बीते 10 सालों में राज्यपाल जैसे महत्वपूर्ण संवैधानिक पदों का जिस तरह से दुरुपयोग होता रहा है उसका उदाहरण महाराष्ट्र के पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी अकेले नहीं है। अभी तमिलनाडु के राज्यपाल भी इस तरह के आरोपो को लेकर चर्चाओं के केंद्र में रह चुके हैं। बात चाहे ईडी के पूर्व डायरेक्टर रहे मिश्रा की हो जिन्हें सरकार द्वारा कई बार सेवा विस्तार देकर पद पर बनाए रखा गया अथवा निर्वाचन आयोग के पूर्व मुख्य आयुक्त की हो जिन पर चुनाव में सत्ता पक्ष को लाभ पहुंचाने का आरोप लगाया जाता रहा है। अनेक ऐसे उदाहरण है जो इस बात को रेखांकित करते हैं कि भाजपा के 10—11 साल के शासनकाल में संवैधानिक संस्थाओं को शून्य बनाए जाने के सबूत हैं। भाजपा ने तो कांग्रेस मुक्त देश से लेकर विपक्ष मुक्त संसद तक का घोषणा और इरादों में कोई कोर कसर ही नहीं उठाकर रखी है। विपक्ष को दर्शक दीर्घा में बैठाने और अब की बार 400 पार का नारा देने वाली भाजपा का यदि 2024 में यह सपना पूरा हो जाता तो देश में न लोकतंत्र बचता और न ही संविधान, इस सत्य को अब देश की जनता भी जान चुकी है। गनीमत रही की 2024 में जनता ने भाजपा की इन उम्मीदों पर पानी फेर दिया।

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