यह विडम्बना ही है कि राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे गम्भीर मुद्दों पर भी सियासत इस कदर हावी है कि जिस भी नेता के मन में जो भी आता है बिना सोचे समझे पहलगाम में आतंकी हमले और उसके परिणाम स्वरूप आप्रेशन सिन्दूर के तहत की गयी कार्यवाही पर अनाप—शनाप कुछ भी बोले जा रहा है। न तो इन नेताओं को पहलगाम जैसी घटना की संवेदनशीलता और उसके निःतार्थ में छिपी मजहब पूछकर की इन 28 लाूेगों की तालिबानी लहजे में की गयी हत्याओं को कोई रजोगम है और उसके क्या मायने है? तथा इसके पीछे क्या मंशा थी? इस बात से कोई सरोकार है। सबसे अधिक खास बात यह है कि इस काम को सत्ताधारी दल के नेता कर रहे है जो विपक्षी दलों के नेताओं को सियासत न करने की दलीलें दे रहे है। मध्य प्रदेश के मंत्री जो कर्नन सोफिया पर अपने निंदनीय बयान के लिए न्यायालीय झमेले को झेल रहे है। यह अलग बात है लेकिन भाजपा जो स्वंय को सबसे अनुशासित पार्टी होने का ढोल पीटती है भी उनके खिलाफ कोई कार्यवाही करना तो दूर एक शब्द भी नहीं बोल सकी है। हद तो तब हो गयी जब प्रधानमंत्री बीकानेर की एक सभा मे ऐसा कुछ बोल गये जिसे लेकर वह खुद भी ट्रोलर आर्मी के निशाने पर आ गये है और लोग उनके बयान को लेकर यहंा तक कह रहे है कि वाह मोदी जी आपदा में अवसर कैसे तलाशे जाते है। आप से बेहतर इस काम को कोई और नही कर सकता है। आपको सोचने की जरूरत नही है कि उन्होने क्या कहा। वह कहते है कि मै नरेन्द्र मोदी मां भारतीय का सेवक सीना तानकर खड़ा हुं। मेरा दिमाग ठंडा है लेकिन खून गरम है। और अब तो मेरी नसों में खून नहीं गरम सिन्दूर दौड़ रहा है। उनके इस बयान पर भले ही सभा में लोग तालियंा बजाते दिख रहे हो लेकिन जिन परिवारों ने पहलगाम हमले में अपनो को खोया है वह तथा देश के लोग क्या सोचते है। इसका अंदाजा अब उन्हे ट्रोल करने वालोे की भाषा—बोली से भली प्रकार हो गया होगा। पहलगांम हमले को अब एक महीना बीत चुका है। और लोग पूछ रहे है कि क्या हुआ उन आंतकवादियों का जिन्होने मां बहनो का सिन्दूर उजाड़ने का काम किया था। क्या उनको मुठभेड़ में ढेर कर दिया गया है या फिर उन्हे गिरफ्तार कर लिया गया है। जिन आतंकियों की तस्वीरें हमले के तुरन्त बाद ही सामने आ गयी थी उनका आज तक भी कोई अता—पता क्यों नहीं मिल सका है। नेता विपक्ष राहुल गांधी ने तो एक्स पर अपनी एक पोस्ट में यहंा तक लिखा कि वह एक्टिंग करना और फिल्मी डायलाग बोलना बंद करें और सवालों का जवाब दें। आप्रेशन सिंदूर से देश को कितना जान माल का नुकसान हुआ और हमने अपने कितने जांबाज खो दिये यह बताये। आप्रेशन सिंदूर से देश को क्या मिला? यह बताये। कई लोग तो इस आप्रेशन को सिंदूर नाम दिये जाने को भी सरकार की सोची समझी राजनीतिक रणनीति तक बता रहे है। जो आने वाले चुनावों में महिला मतदाताओ को प्रभावित करने का खेल है। लोगों का कहना है कि बीकानेर के भाषण से इसकी शुरूआत की जा चुकी है। ख्ौर प्रधानमंत्री को इस पर कुछ भी कहने का हक है। क्योंकि वह देश के प्रधानमंत्री है। उन्होने पूर्व समय मे अपने भाषण में कहा था कि मै गुजराती हूं और पैसा मेरी नसों में बहता है। तब भी लोगों ने मान लिया था कि आप ठीक कह रहे है। अब अगर वह कह रह है कि उनकी नसों में खून नही ंगरम सिंदूर बहता है तो आज नहीं कल लोग मान ही लेगें? और फिर लोगों का क्या है? उन्हे जो कहना है कहते रहे। इससे क्या फर्क पड़ता है।




