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हमने आईना दिखाया, तो बुरा मान गये

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इसमें कोई संदेह नही है कि अब हमारा सिस्टम कोई सवाल सुनना नहीं चाहता है। उत्तराखण्ड के चमोली जिले के एक स्कूल मेंं एक शिक्षक ललित मोहन सती ने शिक्षा विभाग और शिक्षकों की समस्याओं का सच बताना अगर अनुशासनहीनता मान लिया जाता है और अपरनिदेशक गढ़वाल उन्हे नोटिस जारी कर जवाब मांगते है तो यह घटनाक्रम यह बताने के लिए काफी है कि सिस्टम से कोई सवाल नहीं किया जा सकता और न ही उसे अपनी समस्या कोई कर्मचारी या नागरिक बता सकता है। अगर वह पत्राचार के जरिए संबन्धित विभाग या अधिकारी अथवा किसी मंत्री से अपनी समस्या का समाधान चाहेगा तो उसको कोई जवाब नहीं मिलेगा और उसको अपनी फाइल की तलाश भी मुश्किल हो जायेगी और अगर सार्वजनिक मंच से अपनी बात कह दी तो वह अनुशासन हीनता मान ली जायेगी। ललित मोहन सती का दोष यही था कि उन्होने शिक्षा मंत्री धन ंिसंह रावत के सामने सार्वजनिक मंच से अपनी विभागीय समस्याओं का पुलिंदा उनके सामने रख दिया गया। यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। यहंा शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत ने फिर भी संयम बरतते हुए ललित मोहन को अपनी बात कहने देने को कहा गया क्योंकि उन्हे कुछ अधिकारी रोकने का प्रयास कर रहे थे। अगर उनकी जगह त्रिवेन्द्र सिंह रावत होते तो उन्होने तो इतना सब होने पर ललित मोहन को गिरफ्तार करने का आदेश दे दिये होते राज्य के लोग अब तक उस घटना को नहीं भूले होगें जब एक शिक्षिका अपने स्थानान्तरण की समस्या को लेकर तत्कालीन सीएम त्रिवेन्द्र के जनता दरबार में पहुंची थी। शिक्षिका की पूरी बात सुनने औ समझने से पहले ही त्रिवेन्द्र सिंह रावत इस कदर गुस्से में आ गये कि उन्होने शिक्षिका का न सिंर्फ अपमानजनक शब्द बोलने में कोई हिचक की बल्कि सुरक्षाकर्मियों को उन्हे बाहर निकालने व गिरफ्तार करने तक के आदेश दे दिये गये। उनके इस व्यवहार के लिए उन्हे भले ही कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा हो लेकिन इससे एक बात तो साफ है कि सिस्टम कोई सवाल सुनना नहीं चाहता है और अगर कोई उसे आईना दिखाने की कोशिश भी करेगा तो उसके ही खिलाफ कार्यवाही की जायेगी। अब थोड़ा राज्य की शिक्षा व्यवस्था के वास्तविक हाल की भी बात करना जरूरी है। अभी बीते सत्र के दौरान सरकार ने खुद यह बात स्वीकार की थी कि राज्य में 90 फीसदी माध्यमिक विघालयों में प्रधानाचार्य नहीं है और वह बिना प्रधानाचार्य के ही चल रहे हैं। राज्य में कुल 1385 पदों के सापेक्ष सिर्फ 277 पद ही भरे हुए हैं। 1108 पद खाली पड़े हैं वहीं प्रधानाध्यापक के 910 पदों में से सिर्फ 109 पद ही भरे हुए हैं। 801 पद खाली हैं। राज्य की 1740 स्कूल ऐसे हैं जो सिर्फ एक अध्यापक के भरोसे ही चल रहे हैं गुरु जी आ गए तो स्कूल खुलेगा और नहीं आए तो छुटृी। यही नहीं 146 स्कूल ऐसे भी हैं जहां सिर्फ एक ही छात्र पढ़ता है जबकि स्कूल में 4 से 6 तक स्टाफ है। 2021 में जीरो छात्र संख्या होने के कारण स्कूलों पर ताले डाल दिए गए थे शिक्षा विभाग में राज्य बनने के बाद हजारों की संख्या में अर्जी फर्जी दस्तावेजों पर शिक्षकों की नियुक्तियों से लेकर राज्य के शिक्षको के प्रमोशन वेतन भत्तों से लेकर अन्य तमाम तरह की समस्याएं हैं। जिन्हें लेकर शिक्षकों में भारी आक्रोश है। सवाल यह है कि राज्य गठन की 25 साल बाद भी अगर प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की ऐसी दुर्दशा है तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है सत्ता में बैठे लोग 25 साल में भी इस सिस्टम को क्यों नहीं सुधार सके? क्या सरकार से यह सवाल करना अनुशासनहीनता है। एक सवाल यह भी है कि क्या शिक्षा मंत्री ललित मोहन सती के सवालों का जवाब देंगे। सही मायने में वह किसी सजा नहीं पुरस्कार के हकदार हैं जिन्होंने मंत्री के सामने आईना रखने का साहस किया अब अगर मंत्री या सिस्टम को बुरा लगता है तो लगे।

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