पर्यटन नगरी नैनीताल में 12 वर्षीय लड़की के साथ दुष्कर्म की जो वारदात सामने आई है उसे लेकर जनाक्रोश स्वाभाविक है इस घटना की जितनी भी निंदा की जाए कम है। पुलिस प्रशासन द्वारा भी इस घटना को अत्यंत गंभीरता से लिया गया है तथा आरोपी को गिरफ्तार कर उसे पर सशक्त धाराओं में मुकदमा किया गया है। लेकिन इस घटना को लेकर इसके विरोध में उमड़ी भीड़ द्वारा जिस तरह से आरोपी की सजा की मांग को लेकर तमाम दुकानों, होटलों और रेस्टोरेंटों को निशाना बनाया गया है उसे कदाचित भी उचित नहीं ठहराया जा सकता है। क्योंकि किसी भी अपराधी को सजा देने का अधिकार न्यायपालिका को है न कि आम लोगों को। भीड़ के द्वारा जिन लोगों को निशाना बनाया गया है उन्होने तो कोई अपराध नहीं किया है फिर उनको निशाना बनाना भी तो अपराध ही है। जो लोग कानून को अपने हाथों में लेने की अनाधिकृत चेष्टा कर रहे हैं उनके खिलाफ भी पुलिस को वैसे ही सख्त कार्रवाई करने की जरूरत है जैसी अपराधियों पर की जाती है। यह ठीक है की बच्ची के साथ दुष्कर्म करने वाला आरोपी दूसरे धर्म का है लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं हो सकता की उनके धर्म के सभी लोग अपराधी है। इस घटना के विरोध में लोगों द्वारा जिस तरह की अराजकता शहर में फैलाई गई थी। उसी का नतीजा है कि इस मामले में हाईकोर्ट द्वारा स्वतः संज्ञान लेते हुए जिला अधिकारी को शांति व्यवस्था बनाए रखने के निर्देश दिए गए हैं और कहा गया है कि वनभूलपुरा जैसी घटनाओं की पुनवर्ती नहीं होनी चाहिए। इस घटना के बाद नैनीताल से पर्यटकों द्वारा पलायन किया जाना तथा होटल की 30 फीसदी से भी अधिक बुकिंग कैंसिल होना यह बताने के लिए काफी है कि लोग किस कदर दहशत में है और इससे राज्य के पर्यटन तथा व्यवसाययों को कितना नुकसान हो रहा है। उत्तराखंड में बीते कुछ समय से अल्पसंख्यक और बहुसंख्यको के बीच तकरार व टकराव की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। बात चाहे धार्मिक संरचनाओं को हटाने और उन पर बुलडोजर चलाये जाने की हो या फिर अवैध मदरसों पर की जाने वाली सीलिंग की कार्रवाई की। समाज में नफरत का जहर लगातार घुल रहा है जहां भी जो भी कुछ गलत या नाजायज और अवैध तरीके से हुआ है या हो रहा है उस पर कार्यवाही होनी ही चाहिए लेकिन इस कार्यवाही की आड़ में किसी धर्म विशेष या समुदाय विशेष को टारगेट नहीं किया जाना चाहिए। अभी बीते दिनों उत्तरकाशी में एक मस्जिद को अवैध बताकर उसके खिलाफ आंदोलन चलाया गया जिसमें पत्थर चलने से हालात बिगड़ गये थे। इसी दौर में हमने गांवों की सीमाओं पर लगे वह नोटिस बोर्ड भी देखें जिन पर गैर हिंदुओं के प्रवेश को निषेध होने की चेतावनी लिखी थी। बीते कल ही राजधानी दून की सड़क पर एक गाड़ी के खराब हो जाने की मामूली सी घटना को लेकर न सिर्फ हिंसक वारदात का रूप ले लिया बल्कि इसे सांप्रदायिक रंग दे डाला गया। सांप्रदायिकता का जो जहर देवभूमि उत्तराखंड की शांत वादियो में लंबे समय से घुलता दिखाई दे रहा है उसके पीछे नेताओं की वह हिंदू मुस्लिम करने की राजनीति ही है। चार धाम यात्रा में मुसलमानों के प्रवेश पर रोक की बात से तत्कालीन सीएम हरीश रावत के समय में मुस्लिम यूनिवर्सिटी बनाने व जुम्मे की छुटृी जैसी बातों पर गौर करें तो यही लगता है कि नेताओं के पास हिंदू—मुस्लिम करने के सिवाय कुछ और शेष नहीं बचा। लेकिन इसका बड़ा नुकसान देवभूमि की संस्कृति, समाज और उस पर्यटन पर हो रहा है जो राज्य की आर्थिक की रीढ़ है।




