Home उत्तराखंड देहरादून शिक्षा का बाजारीकरण

शिक्षा का बाजारीकरण

0
742


शिक्षा के बजारीकरण पर कुछ लिखने से पहले हम दून के जिलाधिकारी सविन बंसल को इस बात के लिए साधुवाद देना चाहेंगे जिन्होंने राजधानी में अपने अधिकारियों की टीमे उतार कर किताबों के विक्रेताओं के खिलाफ कार्रवाई कर इस दिशा में एक सकारात्मक पहल करने का प्रयास किया है। क्योंकि इससे पूर्व स्कूलों की मनमानी और आम आदमी की इस अति गंभीर समस्या पर किसी भी अधिकारी ने कभी ध्यान ही नहीं दिया। जिसके कारण स्कूलों द्वारा की जाने वाली अनाप—शनाप फीस वृद्धि और पुस्तक विक्रेताओं की खुली लूट तथा उत्पीड़न का शिकार अभिभावक होते रहे हैं। डीएम बंसल ने अब यह साफ कर दिया है कि शिक्षा में माफिया राज नहीं चलने देंगे। स्कूल प्रशासन पुस्तक विक्रेताओं और पब्लिशर्स के इस गोरख धंधे की अब हर स्तर पर जांच भी होगी और उनके खिलाफ कार्रवाई भी होगी निश्चित तौर पर इससे समाज के हर वर्ग और हर घर को बड़ी राहत मिलेगी क्योंकि हम सभी के बच्चे स्कूलों में पढ़ते हैं। दरअसल यह स्कूलों का जो गोरख धंधा है वह कोई नया नहीं है शिक्षा क्षेत्र के निजीकरण के साथ ही समाज के कुछ अति सयाने लोगों द्वारा इसे एक बड़े मुनाफे के कारोबार के तौर पर विकसित करने का काम शुरू कर दिया गया था तथा राज्यों की सरकारों द्वारा इन्हें रोकने की बजाय पिछले दरवाजे से उनकी मदद की जाती है जिसके कारण सरकारी स्कूलों का स्तर पिछड़ता चला गया और वह वीरान हो गए। वहीं यह निजी स्कूल फलते—फूलते रहे और अब यह स्थिति हो चुकी है कि इन स्कूलों में सामान्य आदमी का अपने बच्चों को पढ़ा पाना इसलिए मुश्किल हो चुका है क्योंकि इनका खर्च वहन करना उनके सामर्थ्य से बाहर होता जा रहा है। हर साल 10 से 25 फीसदी तक शुल्क वृद्धि तथा पुस्तकों और ड्रेस की मनमानी कीमते वसूलने से लेकर अन्य तमाम इवेंट्स के आयोजनों के नाम पर मोटी रकम लिए जाने से अभिभावक इतने परेशान हो चुके हैं कि वह साल नया सत्र शुरू होने पर इसके खिलाफ धरने प्रदर्शनों पर मजबूर हो रहे हैं। अब देखना यह है कि जिलाधिकारी बंसल इस अच्छे काम में कितने सफल हो पाते हैं। क्योंकि यह माफिया इतने सशक्त हो चुके हैं कि वह उन्हें रोकने के लिए उनके स्थानांतरण तक की हद तक जा सकते हैं। एक अन्य सवाल यह है कि बात सिर्फ पुस्तकों की कालाबाजारी या स्कूलों की फीस स्ट्रेक्चर तय करने तक ही यह समस्या सीमित नहीं है। ओवर रेटिंग का यह मर्ज और जीएसटी चोरी के आदी हो चुके इस सिस्टम को सुधारना आसान काम नहीं है। अभी शराब बिक्री के लिए खुले ठेकों पर ओवर रेटिंग की खबरो के बाद डीएम खुद सामान्य आदमी बनकर ठेकों तक पहुंच गए और उनसे भी अधिक पैसे लिए गए तो उन्होंने इस पर तत्काल कार्रवाई के निर्देश दिए। सवाल यह है कि क्या डीएम ही सारी व्यवस्थाएं सुधारेंगे? शराब पर ओवर रेटिंग रोकने के लिए तैनात आबकारी की टीमें क्या सिर्फ इन ठेकों से वसूली के लिए ही बनी है? बाजार में आप एक टूथपेस्ट से लेकर किताबों तक कुछ भी खरीदने चले जाएं कोई दुकानदार आपको पक्का बिल नहीं देगा, भले ही आप हजारों रुपए की खरीदारी क्यों ना करें। अगर आप पक्का बिल मांगोगे तो वह बिल बुक अकाउंटेंट के ले जाने का बहाना बनाते दिखेगा। सवाल यह है जब बिल बुक अकाउंटेंट के पास है तो तू दुकान क्यों खोले बैठा है। दरअसल यह संपूर्ण व्यवस्था भ्रष्टाचार की, लूट की और अनियमितताओं की इतनी अभ्यस्त हो चुकी है कि इस इस दलदल से निकालने के लिए एक सविन बंसल के बस की बात नहीं है। ऐसे अधिकारियों को आप अंधेरी कोठरी में रोशनी की एक किरण ही मान सकते हैं। सुधार के लिए इस देश में ऐसे नेताओं और अधिकारियों की एक बड़ी फौज की जरूरत है। फिर भी हमें आशा और उम्मीदों का दामन तो थामना ही पड़ेगा इसलिए यह सोचिए कि आज नहीं तो कल सूरज जरूर निकलेगा और अंधेरा भी जरूर हारेगा।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here