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कौन कर रहा है पहाड़ी और मैदानी?

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उत्तराखंड की राजनीति पर अब देशी और पहाड़ी का मुद्दा इस कदर हावी होता जा रहा है कि इसके आसानी से थमने की उम्मीद नहीं दिख रही है। संसदीय कार्य मंत्री प्रेमचंद अग्रवाल के इस्तीफे को कुछ राज्य के नेताओं द्वारा इसे अपनी पहली और बड़ी जीत बताकर जब यह प्रचारित किया जाने लगा कि उन्होंने प्रेमचंद के रूप में पहला विकेट गिरा दिया है अब दूसरों की बारी है। तभी यह साफ हो गया था कि लड़ाई रुकने वाली नहीं है। यूकेडी के कुछ नेताओं द्वारा सोशल मीडिया पर जिस तरह के वीडियो डाले गए जिसमें महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्ष संतोष भंडारी पहाड़ के लोगों से खुकरी निकालने और बाहरी लोगों की गर्दन काटने तथा राज्य से भागने की धमकियां देती दिखाई दी तथा कुछ यूकेडी के नेता होटल और रेस्टोरेंटों में गढ़वाली और कुमंाऊनी गाने बजाने न बजाने जैसे मुद्दों पर भाषण बाजी करते हुए व्यापारियों को डराने धमकाने लगे और उनके वीडियो वायरल हुए तो इन घटनाओं ने आग में घी डालने का काम करना शुरू कर दिया। इन यूकेडी नेताओं को राज्य आंदोलन के उसे दौर को जानने और समझने की जरूरत है जब वीर चंद्र से गढ़वाली को अपना आदर्श मानने के संकल्प के साथ यूकेडी का गठन किया गया था। इन नेताओं को यह भी समझने की जरूरत है की नेतागिरी और दादागिरी दोनों में बहुत अंतर होता है। व्यापारियों के खिलाफ जिस तरह उनके द्वारा डराने धमकाने और उन्हें भागने की धमकियां दी जा रही है उससे यूकेडी की साख को चार चांद नहीं लग सकते हैं। न ही वह अपने पुराने वजूद को हासिल कर सकती है। व्यापारियों द्वारा एसएसपी कार्यालय पर प्रदर्शन व घेराव के बाद पुलिस ने अब इन धमकी बाज यूकेडी नेताओं पर कार्यवाही शुरू कर दी है तो यूकेडी के नेता प्रेस वार्ता कर मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और एसएसपी तक को चुनौती देते हुए कह रहे हैं कि लगता है धामी और उनकी सरकार के दिन आ गए हैं। सवाल यह है कि यूकेडी के यह नेता इस पहाड़ और मैदान की लड़ाई को छेड़ कर या इसे तूल देकर क्या यूकेडी के सत्ता में आने के सपने संजोए हुए हैं या फिर इसके पीछे उनका कोई दूसरा मकसद है। प्रेमचंद के इस्तीफे के बाद होटल व ढाबे में वह क्या तलाश रहे हैं यह विवाद तो वहीं समाप्त हो जाना चाहिए था यूकेडी के नेता अगर इस पहाड़ और मैदान की राजनीति के पीछे भाजपा का हाथ बता रहे हैं तो वह खुद ऐसे काम करके भी भाजपा के ही हाथ मजबूत क्यों कर रहे हैं। यह राजनीति है या फिर नेता गिरी है अथवा दादागिरी, यूकेडी के नेताओं को यह खुद विचार करना चाहिए जिस पहाड़ और मैदान की इस जंग को राज्य में बढ़ावा दिया जा रहा है उससे न तो यूकेडी का और न बीजेपी का कुछ भला होने वाला है हां एक बात निश्चित है कि इससे राज्य को बड़ा नुकसान जरूर हो सकता है। प्रशासन को कानून व्यवस्था को बनाए रखने के लिए वह सब करना ही पड़ेगा जो वह कर रहा है कुछ गिरफ्तारियां और मुकदमों के बाद क्या यह लड़ाई शांत हो जाएगी। अगर कोई ऐसा सोचता है तो वह भी गलत है इससे समस्या का समाधान संभव नहीं है। अच्छा हो कि पहाड़ के लोग और नेता पहाड़ और मैदान के इस विभाजनकारी विवाद को तूल देना बंद करें और राज्य में शांति व्यवस्था बनाए रखकर विकास की ओर बढ़े जिसकी राज्य को दरकार है।

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