चुनाव दर चुनाव पराजय ही पराजय से परास्त उत्तराखंड के कांग्रेसी नेता अब कुर्ता घसीटन पर उतर आए हैं। बात चाहे पूर्व सीएम हरीश रावत की उन टिप्पणियों की हो जो उनके द्वारा हाल के दिनों में अपने ट्विटर अकाउंट पर की जा रही है अथवा पूर्व प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व मंत्री प्रीतम सिंह की जो स्पष्ट तौर पर बड़े बदलाव का समर्थन करते हुए कह रहे हैं कि हाई कमान को जो भी फैसला करना है जल्द से जल्द करना चाहिए अथवा वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा की जो पत्रकार वार्ता कर वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं को उचित मंच पर अपनी बात रखने की नसीहत देते हुए कहते हैं कि कांग्रेस में स्लीपर सेल कौन है यह सभी जानते हैं अथवा पूर्व मंत्री तिलक राज बेहड़ की जो आम कार्यकर्ताओं के सामने कांग्रेस संगठन में उच्च पदों पर बैठे लोगों की बखिया उड़ाने में कोई कोर कसर उठाकर नहीं रखते हैं। इन तमाम नेताओं के बयानों को अगर सुना और समझा जाए तो यह साफ हो जाता है कि इन तमाम कांग्रेसी नेताओं के बीच इन दिनों एक महासंग्राम छिड़ा हुआ है। अभी—अभी जो निकाय चुनाव हुए हैं उसमें कांग्रेस को मिली करारी हार के बाद इन नेताओं के बीच पनप रहे आपसी मतभेदों और मनभेदों को पूरी तरह से सतह पर ला दिया है। कांग्रेस के तमाम नेता जिनकी संख्या दर्जन भर से भी अधिक है। दिल्ली दरबार की दौड़ लगा रहे हैं तथा अपनी अपनी आपत्तियां हाई कमान के सामने दर्ज करा रहे हैं। हालात इतने गंभीर हो चुके हैं कि यह नेता साफ—साफ इस बात को कह रहे हैं कि अगर पार्टी के संगठनात्मक ढांचे में शीघ्र कोई बड़ा बदलाव नहीं किया गया तो 2027 भी हाथ से चला जाएगा। इन नेताओं द्वारा निकाय चुनावों में टिकट बेचने से लेकर अपनी ही पार्टी प्रत्याशियों को हराने के खुल्लम खुल्ला आरोप लगाये जा रहे हैं। सीधे तौर पर कहे तो प्रदेश अध्यक्ष करन माहरा के खिलाफ पूर्व सीएम हरीश रावत और उनके समर्थको द्वारा अब खुलेआम मोर्चा खोल दिया गया है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कांग्रेस के अंदर लंबे समय से चली आ रही इस आपसी लड़ाई ने ही आज कांग्रेस को उस स्थिति में लाकर खड़ा कर दिया है कि वह लोकसभा जैसे बड़े चुनावों से लेकर निकाय और नगर पंचायत जैसे चुनावों में जीत से दूर हो चुकी है। 2015—16 से कांग्रेस के अंदर जारी यह आंतरिक कलह और आपसी खींचतान की स्थिति इतनी विकराल रूप ले चुकी है कि इस लाइलाज हो चुकी बीमारी का कोई सटीक इलाज कर पाना हाई कमान के लिए भी आसान काम नहीं रह गया है। हाई कमान द्वारा प्रदेश अध्यक्षों की अदला—बदली से लेकर तमाम प्रदेश प्रभारियों को बदलने तक कई प्रयास किये जा चुके हैं लेकिन नतीजा डाक के तीन पाथ ही है। अब यह नेता अपने नेताओं पर भाजपा के लिए काम करने तक के खुलेआम आरोप लगा रहे हैं कि वह दिन में कांग्रेस के दफ्तर में बैठते हैं और रात में भाजपा नेताओं के साथ बैठक करते हैं। ऐसी स्थिति में कांग्रेस के कल्याण की क्या बात सोची जा सकती है एक अन्य बात यह है कि जब कांग्रेस के सभी नेता अपनी खुद की विश्वसनीयता खो चुके हैं तो फिर उन पर कोई भी नेता या कार्यकर्ता भला कैसे भरोसा कर सकता है। हाईकमान इस हालात से निपटने के लिए कितने नेताओं को बदलता है यह देखना होगा लेकिन कांग्रेस में बड़े बदलाव की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता है।




