रुड़की के झबरेड़ा थाना क्षेत्र से आई इस खबर पर भले ही शासन—प्रशासन में बैठे किसी नेता या अधिकारी की नजर जाए या न जाए अथवा उनके द्वारा भले ही इसे नजर अंदाज कर दिया जाए लेकिन देश के अन्नदाताओं से जुड़ी इस खबर से यह जरूर साफ होता है कि देश के किसानों के हालात आसानी से बदलने वाले नहीं है। झबरेड़ा थाना क्षेत्र के गांव सुमाड़ी के एक युवा किसान सुनील दत्त ने अपनी जीवन लीला जहर खाकर इसलिए समाप्त कर ली क्योंकि वह बैंक से लिए गए ऋण को नहीं चुका पा रहा था और बैंक के प्रबंधक और दो अन्य कर्मचारियों द्वारा इसे लेकर सुनील और उसके परिजनों का लगातार उत्पीड़न किया जा रहा था। सुनील की अस्पताल में हुई मौत के बाद भले ही अब पुलिस ने आरोपी बैंक कर्मियों के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर लिया हो लेकिन अब सुनील को न तो दोबारा जिंदगी मिल सकती है और न उसके परिवार की जो मानहानि हुई है उसकी कोई भरपाई की जा सकती है। यह अत्यंत ही दुखद विषय है कि सरकारों द्वारा किसानों को दी जाने वाली सुविधाओं का ढिंढोरा तो पीटा जाता है लेकिन उनको दी जाने वाली यह सुविधा उनके लिए राहत कम आफत का सबब अधिक बन जाती है। देश में हर 24 घंटे में दो किसानों द्वारा अपनी आर्थिक तंगियों के कारण आत्महत्या कर ली जाती है। देश की सरकार द्वारा एक तरफ आजादी के अमृत काल का ढोल पीटा जा रहा है तथा भारत को विकसित राष्ट्र बनाने तथा विश्व की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बनाने की बात कही जा रही है वहीं देश के अन्नदाताओं की आर्थिक बदहाली उन्हें रोज आत्महत्या करने पर विवश कर रही हैं। सत्ता में बैठे लोगों द्वारा बड़े उघोगपतियों का 14 लाख करोड़ का कर्ज माफ कर दिया जाता है वही नीरव मोदी और विजय माल्या जैसे अनेक लोग देश के बैंकों से लाखों करोड़ का कर्ज लेकर विदेश भाग जाते हैं और सरकार उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती है। दूसरी तरफ अगर एक किसान लाख 2 लाख का ऋण भी बैंक से लेता है तो उसे इस हद तक उत्पीड़न किया जाता है कि वह अपनी जान देकर ही इस कर्ज से मुक्ति का उपाय ढूंढने पर विवश हो जाता है। जब देश आजाद हुआ था तब देश के सामने सबसे बड़ी समस्या थी अन्न का इतना कम उत्पादन की वह आज की तुलना में एक चौथाई आबादी का भी भरण पोषण नहीं कर पा रहा था तब पंडित नेहरू ने ट्टजय जवान और जय किसान, के नारे को देश की प्रगति का आधार बनाया था। नतीजतन एक हरित क्रांति से ही देश खाघान्न में आत्मनिर्भर हो गया। आज देश के प्रधानमंत्री उन्ही किसानों की मेहनत के दम पर 81 करोड़ लोगों को मुफ्त का राशन बांट रहे हैं लेकिन उन्हें फसल बीमा और किसान सम्मान निधि के नाम पर धोखा और 500 रूपये महीना दिया जा रहा है। किसान एमएसपी गारंटी कानून को लेकर सालों से सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं तथा अब तक 750 से अधिक किसानों की जान जा चुकी है लेकिन उन्हें उनका वह अधिकार भी नहीं मिल पा रहा है जिसके वह हकदार है। उनके उत्पीड़न के तमाम तरीके तो तलाश लिए गए हैं लेकिन उन्हें सरकार से कोई राहत देने को तैयार नहीं है। देश के किसानों को समाप्त करने पर तुली सरकार किसान और कृषि विहीन देश को कहां ले जा सकेगा यह सत्ता में बैठे लोगों के लिए एक सोचनीय सवाल है।




