उत्तराखंड राज्य को बने भले ही 25 साल का समय होने जा रहा हो लेकिन राज्य सरकारों की अब तक की कार्यप्रणाली पर गौर किया जाए तो वह कोई भी फैसला सर्वसम्मति से लेने और किसी भी योजना को नियोजित ढंग से समय पर पूरा करने में असमर्थ या यूं कहें कि फेल ही साबित हुई है। राज्य गठन के बाद राज्य का नाम बदलकर उत्तरांचल से उत्तराखंड किए जाने जैसे फैसले भी या गैर जरूरी माने जाते रहे या बेकार की राजनीति के मुद्दे रहे हो। राज्य बनने के बाद दून को राज्य की अस्थाई राजधानी के तौर पर अस्तित्व में लाया गया। लेकिन स्थाई राजधानी पर फैसला न किए जाने के बाद देहरादून में राजधानी के जरूरी मूलभूत ढांचे को खड़ा किया जाता रहा। रिस्पना के किनारे विधान भवन व सचिवालय का निर्माण इसलिए भी किया जाना जरूरी था क्योंकि राज काज चलाने के लिए इस सब की अपरिहर्ता थी। लेकिन हास्यास्पद बात यह है कि राज्य गठन के दो दशक बीत जाने के बाद भी राज्य की सरकार और नेता राज्य की स्थाई राजधानी पर कोई फैसला नहीं कर पायेे। राज्य गठन के एक दशक बाद राजधानी देहरादून या फिर गैरसैंण अन्यथा कहीं और इस पर कोई फैसला कोई सरकार नहीं कर सकी। देहरादून में राज्य अवस्थापना कार्यों को जहां निरंतर जारी रखा गया वही गैरसैण को राज्य की स्थाई राजधानी बनाने और राजधानी के चयन के नाम पर राजनीतिक ड्रामेंबाजी सब कुछ एक साथ चलता रहा। राजधानी दून में भव्य सीएम आवास का निर्माण हो या रायपुर क्षेत्र में नए विधानसभा भवन के बनाए जाने की प्रक्रिया सरकारों की इसी कार्य प्रणाली का एक नमूना है। 9 साल पहले राज्य सरकार द्वारा रायपुर में 60 हेक्टेयर वन भूमि पर एकविधानसभा निर्माण के लिए केंद्र सरकार को प्रस्ताव भेजा गया था जिस पर सरकार को वन विभाग द्वारा सैद्धांतिक मंजूरी भी दे दी गई थी लेकिन इसके 7 साल बाद भी राज्य की सरकार इस दिशा में दो कदम आगे नहीं बढ़ सकी। इसके पीछे जो अहम कारण था गैरसैॅण को राजधानी बनाने की राजनीति। तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा ने गैरसैंण के लिए जो नींव रखी और यहां विधान भवन की भूमि का पूजन किया उसके बाद राज्य की स्थाई राजधानी का मुद्दा हमेशा के लिए अधर में लटक गया। भले ही अब राज्य की दो राजधानियां अस्तित्व में आ चुकी हों लेकिन इनमें से कोई भी स्थाई राजधानी नहीं है। गैरसैंण को भाजपा की सरकार ने ग्रीष्मकालीन राजधानी घोषित कर दिया है जबकि दून अभी भी अस्थाई राजधानी ही बना हुआ है। रायपुर में बनने वाली नई विधानसभा भवन की इमारत का क्या हुआ? अब यह नया विधान भवन बनेगा भी या नहीं। अथवा इसकी अब जरूरत है भी या नहीं? यह कई अहम सवाल है। जब राज्य सरकार ने इस मुद्दे पर 7—8 साल चुप्पी साधे रखी तो वन विभाग ने भी जमीन देने की मंजूरी को खारिज कर दिया और सरकार को कह दिया है कि वह इतनी अधिक वन भूमि विधान भवन को नहीं दे पाएगा वह कोई और जमीन तलाश करें वही सचिवालय में बैठे अधिकारी अभी भी दोबारा प्रस्ताव भेजने की बात कह रहे हैं। यह कोई एक नहीं ऐसे अनेक मुद्दे हैं जो सरकार की घोर लापरवाही का सबूत है। जिसके कारण राज्य का विकास तो प्रभावित हो ही रहा है साथ—साथ राज्य का बड़ा नुकसान भी हो रहा है यूपी के साथ परिसंपत्तियों के बंटवारा भी आज तक अधर में लटका है।




