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अध्यादेश! अध्यादेश का खेला

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उत्तराखंड सरकार ने अतिक्रमण की जद में आने वाली 582 के आसपास मलिन बस्तियों को बचाने के लिए नगर निगम संशोधन अध्यादेश 2024 की अवधि को अगले 3 साल के लिए बढ़ा दिया है। पिछले 6 सालों में सरकार इन बस्तियों के नियमितीकरण की दिशा में भले ही एक कदम भी आगे न बढ़ सकी हो लेकिन अध्यादेश! अध्यादेश का खेला खेलते हुए उसने 9 साल तक इस मुद्दे को लंबित रखने में सफलता जरुर हासिल कर ली है। सरकार के रवैये से भले ही यह साफ दिख रहा हो कि इसके पीछे सरकार की मंशा क्या है? लेकिन विधायक और पूर्व मेयर विनोद चमोली जैसे नेता अभी भी यही कह रहे हैं कि सरकार इन मलिन बस्तियों के नियमितीकरण को लेकर गंभीर है। सरकार अगर वास्तव में इन मलिन बस्तियों को मालिकाना हक दिलाने को लेकर गंभीर रही होती तो क्या बीते छह सालों में उसने कुछ तो किया होता जो जमीन पर दिखाई देता। कांग्रेस का कहना है कि अपने राजनीतिक तुष्टिकरण से वह मलिन बस्तियों में रहने वाले लोगों को धोखा दे रही है। उनके वोट बटोरने का सरकार ने इसे जरिया बना लिया है। जो आठ लाख से भी अधिक वोटर इन बस्तियों में रहते हैं उनको भय में रखकर भाजपा उनके वोट पर एकाधिकार बनाए रखना चाहती है। 2016 में हाईकोर्ट द्वारा इन बस्तियों को अतिक्रमण मानते हुए इन्हें हटाने के आदेश दिए गए थे लेकिन तब से लेकर आज तक यह मुद्दा मुद्दा ही बना हुआ है। खास बात यह है कि इसके कारण नगर निकाय चुनाव भी अधर में लटके हुए हैं या उन्हें भी अधर में लटकाए रहने का काम किया जा रहा है। कोर्ट द्वारा निकायों में ओबीसी आरक्षण की स्थिति स्पष्ट किए जाने का आदेश दिया गया था। मलिन बस्तियों में ओबीसी आरक्षण तय करने के मुद्दे पर सरकार ने ऐसा पेंच फंसा रखा है कि इसके समाधान न होने तक निकाय चुनाव भी नहीं हो पा रहे थे। दरअसल सरकार में बैठे नेता सब कुछ अपनी सुविधानुसार चलाना चाहते हैं वह इस बात की कतई भी परवाह नहीं करते हैं कि न्यायालय ने क्या आदेश दिया है या फिर विपक्ष क्यों हल्ला कर रहा है उन्हें इस बात से भी कोई सरोकार नहीं है कि इन मलिन बस्तियों में रहने वालों का भविष्य क्या है उनकी सोच सिर्फ अपने राजनीतिक हितों तक ही सीमित है। वह कैसे आसानी से साधे जा सकते हैं? लेकिन इस तरह की राजनीति जनहित कारी नहीं मानी जा सकती है। सरकार ने अब इन मलिन बस्तियों को 3 साल के लिए सुरक्षा कवच तो पहना दिया है लेकिन उनके भविष्य का सवाल आज भी सवाल ही बना हुआ है यह सवाल 9 सालों में भी हल हो सकेगा इसकी कोई गारंटी नहीं है इन तीन सालों में न जाने कितनी राजनीतिक उठा पटक होगी और स्थितियां बदलेगी? आगे 3 साल बाद आने वाले नेता व सरकार जाने समझे फिलहाल वह सत्ता में है उन्होंने अपने पूरे विवेक से जो करना चाहिए था कर दिया है।

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