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चले जाना रतन नवल टाटा का

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भारतीय उघोग जगत की महान हस्ती और इंसानियत की प्रतिमूर्ति रतन नवल टाटा अब हमारे बीच नहीं रहे। जिनके हर एक उत्पाद को ट्टमजबूत और विश्वास का मतलब टाटा’ जैसे चिरंजीवी स्लोगन के साथ जाना जाता है। उघोग जगत की एक ऐसी हस्ती जिसने सॉफ्टवेयर से लेकर नमक तक को अपने व्यवसाय का हिस्सा बनाया और देश—विदेश तक जिनका कारोबारी रिश्ता रहा। यह अलग बात है कि वह भारत के धनी व्यक्तियों की सूची में शामिल नहीं जैसे अंबानी और अडानी है लेकिन उघोग जगत की कोई भी बड़ी से बड़ी धनिक हस्ती उनके इंसानियत के जज्बे के आसपास भी दिखाई नहीं देता है। एक नहीं ऐसी अनेक मिसाल है जो उनकी इंसानियत और सादगी का उदाहरण बनकर रह गई है। अभी कोरोना काल में जब भारी परेशानियों और मुश्किलों के दौर से तमाम लोग गुजर रहे थे तब उन्होंने तमाम तरह की मदद की। अंबानी जैसे उघोग समूहों ने अपने कर्मचारियों की सैलरी में जब कटौती कर दी थी तब उन्होंने अपने किसी भी कर्मचारी के वेतन में कोई भी कटौती नहीं की और कई महीने तक बिना काम किये भी उनका पूरा वेतन दिया था। यह रतन टाटा ही थे कि उन्होंने अमेरिका में हुए 9/11 की हमले के बाद जब उन्हें पता चला कि कर्मचारियों को परेशानियां हो रही है तो वह उनकी मदद के लिए भी आगे आए थे। रतन टाटा वास्तव में एक व्यक्ति नहीं विचार थे उनकी सोच थी कि अगर कोई आपको पत्थर मारता है तो आप उन पत्थरों से अपना महल बना सकते हैं जबकि हर आदमी की सोच ईंट का जवाब पत्थर से देने की होती है। अपने कर्मचारियों के बारे में उनकी सोच हमेशा ही यही रही कि आप अगर उनके सुख—दुख का ख्याल रखेंगे तभी वह अपनी बेहतर सेवाएं दे सकते हैं। एक आम आदमी का परिवार भी गर्मी सर्दी और बरसात के मौसम में अपने परिवार के साथ अपनी कार में सफर करने सपना पूरा कर सके उनकी इसी सोच से नैनो का उत्पादन शुरू किया गया था। अपने काम को निरंतर करते रहने वाले रतन नवल टाटा का कहना था कि आपका कौन सा फैसला सही या गलत है यह महत्वपूर्ण नहीं है महत्वपूर्ण यह है कि आप अपने हर फैसले को सही फैसला साबित करने के लिए क्या करते हैं। रतन टाटा ने अपनी सकारात्मक सोच और मेहनत के दम पर वह सब कुछ हासिल किया जो विरले लोगों को ही हो पाता है। देश और जनकल्याण की भावनाओं के साथ अपनी तमाम उम्र उन्होंने अत्यंत ही सादगी के साथ भरपूर रूप से जी। तमाम सम्मानों से उन्हें नवाजा गया वह कहते थे कि हम सभी के पास भले ही समान प्रतिभा नहीं होती किंतु अवसर सभी के पास समान होते हैं। हम लोग कोई कंप्यूटर नहीं है इंसान है इसलिए हमें हमेशा ही गंभीर नहीं बना रहना चाहिए और जीवन को आनंद के साथ जीना चाहिए। कहा जाता है कि किसी व्यक्ति के विचार ही उसके चरित्र और व्यक्तित्व का निर्धारण करते हैं। उन्होंने उघोग जगत में रहकर बहुत कुछ कमाया लेकिन उन्होने यह कमाई सिर्फ अपने लिए ही नहीं की वह जीवन भर अपने लाभांश का 30 प्रतिशत से अधिक खर्च जनकल्याण के कार्यों पर करते रहे। उनकी उदारता के लिए आने वाली पीढ़ियां भी उनसे बहुत कुछ सीख सकती हैं 86 वर्ष की आयु में वह आज हमें छोड़कर चले जरूर गए हैं किंतु ऐसे महान व्यक्तित्व के लोग जाते कहीं नहीं है वह एक विचार के रूप में हमेशा जीवित रहते हैं। ईश्वर उनकी परम आत्मा को अपने चरणों में स्थान दें और उनके जैसी विभूतियां भारत की धरती पर बार—बार आती रहे। यही हमारी उन्हें श्रद्धांजलि है।

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