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ध्याण: मैत की ‘महक’ और ससुराल की ‘साख’

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  • उत्तराखंड के पहाड़ों की परंपरा का अनोखा और अटूट रिश्ता
  • बेटी ससुराल जाती है ‘ध्याण’ बनकर जोड़ती है दो रिश्तों को
  • दो परिवारों, दो गांवों और दो संस्कृतियों का है आपसी मिलन
  • पहाड़ के गांवों में ध्याण का मायके से रिश्ता होता है बेहद खास

देहरादून। पहाड़ के लोक-जीवन में ‘ध्याण’ मात्र एक शब्द नहीं, बल्कि एक संपूर्ण संस्कृति और सम्मान का प्रतीक है। हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के गांवों में जब कोई बेटी ब्याह कर ससुराल की देहरी लांघती है, तो वह केवल एक ‘वधू’ की नई पहचान नहीं पाती, बल्कि अपने मायके के लिए वह ‘ध्याण’ के एक पूजनीय और भावनात्मक रिश्ते में बंध जाती है।
पहाड़ की परंपराओं के अनुसार विवाहित बेटी को ध्याण कहा जाता है। वह एक ऐसा जीवंत सेतु है जो दो परिवारों, दो गांवों और दो संस्कृतियों को आपस में जोड़ती है। बुजुर्ग कहते हैं कि जिस घर की ध्याण खुशहाल होती है, उस घर की सात पीढ़ियां तर जाती हैं। मैत के लिए वह आज भी वही छोटी बच्ची है जो कभी गांव की पगडंडियों पर दौड़ती थी, जबकि ससुराल के लिए वह घर की मर्यादा और लक्ष्मी का रूप है।
उत्तराखंड के पहाड़ों में बोली जाने वाली भाषा सिर्फ संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि भावनाओं की गहराई को व्यक्त करने का जरिया भी है। यहां के शब्दों में रिश्तों की गर्माहट और जीवन की सादगी साफ झलकती है। पहाड़ी समाज में ‘ध्याण’ का अर्थ केवल एक विवाहित बेटी नहीं, बल्कि वह भावनात्मक पहचान है, जिसमें बेटी दूर रहकर भी अपने घर की आत्मा बनी रहती है। विवाह के बाद उसका घर बदल जाता है, जिम्मेदारियां बदल जाती हैं, लेकिन मायके के प्रति उसका स्नेह और अधिकार वैसा ही बना रहता है।
पहाड़ के गांवों में ध्याण का मायके से रिश्ता बेहद खास होता है। साल भर में जब भी वह मायके आती है, तो घर का माहौल बदल जाता है। उसके आने से आंगन में फिर से रौनक लौट आती है। मां-बाप के चेहरे पर संतोष और खुशी दिखाई देती है, जबकि भाई-बहनों के लिए यह मिलन पुराने दिनों की यादों को ताजा कर देता है। पहाड़ में त्योहार, मेलों और विशेष अवसरों पर ध्याण को मायके बुलाने की परंपरा रही है। यह सिर्फ एक सामाजिक रिवाज नहीं, बल्कि उस भावनात्मक जुड़ाव का प्रतीक है, जो समय और दूरी के बावजूद कायम रहता है।
पहाड़ी समाज में बेटी की विदाई हमेशा भावुक क्षण होता है। ध्याण के रूप में उसकी पहचान उस दर्द को भी समेटे होती है, जो उसे मायके से दूर होने पर महसूस होता है। लेकिन यही दूरी हर मुलाकात को और भी खास बना देती है। जब ध्याण मायके लौटती है, तो वह सिर्फ एक बेटी नहीं, बल्कि खुशियों का पूरा संसार लेकर आती है। उसकी उपस्थिति घर के हर कोने को जीवंत कर देती है।
‘ध्याण’ का आधुनिकता के इस दौर में भी अपनी जड़ों के प्रति उसका लगाव कम नहीं हुआ है। वह आज भी अपनी लोक-संस्कृति की सबसे बड़ी संवाहक है। ‘ध्याण’ आज भी पहाड़ की संस्कृति और संवेदना यह उस अटूट रिश्ते की पहचान है, जो बेटी के ससुराल जाने के बाद भी मायके से कभी नहीं टूटता। आज बेटियां शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं। इसके बावजूद ध्याण की परंपरा और उससे जुड़ी भावनाएं आज भी पहाड़ों में उतनी ही मजबूत हैं।

लोक गीतों में ध्याण की गूंज
पहाड़ की अस्मिता और ध्याण का रिश्ता इतना गहरा है कि हमारे लोक गीत इसके बिना अधूरे हैं। उंची डांडियों मा बांज-बुरांश फूलिगे, पर मेरो भाई भिटौली ले के नी औई…। यह पंक्तियां उस ध्याण की पीड़ा और प्रतीक्षा को दर्शाती हैं, जो ससुराल के कठिन श्रम के बीच अपने मायके की यादों में डूबी रहती है।

नंदा है देवभूमि की सबसे बड़ी ध्याण
उत्तराखंड की आराध्य देवी मां नंदा को भी राज्य की ध्याण माना जाता है। नंदा राजजात यात्रा दरअसल एक ध्याण की अपने ससुराल जाने की ही विदाई यात्रा है। जब मां नंदा को विदा किया जाता है, तो हर पहाड़ी की आंख इसलिए नम होती है क्योंकि वह अपनी ही घर की बेटी यानी ध्याण को विदा कर रहा होता है।

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