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नतीजों पर निर्भर लोकतंत्र का भविष्य

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जम्मू—कश्मीर और हरियाणा विधानसभा चुनाव के लिए मतदान संपन्न हो चुका है। हर एक चुनाव के बाद अमूमन जैसा होता है तमाम टीवी चैनल और मीडिया प्रतिष्ठानों में एग्जिट पोल के जरिए चुनावी नतीजे बताने की होड़ जैसी लग जाती है। लोकसभा चुनाव के बाद हालांकि एग्जिट पोल करने वाले टीवी चैनलों और मीडिया प्रतिष्ठानों की भारी—भद्द पिट चुकी है। क्योंकि उनके द्वारा सत्ता पक्ष के बारे में जितने भी दावे किए गए थे उनकी हवा चुनावी नतीजे आते ही निकल चुकी थी। इनमें से कोई एक भी टीवी चैनल और मीडिया संस्थान ऐसा नहीं था जो असल नतीजे के आसपास भी हो। कुछ एक तो ऐसे भी थे जिन्होंने बीजेपी को अबकी बार 400 पर के नारे के अनुरूप उसे इससे भी अधिक सीटें मिलने की बात की गई थी लेकिन 400 तो दूर भाजपा 300 के आसपास भी नहीं पहुंच सकी और उसका दायरा 240 पर सिमट कर रह गया और वह अपने दम पर सरकार बनाने के जादुई अंक से भी 32 सीटें पीछे रह गई। चुनावी नतीजों की रोशनी में मीडिया की इस रिपोर्टिंग में उसकी विश्वसनीयता को अर्श से फर्श पर पहुंचा दिया था। खास बात यह है कि राजनीतिक दलों के नेताओं से लेकर राजनीतिक समीक्षको तक की आलोचना झेलने वाली इस मीडिया को एक अलग नाम तक दे दिया गया। जिसे गोदी मीडिया कहा जाने लगा है। यह अलग बात है कि तमाम तरह का भला बुरा सुनने के बाद भी उस पर इसका कोई खास फर्क नहीं पड़ा। इसमें कोई दो राय नहीं है कि देश दुनिया की खबरें जानने के लिए उत्सुक रहने वाले इस समाज में बहुत सारे लोगों ने टीवी चैनलों पर खबरें देखना बंद तक कर दिया बल्कि अखबार पढ़ना तक छोड़ दिया। ख्ौर लोक सभा चुनाव के बाद होने वाले इन दो राज्यों के चुनावों पर अब इनके द्वारा जो संभावित नतीजे बताएं और दिखाये जा रहे हैं उसमें हरियाणा में कांग्रेस को प्रचंड बहुमत के साथ सत्ता में आने के संकेत दिए गए हैं वहीं जम्मू कश्मीर में भी कांग्रेस और नेशनल कांफ्रेंस गठबंधन की सरकार बनने की संभावना जताई गई है। वहीं कुछ का अनुमान है कि जम्मू कश्मीर में त्रिशंकु सरकार बनने जा रही है इस मुद्दे पर बहुत लंबी बहस नहीं चलेंगी क्योंकि 8 अक्टूबर को मतगणना शुरू होते ही दोपहर तक यह स्पष्ट हो जाएगा कि कहां किसकी सरकार बनेगी और शाम तक यह भी पता चल जाएगा कि किसको कितनी सीटें मिल सकेंगी। जहां तक हरियाणा विधानसभा चुनाव की बात है तो इस चुनाव में कांग्रेस का पलड़ा भारी दिख रहा है फिर भी असल नतीजे से पहले पुख्ता तौर पर यह दावा नहीं किया जा सकता कि भाजपा का यहां सूपड़ा साफ हो जाएगा। जहां तक जम्मू—कश्मीर के चुनाव की बात है तो यहंा 10 साल बाद चुनाव हुए हैं इस बीच राज्य से धारा 370 को हटाने जैसा बड़ा काम केंद्र सरकार द्वारा किया जाना जिसे लेकर तमाम नेता तिलमिला रहे थे इस फैसले को नेताओं की तरह आम जनता कैसे देखती है इसका पता इस राज्य के चुनावी नतीजों से ही मिलने वाला है इसलिए जम्मू—कश्मीर के चुनावी नतीजो का देश के लोगों को बेसब्री से इंतजार है। दोनों राज्यों में 60 फीसदी से अधिक मतदान होना अच्छे लोकतंत्र की निशानी है मतदान किसके पक्ष में हुआ यह मायने नहीं रखता है। मोदी का मैजिक 10 साल बाद भी कितना प्रभावी है और राहुल गांधी पर लोग अब कितना भरोसा जताते हैं इसका जवाब भी इन दो राज्यों के नतीजे देंगे। इन राज्यों के नतीजे ही महाराष्ट्र और झारखंड के नतीजों की नींव भी रखेंगे। जिसके पक्ष में यह नतीजे रहेंगे आने वाले दौर की राजनीति पर उसी का वर्चस्व रहेगा। इस सत्य को सभी जानते हैं यही कारण है कि भाजपा और कांग्रेस किसी के लिए भी यह चुनाव कितना अहम है।

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