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लूट—झूठ और फूट की राजनीति

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क्या देश की वर्तमान राजनीति की यही असली पहचान बन गई है। आजकल चुनावी दौर में कहां—कहां क्या—क्या घटित हो रहा है इस पर गौर करें तो ऐसा लगता है कि राजनीति का यही सबसे बड़ा सच है। कल हरियाणा विधानसभा के चुनाव प्रचार का अंतिम दिन था। भाजपा के स्टार प्रचारक और दलित राजनीति के बड़े चेहरे अशोक तंवर दोपहर 1 बजे भाजपा प्रत्याशी को वोट देने की अपील कर रहे थे जो राहुल गांधी की जनसभा से दो ढाई सौ किलोमीटर दूर थे वह अचानक राहुल गांधी की जनसभा में प्रकट हुए और प्रचार की समय सीमा खत्म होने से 1 घंटे पहले कांग्रेस में शामिल हो गए। एन मतदान से पहले उनके बारे में भाजपा का कोई नेता कल्पना भी नहीं कर सकता था कि यह भी हो सकता है। अभी कांग्रेस की दलित नेता जो उत्तराखंड कांग्रेस की प्रभारी भी हैं उनकी नाराजगी की खबरें आई थी। वह कांग्रेस की संासद भी हैं वह विधानसभा चुनाव लड़ना चाहती थी और दलित महिला मुख्यमंत्री के नाम पर हरियाणा की सीएम बनना चाहती थी लेकिन कांग्रेस के वरिष्ठ नेता भूपेंद्र सिंह हुड्डा जो खुद मुख्यमंत्री पद के सबसे प्रबल दावेदार हैं उन्हें यह मंजूर नहीं था नाराजगी की बात सार्वजनिक हुई तो भाजपा ने भी उन्हें न्योता दे डाला इसके साथ ही यह भी प्रचार शुरू कर दिया गया कि कांग्रेस दलित को सम्मान दिलाने की बात करती है लेकिन कांग्रेस में दलित का सम्मान नहीं है खैर श्ौलजा तो भाजपा में नहीं गई लेकिन कांग्रेस में भाजपा के दलित चेहरा बनाकर पेश किए जाने वाले अशोक तंवर जरूर चले गए। भले ही तंवर के आने का कांग्रेस को कोई फायदा हो न हो लेकिन इससे भाजपा के अंदर मची भगदड़ को हवा जरूर मिल गई है। अभी चंद दिन पहले बेंगलुरु अदालत के आदेश पर केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के खिलाफ जबरन लूट का मुकदमा दर्ज हुआ है। यह मामला इलेक्टोरल बांड घोटाले से जुड़ा हुआ है 8000 करोड़ की जबरन वसूली के आरोपों में भाजपा के अध्यक्ष से लेकर ईडी के अधिकारी तक लपेटे में है। देश में जाति—धर्म के नाम पर समाज को किस तरह से बांटा जा रहा है कहीं लव जिहाद चर्चाओं के केंद्र में है तो कहीं बुलडोजर की कार्यवाही चर्चाओं के केंद्र में है। सत्ता के लिए देश के नेता कुछ भी कर गुजरने पर आमादा है। बात—बात पर झूठ बोलना और तथ्यों तथा सत्य को तोड़फोड़ कर जनता के सामने परोसने और भ्रम फैलाना तो आम बात है ही साथ ही गाली और गोलियों से लेकर इनाम तक की घोषणाएं सरेआम की जा रही है। झूठे मामलों में नेताओं को जब जेल भेजा जा सकता है तो आम आदमी की तो औकात ही क्या है। ईडी और सीबीआई जैसी संस्थाओं से लेकर देश के चुनाव आयोग तक से लोगों का भरोसा खत्म होता जा रहा है। नेताओं का हाल यह है कि वह जिधर की हवा बहते देखते हैं तिनके की तरह उधर ही उड़ जाते हैं। मध्य प्रदेश के कमलनाथ हो या फिर ज्योतिरादितिया सिंधिया। महाराष्ट्र के अजीत पंवार हो या फिर जदयू के नीतीश कुमार। किसी पर कोई भरोसा नहीं किया जा सकता है। अशोक तंवर की तरह सिंधिया जो कांग्रेस छोड़कर भाजपा के साथ चले गए थे फिर कांग्रेस में आने वाले हैं चंद्रबाबू नायडू ने तिरुपति के प्रसाद में पशु चर्बी की बात कहकर समाज में जहर क्यों फैलाया गया कोई नहीं जानता। देश के नेताओं ने लोगों को लड़ाने—डराने और बांटने के लिए जितने रास्ते खोल दिए हैं वैसा तो अंग्रेजों ने भी नहीं किया।

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